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Showing posts from June, 2024

कांक्रीट के जंगल

गांवों का देख कठिन जीवन अपनी पीढ़ी के बाकी लोगों जैसे ही मैं शहर चला तो आया था महसूस मगर अब होता है बस गांव नहीं मर रहे उन्हीं के साथ हमारे मन में भी  कुछ मरता जाता है शहरों में ही बस नहीं उग रहे कांक्रीट के जंगल उनके साथ हमारे भीतर भी कुछ पथराता सा जाता है। रचनाकाल : 28 जून 2024

मध्यम मार्ग

जीवन जब अतिशय सुखमय था तब कोई बोझ न था मन में चिंता का नाम-निशान न था नीरस लगने पर लगा सभी कुछ बंजर जैसा लगता मन कुछ नया नहीं लिख पाता था। दु:ख-कष्ट सहनसीमा से भी जब अधिक मिले लगता था जैसे सुन्न हो गया है तन-मन वीरानी छाई रहती थी कितनी भी कोशिश करूं मगर लिखने खातिर मन में विचार या भाव न कोई आता था। इसलिये हमेशा सम पर ही रहने की कोशिश करता हूं सुख ज्यादा जब आ जाता है स्वेच्छा से उसमें दु:ख मिश्रित कर लेता हूं बचने की कोशिश करता विषम परिस्थिति से मैं मध्य मार्ग पर रहकर ही अच्छी कविता लिख पाता हूं। रचनाकाल : 26 जून 2024

ईमानदारों की दुनिया में कौन लोग हैं माफिया के मददगार ?

 नीट परीक्षा के मैले होने के खुलासे के बाद जिस तरह धड़ाधड़ परीक्षाएं रद्द हो रही हैं, वह हतप्रभ करने वाला है. जो सड़न बाहर से मामूली दिखाई दे रही थी, क्या कोई सोच सकता था कि भीतर वह इतने बड़े पैमाने पर फैली हुई है? अभी कुछ दिन पहले एलन मस्क ने कहा था, ‘कुछ भी हैक किया जा सकता है.’ पेपर लीक माफिया शायद इससे भी ज्यादा आत्मविश्वास के साथ कह सकता है कि ‘कुछ भी लीक किया जा सकता है.’ जाहिर है यह लीक कांड चंद विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहा होगा वरना पेपर लीक माफिया की कमाई कैसे हुई होगी? ताज्जुब है कि इतने बड़े-बड़े कांड हमारे समाज के भीतर ही हो जाते हैं और शासन-प्रशासन या हम जागरूक नागरिकों को भनक तक नहीं लगती?  मुद्दा सिर्फ परीक्षा के पर्चों के लीक होने का नहीं है. बाहर से बर्फ के छोटे-छोटे दिखाई देने वाले टुकड़े भीतर से इतने विशाल आइसबर्ग हैं कि जानकर आंखें फटी रह जाती हैं. चोरी की गाड़ियों को आरटीओ की मदद से फर्जी नंबर के साथ सड़क पर उतारे जाने के जिन इक्का-दुक्का मामलों से जांच की शुरुआत हुई थी, उसके तार पूरे देश में इतने बड़े पैमाने पर फैले हुए मिल रहे हैं कि ईमानदार आदमी तो भ...

विरासत का संबल

कभी-कभी जब चिंता से बेहद व्याकुल हो जाता हूं आती पुरखों की याद गुलामी में ही जिनकी जाने कितनी मर-खप गईं पीढ़ियां पैदा होने से मरने तक जो यह कभी जान ही नहीं सके आजादी कैसी होती है! जब भी मुझको दु:ख-कष्ट सहनसीमा के बाहर लगते हैं ऋषि-मुनि आते हैं याद तपस्यामय ही जिनका जीवन था जो स्वेच्छा से अति की हद तक काया को अपनी स्वयं तपाया करते थे। संबल मिलता है मुझको अपने पुरखों से तप-त्याग, धैर्य या सहनशीलता की समृद्ध विरासत हो जिसकी इतनी दु:ख-कष्टों से वह कैसे घबरा सकता है चिंता से वह कैसे व्याकुल हो सकता है! रचनाकाल : 20 जून 2024

किस्मत का रहस्य

जिन दिनों बहुत मैं चौकन्ना सा रहता था लोगों को ठग लूं भले मगर कोई न मुझे ठग सकता था भोले-भाले लोगों को लेकिन देख मुझे महसूस हुआ चौकन्ना रहकर भी मैं गहरी नींद नहीं सो पाता था वे मगर ठगाये जाने का भय होने पर भी घोड़े बेच के सोते थे। तब से मैंने चौकन्ना रहना छोड़ दिया खुद भले ठगा जाऊं लेकिन लोगों को ठगने का विचार तक मन में लाना छोड़ दिया यह समझ गया जैसा हम रखते मनोभाव मन स्वयं हमारा हमको उसका दे देता है उचित दण्ड या पुरस्कार बाहर का सारा न्याय शास्त्र तो छाया है या माया है जो बैठा न्यायाधीश हमारे भीतर है वह न्याय हमारा करता है किस्मत जिसको हम कहते हैं वह इसी न्याय का प्रतिफल है। रचनाकाल : 19 जून 2024

नंबरों की अंधाधुंध दौड़ में गुम होता जा रहा बचपन

 एक जमाना था जब परीक्षा में सेकंड डिवीजन आना गर्व की बात समझी जाती थी. थर्ड डिवीजन लाने वाला थोड़ा शर्मिंदा जरूर होता था लेकिन पास हो जाने का संतोष उसे भी होता था. फर्स्ट डिवीजन आने पर तो मुहल्ले भर में मिठाइयां बांटी जाती थीं और ऐसे होनहार सपूत के घरवालों का कद सभी जान-पहचान वालों की नजरों में ऊपर उठ जाता था. अगर डिस्टिंक्शन अर्थात 75 प्रतिशत के ऊपर आ जाए तब तो बंदे के जीनियस होने के बारे में किसी शक-शुबहे की कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती थी.  लेकिन उसी जीनियस की मार्कशीट अब अगर उसके नाती-पोते देख लें तो शायद वह शर्मिंदा हुए बिना न रहे, क्योंकि जमाना आज सौ में से सौ अंक लाने का है. 75 तो दूर, 90 प्रतिशत से जरा भी कम नंबर आने पर बच्चों का चेहरा ऐसे लटक जाता है कि समझ में नहीं आता उन्हें बधाई दी जाए या सांत्वना! यह शोध का विषय हो सकता है कि दुनिया में अपनी उपलब्धियों का झंडा गाड़ने वाले  वैज्ञानिकों के स्कूल-काॅलेजों में कितने नंबर आते थे! वैसे सुनने में तो यही आता है कि आइंस्टीन और रामानुजन जैसे जीनियस वैज्ञानिक भी अपने छात्र जीवन में अधिकतर विषयों में फेल हो जाया करते थे. ...

सपना या यथार्थ!

सपने में लेती हैं जन्म चंद पंक्तियां सोचता हूं लिख लूंगा जागने पर सुबह, पर जागते ही सपना भूल जाता हूं इतना बस याद रह जाता है कुछ तो उसमें ऐसा तिलिस्म था हो गया था मंत्रमुग्ध खो गई है जैसे अनमोल चीज। जागते हुए भी लेकिन कभी-कभी ऐसा लगने लगता है छूटता ही जाता है हाथ से वह जो अनमोल है इतने सस्ते मोल पर तो नहीं जानी चाहिए थी जिंदगी! होता महसूस कहीं धुंधला सा अपने ही हाथों से खुद को ठगता जाता हूं हीरा बन सकता था कांच लेकिन बन कर रह जाता हूं तय नहीं कर पाता हूं खो गई जो चीज बेशकीमती सपना वह था या यथार्थ है! रचनाकाल : 16 जून 2024

दायरा

कोशिश तो करता रहा तोड़ने की चक्र सदा दायरे में बंधने से बचता ही रहा, मगर ऐसा क्यों लगता है तोड़ना भी दायरे को बन गया है दायरा! मूर्तियों की पूजा का करते विरोध जिंदगी भर जो मरने के बाद जैसे उनकी ही मूर्ति पूजी जाती है राजतंत्र के खिलाफ लाते जो लोकतंत्र जनता के सेवक वही राजा के जैसे ही जैसे धीरे-धीरे बन जाते हैं मुझको भी लगता है दायरे में धीरे-धीरे मैं भी बंधता जाता हूं दायरे को तोड़ने का दायरा बेहद कठिन लगता है तोड़ना। रचनाकाल : 15 जून 2024

पर्यावरण की तबाही का दुष्चक्र और इससे बाहर निकलने की चुनौती

कुछ साल पहले जब कोरोना महामारी के कारण लोग शहरों से गांवों की ओर भाग रहे थे तो गांवों ने भी उन्हें निराश नहीं किया था. खेतों ने उन्हें कम से कम भूखों तो नहीं मरने दिया था. गांधीजी का कहना था कि धरती मां पेट तो अपने सभी बच्चों का भर सकती है लेकिन लालच किसी एक का भी पूरा नहीं कर सकती. विडम्बना यह है कि पेट भरते ही हम मनुष्यों का लालच भी बढ़ने लगता है. इस लालच के ही चलते दुनिया को युद्धों की आग में झोंका जा रहा है. परंतु पर्यावरण को नुकसान हम सिर्फ युद्धों के जरिये ही नहीं पहुंचा रहे. एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 13 वर्षों में भारत में एसी इस्तेमाल करने वालों की संख्या तीन गुना बढ़ गई है और अब देश में हर सौ में से 24 परिवारों के पास एसी है. एसी अपने आप में तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती ही है, खबर यह भी है कि कूलिंग प्रोडक्ट्‌स में बिजली की खपत पिछले चार साल में 21 प्रतिशत बढ़ गई है और सब जानते हैं कि अपने देश में बिजली उत्पादन का प्रमुख स्रोत जीवाश्म ईंधन ही है. पर संकट सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रहने वाला है. एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2050 तक भारतीय बाजार में घरेलू एसी की हिस्सेदारी नौ गुना ...

सर्व दल समभाव का सपना और उम्मीद जगाते बयान

कहते हैं देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के बाद देश की पहली कैबिनेट में अपने कई धुर विरोधी नेताओं को भी स्थान दिया था. स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री डाॅ. बाबासाहब आंबेडकर हों या भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी, वे कांग्रेस की नीतियों के समर्थक नहीं थे और उसकी अक्सर आलोचना करते थे. फिर भी कांग्रेस ने उनकी प्रतिभा को देखकर उन्हें मंत्री बनाया था. मोदी 3.0 कैबिनेट में भी भाजपा के कई पूर्व विरोधी दलों के नेताओं को मंत्री बनाया गया है. तो क्या लोकतंत्र का सुनहरा युग फिर से लौट रहा है? फर्क लेकिन यह है कि नेहरूजी ने अपने दल के पास भारी बहुमत होते हुए भी ऐसा किया, जबकि भाजपा को मजबूरी में ऐसा करना पड़ रहा है. परंतु खुशी से किया जाए या मजबूरी से, जनता शायद चाहती है कि ऐसा ही किया जाए, और इसीलिए उसने इस बार अभूतपर्व ढंग से जनादेश दिया है. आखिर राजनेता रूपी सारे रत्न सत्तारूढ़ दल की खान से ही तो नहीं निकलते! मोदी सरकार ने पिछले दो कार्यकालों में भले ही अपने काबिल मंत्रियों के बल पर काबिल-ए-तारीफ काम किया हो, लेकिन ऐसा क्यों सोचा जाना चाहिए कि विरोधी दलों ...

अब लौट चलें

मैं जब भी कोशिश करता हूं ईश्वर की सर्जित दुनिया में कुछ दखलंदाजी करने की सब गुड़-गोबर हो जाता है। आदत जैसा जब जीवन था जैसे पशु-पक्षी पेड़ सभी प्राकृतिक ढंग से जीते हैं मैं भी कुछ सोचे बिना उन दिनों सहज भाव से जीता था पर जब से शुरू विकास किया चीजों का आविष्कार किया तकलीफें कम हो गईं  जिंदगी अधिकाधिक आरामदेह बन गई सहजता भी लेकिन हो गई खत्म पहले की तरह प्रकृति की या मानव से इतर प्राणियों की अब समझ नहीं पाता भाषा बेसुरा स्वयं को लगता हूं। पहले जैसा अज्ञानी तो अब नहीं दुबारा बन सकता पर जान-बूझकर भी सबकुछ पहले जैसा ही सहज चाहता हूं बनना संकेत समझना ईश्वर के प्राकृतिक ढंग से ही चलना मुझको अब अपनी बनावटी दुनिया से खुद डर लगता है। रचनाकाल : 1 जून 2024

असफल की सफलता

जितनी ही बढ़तीं उपलब्धियां उतनी ही बेचैनी बढ़ती है आती है याद ऐसे लोगों की करके भी मेहनत घनघोर जो असफल ही जिंदगी में रह गये! जानता हूं होती हैं  पूरी जो कविताएं होती हैं कर्जदार ढेरों अधूरी कविताओं की गगनचुंबी जैसे इमारतें होती हैं टिकी गहरी नींव पर पेड़ों का होता अस्तित्व ही निर्भर अपनी जड़ों पर मुझको भी अपनी सफलताओं में असफल सारे लोगों का दिखता है योगदान इसीलिये देते हैं  लोग मुझे श्रेय जब लज्जा से गड़ जाता हूं सारे असफल लोगों से कहना यह चाहता हूं अपनी असफलता से कोई भी न हर्गिज हताश हो जाता नहीं कोई भी परिश्रम व्यर्थ रूप में किसी न किसी फलीभूत होता है दुनिया के सारे सफल लोगों की सफलता में दुनिया के सारे असफल लोगों का योगदान होता है। रचनाकाल : 1 जून 2024  

बेचैनी

कभी-कभी अनजाने में ही जाने क्यों बेहद बेचैनी होती है कोशिश करता हूं ढूंढूं, पर कारण कुछ समझ नहीं आता भय लगता है अवसादग्रस्त तो नहीं हो गया कहीं? मगर जाने से पास चिकित्सक के भय लगता है यह लगता है लेकर यदि दवा मिटा लूंगा अपने भीतर की बेचैनी तो जीकर ऐसी दुनिया में निश्चिंत जहां बेचैन हर कदम पर रहने के कारण हों खुद को मैं कैसे माफ कभी कर पाऊंगा! रचनाकाल : 30 मई 2024