हम नहीं जानते पूरा सच, फिर गलत किसी को मान बैर क्यों करते हैं ?
पिछले दिनों खबर आई कि नाॅर्वे इस बार फुटबाॅल विश्वकप को जीतने नहीं बल्कि ‘लूटने’ के इरादे से आक्रामक ‘वाइकिंग- थीम’ बना रहा है. वाइकिंग्स स्कैंडिनेविया अर्थात वर्तमान नाॅर्वे, स्वीडन और डेनमार्क में रहने वाले मध्यकालीन समुद्री लुटेरे थे, जिनकी निर्दयता के किस्से जगजाहिर हैं. जाहिर है विश्वकप को कोई लूट तो नहीं सकता लेकिन नाॅर्वे शायद दो कारणों से ऐसा कर रहा है. एक तो इसलिए कि उसके खिलाड़ियों में लुटेरों जैसी आक्रामकता आ सके, जो कि जीत में बहुत सहायक होती है और दूसरी इसलिए कि अपने पूर्वजों का महिमामंडन कर सके! लेकिन आज के सभ्य युग में कोई लुटेरों को महिमामंडित कैसे कर सकता है? नाॅर्वेजियन लोग शायद अपवाद नहीं हैं. पूर्वज अच्छे रहे हों या बुरे, हम इंसानों की प्रवृत्ति अपनी विरासत पर गर्व करने की ही होती है. इसलिए वर्तमान दृष्टि से उनके बुरे नजर आने वाले कार्यों को भी हम न्यायोचित ठहराने की कोशिश करते हैं. क्रूर से क्रूर शासक भी अपने समुदाय की नजरों में नायक होता है. प्राचीन और मध्यकालीन भारत पर हमला करने वाले मंगोल, शक, हूणों, यवनों, तुर्कों को हम भले ही क्रूर आक्रमणकारी मानते हों, ल...