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जीतने की कला

मैं जो भी करता उसके पीछे होता है कुछ तर्क अकारण कोई काम नहीं करता कई बार मगर लोगों को अपना तर्क नहीं समझा पाता जिससे वे मुझको गलत समझने लगते हैं या पाल गलतफहमी दुश्मन बन जाते हैं। मैं भी लेकिन जिन लोगों को करता हूं नहीं पसंद कहीं ऐसा तो नहीं कि वे भी अपना तर्क न समझा पाते हों मैं गलतफहमियों के कारण उनके प्रति चिढ़ता रहता हूं! मतभेद इसलिये जिससे भी अब होता है मैं नहीं द्वेष उससे रखता करता हूं उसका भी पूरा सम्मान देख कर हो जाता हूं चकित कि मुझको करते आदर देख विरोधी मेरा, अपना मुझे समझने लगता है! hemdhar.blogspot.com रचनाकाल : 30 अक्टूबर-1 नवंबर 2026

सकारात्मक शक्तियां क्यों नहीं कर पातीं गठबंधन !

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 पाकिस्तान द्वारा सऊदी अरब और तुर्किये के साथ मिलकर मक्का पैक्ट किए जाने की खबर अभी पुरानी भी नहीं पड़ी है कि पाक ने इंडोनेशिया, तुर्किये और कतर के साथ मिल ‘बद्र करार’ कर एक और सैन्य गठबंधन बना लिया है. हालांकि इसमें कोई नई बात नहीं है, दुनिया में इस तरह के सैकड़ों गठबंधन हैं. नाटो के कारण तो रूस का पिछले साढ़े चार वर्षों से यूक्रेन के साथ युद्ध जारी है. पिछली सदी में अमेरिका और रूस के नेतृत्व वाले ऐसे गठबंधनों के कारण ही लंबा शीतयुद्ध चला था.  जिस तरह अकेले व्यक्ति की तुलना में व्यक्तियों का समूह ज्यादा काम कर पाता है, उसी तरह अकेले देश की तुलना में देशों के गठबंधन से फायदा होता है. लेकिन जिस तरह हम अपनी सुरक्षा या आर्थिक फायदे के लिए गठबंधन करते हैं, वैसे ही नैतिक विकास के लिए कोई गठबंधन क्यों नहीं करते?   गठबंधन के जरिये हम एक-दूसरे से नई-नई चीजें सीखते या उनका आदान-प्रदान करते हैं. सवाल यह है कि हम अपने स्वार्थ या नकारात्मक चीजों के लिए तो बहुत जल्दी गठबंधन कर लेते हैं लेकिन परमार्थ या सकारात्मक चीजों के लिए गठजोड़ बनाने की उत्सुकता क्यों नहीं दिखा पाते? निंदा रस...

निरपराध के दु:ख का सुख

जब कच्चा था, कमियां थीं मुझमें बहुत मारता था तब कोई पत्थर तो पीड़ा होती इतनी असह्य मैं सहन नहीं कर पाता था। पीड़ा तो अब भी होती है पर वह भी सुमधुर लगती है होने पर भी निर्दोष, सजा जो पाता है सुख नहीं दूसरा कोई वैसा पाता है। दु:ख लेकिन अब यह बात सोच कर होता है निर्दोषों को जो पत्थर मारा करते हैं अहसास कभी जब होगा अपनी गलती का कैसे वे खुद को माफ कभी कर पायेंगे! रचनाकाल : 20 अक्टूबर 2026

जो नायक हैं, हम खलनायक तो नहीं उन्हीं की नजरों में !

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 आज हम बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व दशहरा मना रहे हैं. कहते हैं इसी दिन भगवान राम ने अत्याचार के प्रतीक रावण का अंत किया था. मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय के रूप में भी विजयादशमी मनाई जाती है. सम्राट अशोक द्वारा इसी दिन शस्त्र त्याग करने और अहिंसा के मार्ग पर चलने का संकल्प लेने की बात कही जाती है. इस तरह की बहुत सी कहानियां दशहरा अथवा विजयादशमी के साथ जुड़ी हुई हैं.  हम मनुष्यों की यह स्वाभाविक चाहत होती है कि अपनी विरासत पर गर्व करें, इसलिए हम हर साल मनाए जाने वाले किसी दिन विशेष में अपने महापुरुषों के पुरुषार्थ के किस्से जोड़ते हैं और इस तरह अपने इतिहास को समृद्ध करते जाते हैं. लेकिन हमारे पूर्वज भी क्या नहीं चाहते होंगे कि अपने वंशजों पर गर्व करें? बेशक, हर संतान अपने पिता को आदर्श मानती है, लेकिन पिता भी चाहता है कि उसकी संतान उससे आगे निकले. नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी के जो अनुभव विरासत में मिलते हैं, उनमें अपने भी अनुभव जोड़ कर वह अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करती है. अगर ऐसा न होता और हर नई पीढ़ी को शून्य से शुरुआत करनी पड़ती तो कदाचित हम मनुष्य आदिम अवस्था से कभी आगे बढ़...

बस इतना ही देना माता...

मैं शक्तिदायिनी माता से मांगा करता था शक्ति किया करता था व्रत-उपवास बहुत। अब भी रखता उतना ही व्रत-उपवास मगर अब नहीं मांगता शक्ति प्रार्थना केवल इतनी करता हूं जो भी है मेरे पास अभी उसका कर पाऊं सदुपयोग इतना विवेक बस दे देना। बल कम होने से अधिक मुझे बल के मद में अत्याचारी बन जाने से डर लगता है। रचनाकाल : 4 अक्टूबर 2026

नया विधान

राम लड़े थे रावण से बाहर के अत्याचारी का कर अंत जगत में ‘राम-राज्य’ ले आये थे। छुप गया मगर रावण अब हम सबके भीतर लाने की खातिर राम-राज्य खुद से हमको लड़ना होगा भीतर का रावण जला दशहरा हमें मनाने का विधान अब नया शुरू करना होगा!   रचनाकाल : 16 अक्टूबर 2026

दोष दिखानेवालों का आभारी होने के बजाय हम क्यों हो जाते हैं नाराज ?

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 लगभग छह साल पहले, हरियाणा में सिरसा जिले के गांव माधोसिंघाना में एक दुकान में गाली देकर डिस्पोजल मांगने वाले युवक की हत्या कर दी गई थी. अब उसी सिरसा और आसपास के क्षेत्र में गाली देने की लोगों की आदत छुड़ाने के लिए ‘गाली बंद घर’ नामक एक अभिनव अभियान चलाया जा रहा है. सामाजिक कार्यकर्ता और ‘सेल्फी विद डाॅटर’ फाउंडेशन के संस्थापक सुनील जागलान द्वारा शुरू की गई इस पहल से अब तक दो हजार लड़कियां जुड़ चुकी हैं. वे एक चार्ट बनाकर अपने घर के सभी सदस्यों का नाम दर्ज करती हैं और जो सदस्य दिनभर में जितनी बार गाली देता है, उसके नाम के आगे उस दिन वह आंकड़ा दर्ज करती हैं. इसका असर यह हुआ है कि इलाके में लोगों द्वारा गालियों के प्रयोग में 70 प्रतिशत तक की कमी आई है. गांव बीबीपुर के सरपंच रह चुके जागलान पिछले 12 वर्षों से यह मुहिम चला रहे हैं, जिसकी प्रशंसा ब्रिटेन का अखबार ‘द गार्जियन’ भी कर चुका है.   बिना किसी जोर-जबर्दस्ती के, सिर्फ आईना दिखाकर लोगों की गाली देने की आदत छुड़ाने का यह प्रयास अद्‌भुत है. दरअसल कोई भी नहीं चाहता कि वह बदसूरत नजर आए. दिक्कत यह है कि हमें खुद अपना चेहरा दि...