साध्य को साधन से अलग समझने की नासमझी ही है समस्याओं की जड़
क्या आपने भी पिछले कुछ दिनों, महीनों या वर्षों में महसूस किया है कि किसी चीज पर ध्यान एकाग्र करने की आपकी क्षमता कमजोर होती जा रही है? बहुत से लोग शिकायत कर रहे हैं कि अब उनके लिए किसी चीज पर ज्यादा देर तक दिमाग स्थिर रख पाना कठिन होता जा रहा है. अब लोग 2-3 घंटे की फिल्में देखने के बजाय यूट्यूब शाॅर्ट्स, इंस्टाग्राम रील्स और टिकटाॅक जैसे 15 से 60 सेकंड के वीडियो देखना पसंद करते हैं. पूरा समाचार या विश्लेषणात्मक लेख पढ़ने के बजाय सिर्फ सुर्खियां (हेडलाइंस) या शॉर्ट-न्यूज ऐप्स पर 60 शब्दों का सारांश पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं. पारंपरिक तरीके से खाना पकाने में समय देने के बजाय 2-मिनट नूडल्स, रेडी-टू-ईट भोजन और 10-20 मिनट में डिलीवरी करने वाले क्विक-कॉमर्स ऐप्स की मांग चरम पर है. फोन पर लोग अब लंबी बात करने के बजाय छोटे टेक्स्ट मैसेज, वॉयस नोट्स या सिर्फ इमोजी भेजकर बात खत्म करना चाहते हैं. परिश्रम के बल पर पैसे कमाने के बजाय रातोंरात अमीर बनना चाहते हैं. साहित्य के क्षेत्र में उपन्यास या लंबी कहानियां तो दूर, कविताएं या लघुकथाएं तक पढ़ पाने का सब्र साहित्य प्रेमियों में खत्म होता ...