खण्डहरों में सृजन
जब मारकाट चहुंओर मची हो हिंसा का उन्माद हर जगह फैला हो तब नया सृजन नि:सार दिखाई पड़ता है। पर कितना भी हो ध्वंस खण्डहर हो जाये सबकुछ चाहे जीवन तो इससे खत्म नहीं हो जायेगा! जब हिरोशिमा-नागासाकी सा हाल समूची दुनिया का हो जायेगा जो बचे रहेंगे या कि नये पैदा होंगे जीना बेहद मुश्किल उनका हो जायेगा तब उनको शायद नये सृजन की जिंदा रह पाने के लिये जरूरत हो! इसलिये तबाही का ताण्डव जो मचा रहे उनसे भी ज्यादा शिद्दत से हमको मिलकर कुछ नया सृजन करना होगा जब हद से दर्द गुजर जाये तब चीख-पुकार मचाने के बदले में कोई गीत नया सुमधुर स्वर में गाना होगा कचरा जलता है जैसे अग्निपरीक्षा में पर सोना और दमकता है जो गीत उपजता है असह्य पीड़ा में वह हर काल में अमर होता है। (रचनाकाल : 26 अप्रैल 2026)