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मशविरा

इतने नजदीक न आ, दूर रहा कर मुझसे तू मुझे अपनी सगी बेटी जैसी प्यारी है बात किस-किस को मगर अपनी ये समझाऊंगा आड़ लेकर मेरी क्या लोग न कर जायेंगे मेरी जब देंगे मिसालें, मैं कहां जाऊंगा एक जीवन में कई बार न मर जाऊंगा! बचपना तेरा मेरे मन को बहुत भाता है देख मासूमियत बचपन मुझे याद आता है किंतु सीधा है नहीं आज जमाना इतना भेड़िये घूम रहे भेष बदल कितने ही हो गई है तू बड़ी, थोड़ी समझदारी ला इतने नजदीक न आ, दूर रहा कर मुझसे।   रचनाकाल : 27 मई 2026

सीता का वनवास

राम जब वन को गए, जानते थे कि उन्हें लौट कर एक दिन आना है अयोध्या फिर से चाहे कितने भी कठिन दिन हों, मगर तय हो तो हम उन्हें काट लिया करते हैं जैसे-तैसे किंतु सीता को मिला होगा जब फिर से वनवास जिंदगी कौन सी उम्मीद में काटी होगी? राजमहलों के तो सुख का था उन्हें लोभ नहीं राम के साथ वे स्वेच्छा से गई थीं वन को किंतु जब छोड़ गए वन में अकेला, लक्ष्मण कुछ क्षणों को तो समझ ही में न आया होगा किस तरह बाद में अपने को संभाला होगा! गर्भ में पल रहे बच्चे न अगर होते तो जान अपनी क्या उसी वक्त न दे दी होती? पाप इतना ये भयानक था कि महलों में भी राम संन्यासियों की भांति न रहते होते दु:ख जो सीता ने सहे वन में कहीं उससे अधिक राम ने मन में ही अपने न सहे होते तो कौन भगवान उन्हें कहता कि मानव के भी पद से नीचे, वे निगाहों से गिर गए होते! ठीक ही करते हैं अब मिथिला नगर के वासी बेटियां अपनी अयोध्या में नहीं ब्याहते हैं।   रचनाकाल : 26 मई 2026

देशभक्ति और नैतिकता के अभाव में पथभ्रष्ट करता पैसा

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 नीट पेपर लीक  मामले में पिछले कई दिनों से रोज नए-नए खुलासे हो रहे हैं. अब एक डरावनी आशंका यह उभर कर सामने आई है कि नीट के तीनों विषयों के पेपर सेट करने वाले पुणे के ही कैसे थे? क्या देश के और किसी भी हिस्से में एनटीए को एक भी विषय का पेपर सेट करने लायक शिक्षक नहीं मिल पाए? या फिर यह सब सुनियोजित तरीके से किया गया था? आखिर एनटीए में किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति की भागीदारी के बिना ऐसा होना कैसे सम्भव था!  तो क्या अभी तक जितने भी आरोपियों के नाम सामने आए हैं वे ‘छोटी-छोटी मछलियां’ हैं और ‘बड़ी मछली’ कोई और ही है? लेकिन उस ‘बड़ी मछली’ के ऊपर भी अगर कोई ‘बड़ी मछली’ हुई तो? ऐसे में क्या जांच एजेंसी के लिए उस पर हाथ डालना सम्भव हो पाएगा?  बहुत पहले एक फिल्म आई थी, जिसमें एक जांच एजेंसी के मुखिया का अपहरण करके अपराधियों ने उसके हमशक्ल को उसके पद पर बिठा दिया था. इस प्रकार शिकायत करने वाले हर व्यक्ति की जानकारी अपराधियों को मिल जाती थी और उसे ठिकाने लगा दिया जाता था. यह तो खैर फिल्मी कहानी थी लेकिन असल जिंदगी में भी हमने अभी कुछ माह पहले ही देखा है कि ईरान की टाॅप लीडरशिप क...

तर्कहीन कुछ नहीं

फल अच्छे कर्मों का जब हाथोंहाथ मिले अच्छाई करना बहुत सरल तब होता है करने पर लेकिन होम हमारा हाथ जले अच्छा बन कर रह पाना मुश्किल होता है। जीवन के इतने सरल नहीं पर नियम हमेशा दो और दो मिल चार बनें कुछ कर्मों के फल जल्दी ही मिल जाते हैं कुछ मिल पाने में साल कई लग जाते हैं कब फलीभूत होते हैं कर्म, कहां, कैसे यह हमको पता नहीं होता इसलिये मुताबिक मन के काम नहीं होता तो भला-बुरा ईश्वर को कहने लगते हैं। पर नियम सृष्टि का अगर सटीक नहीं होता अन्याय किसी के साथ जरा सा भी होता क्या सारी दुनिया नहीं अराजक हो जाती? सच तो यह है हम नहीं जानते पूरा सच सीमित सच के बल पर अनुमान लगाते हैं इसलिये कभी संतुष्ट नहीं हो पाते हैं। ईश्वर के नियमों में शायद सच-झूठ नहीं कुछ भी होता जो होता है बस होता है हां, बिना तर्क के शायद कभी नहीं होता हम तर्क समझना देते हैं जब छोड़ तभी गढ़ते अपना सच-झूठ, उसी में जीते हैं! रचनाकाल : 21-22 मई 2026

ईमानदारी के अभाव में शातिर बन जाती है समझदारी

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 पश्चिम एशिया में जारी वैश्विक संकट के मद्देनजर, हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा मितव्ययिता की अपील के बाद किफायतशारी दिखाने की होड़ लग गई है. मुख्यमंत्रियों से लेकर राज्यपालों तक ने अपने काफिले में वाहन आधे कर दिए हैं. अधिकारियों को कार की बजाय मेट्रो-बस से यात्रा करने और होटलों की बजाय वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये बैठकें करने का आदेश जारी कर दिया गया है. नेताओं से विमान यात्रा टालने को कहा गया है (यह बात और है कि साइकिल या मोटरसाइकिल पर बैठकर फोटो खिंचाने वाले कुछ नेताओं के पीछे वाहनों का लम्बा काफिला नजर आता है). फिजूलखर्ची करने वालों द्वारा प्रधानमंत्री की अपील के बाद पैसे बचाने की मची होड़ को देखकर अचरज होता है कि जिन चीजों के बिना भी काम चल सकता था, आखिर अब तक चलाया क्यों नहीं जा रहा था! नेता अगर वाहनों का काफिला अपनी सुरक्षा के लिए लेकर चलते थे तो वह मुद्दा तो अभी भी बरकरार है, लेकिन काफिले में कटौती के बावजूद कहीं भी तो किसी नेता की जान कोई नहीं ले रहा! आपदाओं या संकटों की एक अच्छी बात यह होती है कि वे हमारे सुविधाभोगी जीवन को झकझोरते हुए, आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं. क...

मन की निगरानी

मन मेरा मुझको चकमा देने की कोशिश में रहता है गढ़ता है ऐसे तर्क कि मानो किस्मत का वह मारा है सब शोषण करते उसका, दुनिया में सबसे बेचारा है इसलिये जरा वह भी ठग ले दुनिया को, क्या हो जायेगा यदि काम बने बातों को घुमा-फिरा कर वह तो झूठ नहीं कहलाएगा! दलबदलू लोगों को गद्दारों की श्रेणी में रखता हूं पर स्वयं बदलता दल तो वह मन का परिवर्तन लगता है आतंक मचाता कोई तो आतंकी उसको कहता हूं पर खुद जब शस्त्र उठाता हूं तो क्रांतिकारिता लगती है जो कहता कुछ, करता कुछ है, पाखण्डी उसे समझता हूं पर खुद करता जब वैसा तो चतुराई उसको कहता हूं! मैं लोगों के अन्याय-न्याय का मापदण्ड जो रखता हूं खुद पर लागू करने की बारी आती जब मन चालाकी से उन्हें बदलने की कोशिश में रहता है इसलिये स्वयं पर रखता हरदम कड़ी नजर लोगों के प्रति सहृदयता जितनी रखता हूं अपने प्रति उतना ज्यादा निर्मम रहता हूं। रचनाकाल : 12-15 मई 2026

जब अपने दुश्मन बनते हैं तो दुश्मन से भी अधिक भयानक होते हैं !

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 हाल ही में पांच राज्यों के हुए विधानसभा चुनावों की एक खासियत यह रही कि दो राज्यों के निर्वाचित होने वाले मुख्यमंत्रियों ने अपनी वर्तमान पार्टी को उसी राजनीतिक दल के खिलाफ जिताया, जिसमें वे कभी खुद शामिल थे. पश्चिम बंगाल में भाजपा के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी अभी कुछ वर्ष पहले तक ममता बनर्जी के दाहिने हाथ माने जाते थे, जिन्हें हराकर अब वे मुख्यमंत्री बने है. इसी तरह असम में लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने वाले हिमंत बिस्वा सरमा भी भाजपा में शामिल होने के पहले तक कांग्रेस के उन्हीं राहुल गांधी के खासमखास थे, जिन पर वे दल बदलने के बाद तीखा हमला करने लगे हैं. अपनी मूल पार्टी का ही कट्टर प्रतिद्वंद्वी बन जाने के ऐसे उदाहरणों की राजनीति में भरमार है. राजनीति ही नहीं, जीवन के प्राय: सभी क्षेत्रों में ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे जहां कभी घुल-मिल कर रहने वाले बाद में एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन गए. खेती या अन्य प्राॅपर्टी के विवाद में भाई द्वारा भाई की ही जान लेने या हमला करने की खबरें आए दिन पढ़ने-सुनने को मिलती हैं. मुगलकाल में तो सत्ता के लिए अपने सगे भाइयों को मौत के घाट...