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अपराधी से नहीं जनाब, अब प्रतिष्ठित लोगों से डर लगता है !

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 दुनिया में अपराध प्राचीनकाल से ही होते रहे हैं और अपराधियों को दंडित भी किया जाता रहा है. लेकिन पूरी मानव जाति के इतिहास में शायद हम पहली बार एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां खौफनाक अपराध ऐसे लोग कर रहे हैं जिनका पहले से कोई आपराधिक रिकाॅर्ड नहीं है. इंदौर के राजा रघुवंशी हत्याकांड की यादें अभी भी धुंधली नहीं पड़ी हैं (जांच में पुलिस की चूक से आरोपी को जमानत मिल जाने से लोग एक बार फिर सन्न रह गए हैं), कि पुणे के केतन अग्रवाल हत्याकांड ने एक बार फिर समूचे सभ्य समाज को हिलाकर रख दिया है.  ये दोनों हाईप्रोफाइल मामले बहुचर्चित हुए, लेकिन अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि इस तरह की ढेरों घटनाएं इन दिनों सामने आ रही हैं, जिनमें अपराध ऐसे लोग कर रहे हैं जो पेशेवर अपराधी नहीं हैं. बाहर से शांत दिखने वाले लोग भीतर से कितना उबल रहे हैं, इसका कोई अनुमान भी नहीं लगा  सकता. मुंबई लोकल के एक फर्स्ट क्लास डिब्बे में भारी बारिश के दौरान सिर्फ दरवाजा बंद करने को लेकर हुई बहस में एक व्यक्ति ने दूसरे की चाकू मारकर हत्या कर दी. नवी मुंबई के एक सरकारी आंगनवाड़ी केंद्र में एक बच्ची की बुरी त...

नफरत बनाम प्रेम

जब प्रेम किसी से करते हम तो सबसे अच्छा रूप दिखाई पड़ता है नफरत में लेकिन विकृत रूप में दिखते हैं मुझको डर सबसे अधिक घृणा से लगता है इसलिये प्रेम मैं सब लोगों से करता हूं सबका सर्वोत्तम रूप सामने आ पाए हरसंभव कोशिश यही, हमेशा करता हूं । सब सहमत ही हों मुझसे, नहीं जरूरी यह दुश्मनी भी अगर चाहें तो कर सकते हैं पर घृणा करें, मुझसे यह सहन नहीं होता नफरत में जीने से तो मरना बेहतर है है मजा दुश्मनी करने में तो असली तब हम अगर कभी मर भी जायें तो सबसे ज्यादा दु:खी हमारा दुश्मन हो! रचनाकाल : 19 जून-3 जुलाई 2026

पुरुषों के परजीवी होने का खामियाजा उठाती महिलाएं

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 हाल ही में अमेरिका से एक खबर सामने आई कि जीवनसाथी की तलाश में अमेरिकी पुरुष अब एशियाई और दक्षिण अमेरिकी देशों की ओर रुख कर रहे हैं, क्योंकि इन देशों में उन्हें ज्यादा ‘पारंपरिक’ और ‘सेवा करने वाली’ जीवन साथी मिलती हैं. इप्सोस जैसे सर्वेक्षणों में सामने आया है कि करीब 31 प्रतिशत युवक मानते हैं कि उनकी पत्नी सेवाभावी होनी चाहिए, वे नहीं चाहते कि शादी के बाद वह अनावश्यक विवाद करे. दरअसल बेहतर शिक्षा और अच्छी कॉर्पोरेट नौकरियों के कारण महिलाओं में भी पुरुषों की तरह स्वतंत्र व्यक्तित्व का विकास होने लगा है और वे पुरुषों से दबकर नहीं रहना चाहतीं. हम मनुष्यों में कामचोरी की प्रवृत्ति कदाचित प्राचीन काल से ही रही है. मनुष्येतर जीवों से अधिक चालाक होने का फायदा हमने हमेशा अपनी सुख-सुविधाओं को बढ़ाने में ही उठाया है. आखिर जब दुनिया के सारे जीव-जंतु लगभग आत्मनिर्भर होकर अपना जीवन गुजारते हैं तो क्या हम मनुष्य भी दूसरों का शोषण किए बिना अपना काम नहीं चला सकते थे! लेकिन अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता का दुरुपयोग हमने दूसरों का शोषण करने के लिए किया. जब तक हम ‘जंगली’ थे, तब तक तो कंदमूल-फल और शिकार के ...

अमृत-मंथन

अमृत सागर के भीतर सिर्फ नहीं होता हर मानव के भीतर अच्छाई होती है बाहर लाने को खुद को मथना पड़ता है यह सच है पहले विष ही निकला करता है पर उसको जो सच मान, वहीं रुक जाते हैं भीतर के अमृत को न कभी वे पाते हैं। है नीलकण्ठ सी शक्ति नहीं मेरे भीतर सारी दुनिया को ‘कालकूट’ से बचा सकूं पर आसपास के लोग बुरे जो दिखते हैं उनकी कमियों के प्रति सहृदयता रखता हूं अपनी कमियों के किस्से उन्हें सुनाता हूं मुझ जैसा बनने की कोशिश वे करते हैं। सच तो यह है अपनी कमियों से लड़कर मैं आगे बढ़ने की कोशिश हरदम करता हूं सब लोग मुझे अपने जैसे ही दिखते हैं उनकी कमियां अपनी कमियों सी लगती हैं प्रोत्साहन पाकर कोई आगे बढ़ता है तो मुझको लगता है मैं आगे बढ़ता हूं। रचनाकाल : 18 जून 2026

प्रेम परिष्कृत करता है, फिर क्यों निकृष्ट बनकर ही रह जाते हैं हम !

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  युवाओं के आक्रोश और असंतोष को भुनाने के लिए ‘काॅकरोच पार्टी’ का गठन होने के बाद, अब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने ‘इश्क करो पार्टी’ नामक एक नए प्लेटफाॅर्म का ऐलान किया है. उन्होंने युवाओं से इसे ज्वाइन करने की अपील करते हुए ‘मेक लव, नाॅट वार’ अर्थात ‘युद्ध नहीं, प्रेम करो’ का नारा दिया है. हालांकि जस्टिस काटजू की इस पार्टी का कोई औपचारिक मेनिफेस्टो या संगठन ढांचा सामने नहीं आया है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि युद्धों की विभीषिका से जूझती दुनिया में प्रेम अब हमारे लिए शौक की चीज नहीं बल्कि अस्तित्व का सवाल बन गया है. दुनिया में कौन ऐसा इंसान होगा जो प्रेम नहीं बल्कि नफरत करना चाहता हो! लेकिन ‘इश्क’ शब्द से आज हमारे मन में जो तस्वीर बनती है, क्या वह सचमुच इतनी निर्मल है कि हर कोई बिना किसी झिझक के इस पार्टी में शामिल हो सके? हकीकत शायद यह है कि आज प्रेम को भी हमने इतना सस्ता और सड़कछाप बना दिया है कि उसी धारणा के चलते ‘इश्क करो पार्टी’ समाज में किसी गंभीर विमर्श का केंद्र बनने के बजाय मजाक का विषय बन कर रह गई है और सोशल मीडिया में उस पर मीम्स की बाढ़ आई हुई है. ...

कल्पना और हकीकत

जब नहीं चांद पर पहुंचे थे हम चंदा मामा बहुत सुहाने लगते थे सच लेकिन उनका जान कहीं कुछ मूल्यवान अत्यंत चीज तो हमने नहीं गंवा डाली! पशु-पक्षी, पौधे-पेड़ और इंसान सभी आपस में बातें करते हैं जब पढ़ते थे ये कहानियां वे मंत्रमुग्ध कर देती थीं जब से लेकिन यह पता चला वे सिर्फ कल्पनाएं ही थीं क्या नहीं उन दिनों की तुलना में जीवन थोड़ा नीरस, बोझिल लगता है! हर एक आदमी के भीतर दस-बीस आदमी होते हैं यह निदा फ़ाज़ली कहते हैं फिर सच के क्यों हो सकते रूप अनेक नहीं जिस तरह देखते-सुनते हैं हम दुनिया को सब जीव-जंतु भी क्या वैसे ही सुनते और देखते हैं? सपने यदि नहीं जरूरी होते जीवन में तो क्यों रातों को सोते समय देखते हम अब कौन फैसला करे कि दिन की दुनिया ही सच है, रातों की झूठी है क्या पता कि दोनों ही सच हों क्यों नहीं संतुलन दोनों में हम रखते हैं!   रचनाकाल : 14 जून 2026

हम नहीं जानते पूरा सच, फिर गलत किसी को मान बैर क्यों करते हैं ?

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 पिछले दिनों खबर आई कि नाॅर्वे इस बार फुटबाॅल विश्वकप को जीतने नहीं बल्कि ‘लूटने’ के इरादे से आक्रामक ‘वाइकिंग- थीम’ बना रहा है. वाइकिंग्स स्कैंडिनेविया अर्थात वर्तमान नाॅर्वे, स्वीडन और डेनमार्क में रहने वाले मध्यकालीन समुद्री लुटेरे थे, जिनकी निर्दयता के किस्से जगजाहिर हैं. जाहिर है विश्वकप को कोई लूट तो नहीं सकता लेकिन नाॅर्वे शायद दो कारणों से ऐसा कर रहा है. एक तो इसलिए कि उसके खिलाड़ियों में लुटेरों जैसी आक्रामकता आ सके, जो कि जीत में बहुत सहायक होती है और दूसरी इसलिए कि अपने पूर्वजों का महिमामंडन कर सके! लेकिन आज के सभ्य युग में कोई लुटेरों को महिमामंडित कैसे कर सकता है? नाॅर्वेजियन लोग शायद अपवाद नहीं हैं. पूर्वज अच्छे रहे हों या बुरे, हम इंसानों की प्रवृत्ति अपनी विरासत पर गर्व करने की ही होती है. इसलिए वर्तमान दृष्टि से उनके बुरे नजर आने वाले कार्यों को भी हम न्यायोचित ठहराने की कोशिश करते हैं. क्रूर से क्रूर शासक भी अपने समुदाय की नजरों में नायक होता है. प्राचीन और मध्यकालीन भारत पर हमला करने वाले मंगोल, शक, हूणों, यवनों, तुर्कों को हम भले ही क्रूर आक्रमणकारी मानते हों, ल...