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सत्याग्रह में नहीं हारता कोई, हिंसा नहीं जीतने देती है !

 लोकतंत्र में जनता ही सरकार चुनती है लेकिन कई बार परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि जनता को अपनी उसी सरकार के खिलाफ आंदोलन करना पड़ता है. अक्सर होता यह है कि सरकार ऐसे आंदोलनों को बल प्रयोग के जरिये कुचलने की कोशिश करती है और आंदोलनकारी सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़ व सुरक्षा बलों के खिलाफ हिंसा के जरिये अपनी मांगें मनवाने की कोशिश करते हैं. नतीजतन दोनों पक्षों का नुकसान होता है. इसीलिए करीब एक शताब्दी पहले महात्मा गांधी ने अहिंसक सत्याग्रह का मार्ग दिखाया था, जिसमें दोनों पक्षों की जीत होती है. आज भी जो उस मार्ग का आश्रय लेता है वह घाटे में नहीं रहता, फिर भी ऐसा क्यों होता है कि हमें हिंसा और तोड़फोड़ का आश्रय लेना ही सबसे आसान लगता है?   हाल ही में काॅकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के दौरान कुछ युवा गांधीजी के मार्ग पर चलते दिखे. मीडिया माध्यमों ने दिखाया कि नागपुर के एक युवा को सुरक्षा बल के जवान लाठियों से पीट रहे थे और वह युवा कोई प्रतिरोध करने के बजाय चिल्ला रहा था कि मारो सर, मारो, और मारो मुझे... और अचानक ही लाठियां थम गईं. एक महिला सुरक्षा कर्मी युवक को बचाते...

आप ठगे सुख होत है...

धन चोरी करने, रिश्वत लेने वालों को जो मिलता है मेहनत करते जो, कई गुना वे अधिक कमाया करते हैं जो नकल किया करते वे पास भले ही हो जायें, लेकिन मेरिट में तो पढ़ने वाले बच्चे ही आया करते हैं। जो ठगते किसी और को, थोड़ी देर भले ही खुश हो लें नुकसान उठाकर भी लेकिन, रह पाने में ईमानदार जो सुख मिलता है अतुलनीय मन ही मन में बेईमानी करने वाले महसूस नहीं कर सकते हैं। हम तुच्छ लाभ की खातिर नीचे गिरते हैं क्षमता थी लेकिन उठने की जितनी ऊपर हम उसे गंवाने की क्षति का अहसास कभी कर पाए तो क्या माफ स्वयं को किसी तरह कर सकते हैं? रचनाकाल : 21 जुलाई 2026

दानवीरों के साथ-साथ कैसे बढ़ती जा रही है दान-चोरों की संख्या ?

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 अयोध्या के राम मंदिर में दान चोरी की घटना उजागर होने के बाद, देश के अलग-अलग हिस्सों से इसी तरह की चोरी की ढेरों घटनाएं सामने आने लगी हैं. हिंदू धर्म के चार पवित्र धामों में से एक बद्रीनाथ धाम में चोरी कांड की जांच एसआईटी कर रही है. वैष्णो देवी मंदिर में भी इसी तरह के गबन का मामला कोर्ट में पहुंच गया है, आरोप है कि मंदिर में भक्तों द्वारा अर्पित की गई करीब 20 टन चांदी, जिसकी कीमत 550 करोड़ रु. होनी चाहिए, में मिलावट की गई या उसे बदल दिया गया और टकसाल में गलाए जाने पर वह मात्र 30 करोड़ की निकली. गुजरात के प्रसिद्ध अंबाजी मंदिर में दान की चोरी का सीसीटीवी फुटेज वायरल हो रहा है और इस मामले में मंदिर से जुड़े तीन कर्मचारियों को गिरफ्तार किया जा चुका है. छत्तीसगढ़ के कांकेर में पांच मंदिरों और मध्यप्रदेश के अमरकंटक में व नलखेड़ा स्थित बगलामुखी मंदिर में भी दान और चढ़ावे में गंभीर अनियमितताओं के मामले सामने आ चुके हैं.  मंदिरों में दान देने की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है. भारत में नौ लाख से अधिक पंजीकृत मंदिर हैं. अधिकांश छोटे मंदिरों के पंजीकृत रिकाॅर्ड नहीं होने के कारण स...

सहानुभूति की शक्ति

मुझसे लोगों के कष्ट न देखे जाते थे हरसम्भव कोशिश करता सुखी बनाने की इस चक्कर में पर भीतर से कमजोर लोग हो जाते थे सहृदयता मेरी उनकी खातिर निर्दयता बन जाती थी प्रतिकूल परिस्थितियों को झेल न पाते थे। इसलिये नहीं अब दु:ख उनके कम करने की कोशिश करता उनसे भी ज्यादा कष्ट स्वयं स्वेच्छा से भोगा करता हूं मेरे आगे उनके दु:ख की छोटी लकीर जब दिखती है तो सम्बल उनको मिलता है दु:ख-कष्टों को आसानी से सह पाते हैं भीतर से बनते जाते हैं मजबूत मुझे भी अपने संग मजबूत बनाते जाते हैं। रचनाकाल : 16 जुलाई 2026

आर्थिक असमानता : हल तो बहुत सरल है, लेकिन घंटी बांधे कौन ?

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 दुनिया में आर्थिक असमानता से पैदा हुई समस्याओं के हल के लिए हाल ही में पेरिस स्थित वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब ने अपनी ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट में एक सरल उपाय सुझाया है. रिपोर्ट का कहना है कि एक प्रतिशत सुपर-रिच पर अतिरिक्त टैक्स लगा दिया जाए तो दुनिया की 99 प्रतिशत आबादी की समस्याओं को सुलझाया जा सकता है. यह टैक्स भी इतना अधिक नहीं होगा कि अति-अमीरों की कमर ही तोड़ दे. इसके अनुसार 20 लाख डाॅलर (लगभग 19 करोड़ रुपए) से अधिक संपत्ति वाले हर व्यक्ति को धन-कर देना होगा जो एक प्रतिशत प्रति वर्ष से शुरू होगा और धीरे-धीरे बढ़कर उन लोगों के लिए 20 प्रतिशत तक हो जाएगा जिनकी संपत्ति 50 करोड़ डाॅलर से अधिक है.  योजना तो बहुत अच्छी है, दिक्कत सिर्फ यही है कि इसे क्रियान्वित कौन करेगा? निश्चित रूप से किसी भी देश के सत्ता संचालन के सूत्र गरीबों के हाथ में नहीं होते और अमीरों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारेंगे. कहानी है कि एक बार बिल्ली से त्रस्त चूहों की सभा हुई. इसमें उपाय सुझाया गया कि बिल्ली के गले में एक घंटी बांध दी जाए ताकि वह जहां भी जाए, घंटी की आवाज सुनकर...

असली जीत

वैसे तो मैं जिद्दी इतना ज्यादा हूं गुस्सा हो जाऊं अगर किसी से सालों तक बिन बोले भी रह सकता हूं पर अगले ही क्षण लगता है जीवन तो चार दिनों का है गुस्से की मेरे जीत भले ही हो जाये पर समय बीत जो जायेगा क्या फिर से वापस आयेगा? इसलिये मान लेता हूं हार तुरंत विरोधी के आगे झुक जाता हूं जब जीत भरोसा लेता हूं मनवाना अपनी बात सरल हो जाता है। हम बनकर मित्र किसी का जो भी चाहे करवा सकते हैं फिर क्यों शत्रुता निभाकर सबकुछ तहस-नहस कर देते हैं? (रचनाकाल : 9-10 जुलाई 2026)

अंधी दौड़

हम जाग रहे या सपना कोई देख रहे कुछ भी तो समझ नहीं आता पर दौड़ अनवरत जारी है। है नहीं किसी को पता कहां हम जायेंगे पर पिछड़ न जायें, इस डर से ज्यादा से ज्यादा तेज दौड़ते जाते हैं रफ्तार मगर बढ़ती जितनी डर उतना बढ़ता जाता है उतना ही होकर बदहवास हम और दौड़ते जाते हैं! जो ब्रेक लगाकर कभी रखे थे पुरखों ने हमने उनको बाधाएं समझ निकाल दिया नैतिकताओं को दकियानूसी कहकर स्पीड-ब्रेकरों को तो हमने तोड़ दिया पर नये बैरियर स्वयं न कोई बना सके जीवन को अपने अनुशासन में रख न सके अब बेलगाम यह दौड़ डराती जाती है दुर्घटना का अंदेशा बढ़ता जाता है। (रचनाकाल : 8 जुलाई 2026)