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दोहरा जीवन जीते-जीते हम सभी नहीं क्या पाखंडी बन जाते हैं !

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 पिछले दिनों ‘परीक्षा पे चर्चा’ करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छात्रों से पूछा कि क्या किसी को पिछले साल बोर्ड परीक्षा के टाॅपर का नाम याद है? जवाब में सारे छात्रों ने ‘ना’ में सिर हिलाया तो प्रधानमंत्री ने समझाया कि इससे साफ है कि नंबर क्षणिक होते हैं और छात्रों को अंकों की दौड़ के पीछे भागने की बजाय पढ़ाई की लय को पहचानना चाहिए तथा परीक्षा को बोझ नहीं, उत्सव की तरह लेना चाहिए.  सवाल यह है कि नंबर क्या परीक्षा से बाहर की कोई चीज है, जिस पर ध्यान दिए बिना हमें पढ़ाई की लय को पहचानना चाहिए? और अगर वह पढ़ाई का ही परिणाम है तो फिर परीक्षा में टाॅप करने वाले सिर्फ एक दिन के लिए ही खबरों की सुर्खियां बनकर क्यों रह जाते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि स्कूल-काॅलेजों की पढ़ाई हमारे व्यावहारिक जीवन से कटने के कारण बोझ बनती जा रही हो?   एक बार किसी पहाड़ी पर चढ़ते पर्यटकों ने देखा कि तेरह-चौदह साल की एक पहाड़ी लड़की भी पांच-छह साल के एक बच्चे को पीठ पर लादे कुछ गुनगुनाती ऊपर जा रही थी. थककर बेहाल हो चुके पर्यटकों ने पूछा कि इतना बोझ लेकर चढ़ते हुए क्या उसे थकान महसूस नहीं ...

चेन रिएक्शन

जब गर्मी बढ़ने लगती है गुस्सा भी बढ़ने लगता है जब गुस्सा बढ़ जाता है तो अपराध अधिक दुनिया में होने लगता है। कुछ इसी तरह से चेन रिएक्शन शायद सारी चीजों में ही होता है यदि एक कड़ी भी टूटे तो डर सभी बिखर जाने का पैदा होता है। पर अगर बुराई संक्रामक होती है तो अच्छाई भी तो इसी तरह होती होगी हम खुद को अच्छा बना सकें तो असर  नहीं   क्या औरों पर उसका होगा! रचनाकाल : 6 जनवरी 2026

बांसुरी न बज पाए, इस खातिर शातिर शासक बांस ही जला देते हैं !

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 जब देश गणतंत्र दिवस मना रहा था, पश्चिम बंगाल में फास्ट फूड चेन ‘वाओ मोमो’ के गोदाम में लगी भीषण आग में लगभग 25 मजदूर खाक हो गए. दो दर्जन से अधिक जिंदगियों की कीमत इतनी कम तो नहीं होनी चाहिए थी कि देशवासियों को घटना के दो-तीन दिन बाद सोशल मीडिया के जरिये असलियत पता चले!   पिछले साल की शुरुआत में, प्रयागराज में जब कुम्भ मेले में भगदड़ मची तो सोशल मीडिया से ही लोगों ने घटना की भयावहता जानी, सरकारी आंकड़ों में तो बहुत देर तक कोई मरा ही नहीं! और अन्य स्रोतों से पता चलने के बाद जो आधिकारिक आंकड़ा जारी किया गया, उस पर शायद ही किसी ने विश्वास किया हो! पांच साल पहले, कोरोना काल में भी महामारी से जब लोग कीड़े-मकोड़ों की भांति मर रहे थे, तब मृतकों का सही आंकड़ा बताने की बजाय सरकारें कब्रिस्तानों की दीवार की ऊंचाई बढ़ाने में जुटी थीं! उस वक्त भी यह सोशल मीडिया ही था जिस पर लोग नदियों में लाशें तैरती दिखने और गंगा किनारे बालू में शवों को दबाए जाने की खबरें शेयर कर रहे थे.  वास्तविकता छुपाने की सरकारों की कोशिश कोई नई बात नहीं है. वर्ष 1954 में भी प्रयागराज में कुम्भ मेले के दौरा...

नींद

जब नींद बहुत आती थी तब मैं खुद को कोसा करता था जो दावा करते हैं कि सिर्फ सोते हैं घंटे तीन-चार उनके जैसा बनने की हसरत रखता था। ढल चुकी उम्र अब नींद सिर्फ आती है घंटे तीन-चार बेचैनी से करवटें बदलता रहता हूं भरपेट नहीं जी पाया जो दिन उनको फिर पाने की हसरत रखता हूं! यह सच है उठना सुबह फायदा करता है पर सहज नींद खुलने में और तोड़ने में अंतर धरती-आकाश बराबर रहता है इसलिये जल्द सोने को प्रेरित करता हूं पर नींद किसी की कच्ची तोड़े जाने से मैं डरता हूं। रचनाकाल : 31 जनवरी 2026

अच्छे लोगों की कमजोरी

जीवन में इतने अच्छे-अच्छे लोग मिले सबसे कुछ अच्छी सीख मिली जिनको कहते थे लोग बुरे वे भी तो इतने बुरे न थे! करते ही उनके साथ जरा-सी अच्छाई वे दूना बदला देने में जुट जाते थे खुद भले गिरे हों दलदल में पर मुझ पर लगने से वे दाग बचाते थे! जितना वे करते थे मुझ पर विश्वास काश! मैं भी उन पर उतना विश्वास जता पाता मैले कपड़ों से डरे बिना यदि उनको गले लगा पाता तो दुनिया यह कितनी सुंदर बन सकती थी! रचनाकाल : 29 जनवरी 2026

हम तुच्छ लाभ की खातिर क्यों कुर्बान बड़े हित करते हैं ?

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 उत्तराखंड में सरकार ने लोहारीनाग पाला जलविद्युत परियोजना को बंद करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. 650 करोड़ रु. खर्च होने के बाद बंद की जाने वाली इस परियोजना के खिलाफ पर्यावरणविद्‌ व आईआईटी प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल ने वर्ष 2018 में ही आमरण अनशन कर 111 दिनों  बाद अपने प्राण त्याग दिए लेकिन सरकार का दिल नहीं पसीजा था. अब पिछले दिनों धराली आपदा में सड़क बहने और नदी के बीच बने डायवर्सन को नुकसान पहुंचने के बाद सुरंगें सील करने का फैसला किया गया है.  अगर आईआईटी का प्रोफेसर रह चुका व्यक्ति किसी चीज के लिए अपनी जान की बाजी लगा रहा था तो उसे इतने हल्के में तो नहीं लिया जाना चाहिए था! परंतु शासन की जिस हठधर्मिता को रोकने के लिए प्रकृति को धराली जैसी आपदा लाकर सैकड़ों लोगों की जान लेनी पड़े, वह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत की कीमत पर रुक भी कैसे सकती थी! 650 करोड़ रु. पानी में जाना मामूली बात नहीं है लेकिन जब हमें पता हो कि परियोेजना पूरी होने के बाद कितनी जबर्दस्त तबाही मचती तो शायद यह नुकसान भी कम लगता है. हमें जानना चाहिए कि बांध सिर्फ पानी ही नहीं रोकते, जलीय जीवों के पूरे जीवन-चक्र ...

सरलता के फायदे

मैं पहले टेढ़ी बातें जल्दी समझ ही नहीं पाता था जब लोग व्यंग्य करते उसको सचमुच तारीफ समझता था। क्षमता लेकिन जबसे पाई यह समझ सकूं है कौन कुटिल मैं भी न सरल पहले जैसा रह सका कुटिलता लगी समाने मुझमें भी! इसलिये सरल बनने की ही अब फिर से कोशिश करता हूं टेढ़ी बातों का सहकर भी आघात सरल-सीधा जवाब ही देता हूं टेढ़ों की टेढ़े ही जानें मैं तो अपनी दुनिया में ही खुश रहता हूं। रचनाकाल : 22 जनवरी 2026