मन की निगरानी
मन मेरा मुझको चकमा देने की कोशिश में रहता है गढ़ता है ऐसे तर्क कि मानो किस्मत का वह मारा है सब शोषण करते उसका, दुनिया में सबसे बेचारा है इसलिये जरा वह भी ठग ले दुनिया को, क्या हो जायेगा यदि काम बने बातों को घुमा-फिरा कर वह तो झूठ नहीं कहलाएगा! दलबदलू लोगों को ‘गद्दारों’ की श्रेणी में रखता हूं पर स्वयं बदलता दल तो ‘वैचारिक परिवर्तन’ लगता है आतंक मचाता कोई तो आतंकी उसको कहता हूं पर खुद जब शस्त्र उठाता हूं तो क्रांतिकारिता लगती है कथनी-करनी में अंतर रखने वालों को पाखण्डी माना करता हूं पर अपना छल ‘व्यवहार कुशलता’ लगता है! मैं लोगों के अन्याय-न्याय का मापदण्ड जो रखता हूं खुद पर लागू करने की बारी आती जब मन चालाकी से उन्हें बदलने की कोशिश में रहता है इसलिये स्वयं पर हरदम रखता कड़ी नजर लोगों के प्रति सहृदयता जितनी रखता हूं अपने प्रति उतना ज्यादा निर्मम रहता हूं।