कहते हैं देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के बाद देश की पहली कैबिनेट में अपने कई धुर विरोधी नेताओं को भी स्थान दिया था. स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री डाॅ. बाबासाहब आंबेडकर हों या भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी, वे कांग्रेस की नीतियों के समर्थक नहीं थे और उसकी अक्सर आलोचना करते थे. फिर भी कांग्रेस ने उनकी प्रतिभा को देखकर उन्हें मंत्री बनाया था. मोदी 3.0 कैबिनेट में भी भाजपा के कई पूर्व विरोधी दलों के नेताओं को मंत्री बनाया गया है. तो क्या लोकतंत्र का सुनहरा युग फिर से लौट रहा है? फर्क लेकिन यह है कि नेहरूजी ने अपने दल के पास भारी बहुमत होते हुए भी ऐसा किया, जबकि भाजपा को मजबूरी में ऐसा करना पड़ रहा है. परंतु खुशी से किया जाए या मजबूरी से, जनता शायद चाहती है कि ऐसा ही किया जाए, और इसीलिए उसने इस बार अभूतपर्व ढंग से जनादेश दिया है. आखिर राजनेता रूपी सारे रत्न सत्तारूढ़ दल की खान से ही तो नहीं निकलते! मोदी सरकार ने पिछले दो कार्यकालों में भले ही अपने काबिल मंत्रियों के बल पर काबिल-ए-तारीफ काम किया हो, लेकिन ऐसा क्यों सोचा जाना चाहिए कि विरोधी दलों ...