दुश्मन की नजरों से खुद को यदि देखें तो हम भी वैसे ही दिखते हैं !
इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग के बीच, सभी पक्षों द्वारा खुद को सही और दूसरे पक्ष को गलत ठहराया जा रहा है. अपने तर्कों के आधार पर सारे देश अपनी-अपनी जगह सही भी लगते हैं. अमेरिका का यह डर निराधार नहीं लगता कि ईरान ने अगर परमाणु बम बना लिया तो इजराइल के अस्तित्व को तो वह ऐसे एक ही बम से मिटा सकता है! और ईरान की बात भी अपनी जगह ठीक लगती है कि उसने किसी देश के साथ कभी युद्ध की शुरुआत नहीं की और न ही करने का इरादा रखता है बल्कि वह तो एक पीड़ित राष्ट्र है. लेकिन अपनी नजर में जब गलत कोई नहीं है तो फिर क्यों देश एक-दूसरे को मारने-मरने पर उतारू हैं? सभी देश दूसरे पर दोषारोपण करते हैं लेकिन अपने ऊपर लगाए गए आरोपों पर भी क्या वे उतनी ही शिद्दत से गौर करते हैं? ईरान के बारे में अमेरिकी मीडिया में जो छपता है, उसे अगर ईरानी लोग पढ़ें तो शायद उन्हें अपना देश एक खलनायक की तरह नजर आए. इसी तरह ईरान के अखबारों में अपने देश के बारे में छपी खबरों को पढ़कर अमेरिकियों को अपना देश क्या सचमुच उतना ही महान नजर आएगा जितनी उन्होंने धारणा बना रखी है? ईरान के कुछेक परमाणु बम बना लेने की आशंका से भयभीत ...