जो नायक हैं, हम खलनायक तो नहीं उन्हीं की नजरों में !
आज हम बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व दशहरा मना रहे हैं. कहते हैं इसी दिन भगवान राम ने अत्याचार के प्रतीक रावण का अंत किया था. मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय के रूप में भी विजयादशमी मनाई जाती है. सम्राट अशोक द्वारा इसी दिन शस्त्र त्याग करने और अहिंसा के मार्ग पर चलने का संकल्प लेने की बात कही जाती है. इस तरह की बहुत सी कहानियां दशहरा अथवा विजयादशमी के साथ जुड़ी हुई हैं. हम मनुष्यों की यह स्वाभाविक चाहत होती है कि अपनी विरासत पर गर्व करें, इसलिए हम हर साल मनाए जाने वाले किसी दिन विशेष में अपने महापुरुषों के पुरुषार्थ के किस्से जोड़ते हैं और इस तरह अपने इतिहास को समृद्ध करते जाते हैं. लेकिन हमारे पूर्वज भी क्या नहीं चाहते होंगे कि अपने वंशजों पर गर्व करें? बेशक, हर संतान अपने पिता को आदर्श मानती है, लेकिन पिता भी चाहता है कि उसकी संतान उससे आगे निकले. नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी के जो अनुभव विरासत में मिलते हैं, उनमें अपने भी अनुभव जोड़ कर वह अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करती है. अगर ऐसा न होता और हर नई पीढ़ी को शून्य से शुरुआत करनी पड़ती तो कदाचित हम मनुष्य आदिम अवस्था से कभी आगे बढ़...