हितैषी दुश्मन
कुछ लोग कभी जब हद से ज्यादा पत्थर मारा करते हैं पीड़ा जब सहन नहीं होती तब लगता कछुए सी मोटी अपनी भी खाल बना लूं मैं। लेकिन फिर सोचा करता हूं जो पत्थर मारा करते हैं कुछ दुर्गुण तो मुझमें उनको दिखता होगा यूं ही तो कोई नहीं किसी के पीछे पड़ जाता होगा! इसलिये चाहते दुश्मन मेरे जितनी भी पीड़ा देना स्वेच्छा से वह सब सहता हूं उनकी नजरों से देख स्वयं को दोष दूर करने की कोशिश करता हूं। सच तो यह है मित्रों को मेरे दोष नहीं दिख पाते हैं दुश्मन ही मेरी कमियां मुझे दिखाते हैं इसलिये अधिक मित्रों से भी वे नजर हितैषी आते हैं। रचनाकाल : 10 फरवरी 2026