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जीवन को जिससे बनना था आसान, उसी से डर क्यों लगता है ?

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 हाल ही में आईटी सेक्टर के शेयरों में जिस तरह से अचानक भारी गिरावट देखने को मिली, उससे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर जताई जा रही आशंकाएं गहरा गई हैं. हालांकि बाजार की और विशेषज्ञों की चिंताएं अलग-अलग हैं लेकिन उनमें समानता यह है कि दोनों का स्वरूप डरावना है.  विशेषज्ञ काफी समय से आशंका जताते रहे हैं कि एआई कहीं मनुष्यों के नियंत्रण से बाहर न निकल जाए. पिछले दिनों ‘मोल्टबुक’ नामक एक ऐसे प्लेटफाॅर्म की खबर आई जो एआई एजेंट्‌स (ऐसे उन्नत सॉफ्टवेयर प्रोग्राम जो बिना मानवीय हस्तक्षेप के जटिल कार्यों को पूरा कर सकते हैं) के लिए बना है अर्थात जहां हजारों एआई एजेंट्‌स बातचीत करते हैं और एक-दूसरे के अनुभवों से सीखते हैं. हम मनुष्य इस प्लेटफाॅर्म की गतिविधियों को सिर्फ दर्शक की तरह देख सकते हैं, उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते. चौंकाने वाली बात यह है कि ये एआई एजेंट्‌स हम इंसानों की तरह ही चुगलखोरी की कला में माहिर दिखे. वे अपने साथी एआई एजेंटों की नहीं बल्कि हम इंसानों की बुराई कर रहे थे. यही नहीं, उन्होंने आपस में बातचीत की एक ऐसी भाषा विकसित कर ली है जिसे इंसान समझ ही नहीं सकते. ह...

हितैषी दुश्मन

कुछ लोग कभी जब हद से ज्यादा पत्थर मारा करते हैं पीड़ा जब सहन नहीं होती तब लगता कछुए सी मोटी अपनी भी खाल बना लूं मैं। लेकिन फिर सोचा करता हूं जो पत्थर मारा करते हैं कुछ दुर्गुण तो मुझमें उनको दिखता होगा यूं ही तो कोई नहीं किसी के पीछे पड़ जाता होगा! इसलिये चाहते दुश्मन मेरे जितनी भी पीड़ा देना स्वेच्छा से वह सब सहता हूं उनकी नजरों से देख स्वयं को दोष दूर करने की कोशिश करता हूं। सच तो यह है मित्रों को मेरे दोष नहीं दिख पाते हैं दुश्मन ही मेरी कमियां मुझे दिखाते हैं इसलिये अधिक मित्रों से भी  वे नजर हितैषी आते हैं। रचनाकाल : 10 फरवरी 2026

दोहरा जीवन जीते-जीते हम सभी नहीं क्या पाखंडी बन जाते हैं !

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 पिछले दिनों ‘परीक्षा पे चर्चा’ करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छात्रों से पूछा कि क्या किसी को पिछले साल बोर्ड परीक्षा के टाॅपर का नाम याद है? जवाब में सारे छात्रों ने ‘ना’ में सिर हिलाया तो प्रधानमंत्री ने समझाया कि इससे साफ है कि नंबर क्षणिक होते हैं और छात्रों को अंकों की दौड़ के पीछे भागने की बजाय पढ़ाई की लय को पहचानना चाहिए तथा परीक्षा को बोझ नहीं, उत्सव की तरह लेना चाहिए.  सवाल यह है कि नंबर क्या परीक्षा से बाहर की कोई चीज है, जिस पर ध्यान दिए बिना हमें पढ़ाई की लय को पहचानना चाहिए? और अगर वह पढ़ाई का ही परिणाम है तो फिर परीक्षा में टाॅप करने वाले सिर्फ एक दिन के लिए ही खबरों की सुर्खियां बनकर क्यों रह जाते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि स्कूल-काॅलेजों की पढ़ाई हमारे व्यावहारिक जीवन से कटने के कारण बोझ बनती जा रही हो?   एक बार किसी पहाड़ी पर चढ़ते पर्यटकों ने देखा कि तेरह-चौदह साल की एक पहाड़ी लड़की भी पांच-छह साल के एक बच्चे को पीठ पर लादे कुछ गुनगुनाती ऊपर जा रही थी. थककर बेहाल हो चुके पर्यटकों ने पूछा कि इतना बोझ लेकर चढ़ते हुए क्या उसे थकान महसूस नहीं ...

चेन रिएक्शन

जब गर्मी बढ़ने लगती है गुस्सा भी बढ़ने लगता है जब गुस्सा बढ़ जाता है तो अपराध अधिक दुनिया में होने लगता है। कुछ इसी तरह से चेन रिएक्शन शायद सारी चीजों में ही होता है यदि एक कड़ी भी टूटे तो डर सभी बिखर जाने का पैदा होता है। पर अगर बुराई संक्रामक होती है तो अच्छाई भी तो इसी तरह होती होगी हम खुद को अच्छा बना सकें तो असर  नहीं   क्या औरों पर उसका होगा! रचनाकाल : 6 जनवरी 2026

बांसुरी न बज पाए, इस खातिर शातिर शासक बांस ही जला देते हैं !

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 जब देश गणतंत्र दिवस मना रहा था, पश्चिम बंगाल में फास्ट फूड चेन ‘वाओ मोमो’ के गोदाम में लगी भीषण आग में लगभग 25 मजदूर खाक हो गए. दो दर्जन से अधिक जिंदगियों की कीमत इतनी कम तो नहीं होनी चाहिए थी कि देशवासियों को घटना के दो-तीन दिन बाद सोशल मीडिया के जरिये असलियत पता चले!   पिछले साल की शुरुआत में, प्रयागराज में जब कुम्भ मेले में भगदड़ मची तो सोशल मीडिया से ही लोगों ने घटना की भयावहता जानी, सरकारी आंकड़ों में तो बहुत देर तक कोई मरा ही नहीं! और अन्य स्रोतों से पता चलने के बाद जो आधिकारिक आंकड़ा जारी किया गया, उस पर शायद ही किसी ने विश्वास किया हो! पांच साल पहले, कोरोना काल में भी महामारी से जब लोग कीड़े-मकोड़ों की भांति मर रहे थे, तब मृतकों का सही आंकड़ा बताने की बजाय सरकारें कब्रिस्तानों की दीवार की ऊंचाई बढ़ाने में जुटी थीं! उस वक्त भी यह सोशल मीडिया ही था जिस पर लोग नदियों में लाशें तैरती दिखने और गंगा किनारे बालू में शवों को दबाए जाने की खबरें शेयर कर रहे थे.  वास्तविकता छुपाने की सरकारों की कोशिश कोई नई बात नहीं है. वर्ष 1954 में भी प्रयागराज में कुम्भ मेले के दौरा...

नींद

जब नींद बहुत आती थी तब मैं खुद को कोसा करता था जो दावा करते हैं कि सिर्फ सोते हैं घंटे तीन-चार उनके जैसा बनने की हसरत रखता था। ढल चुकी उम्र अब नींद सिर्फ आती है घंटे तीन-चार बेचैनी से करवटें बदलता रहता हूं भरपेट नहीं जी पाया जो दिन उनको फिर पाने की हसरत रखता हूं! यह सच है उठना सुबह फायदा करता है पर सहज नींद खुलने में और तोड़ने में अंतर धरती-आकाश बराबर रहता है इसलिये जल्द सोने को प्रेरित करता हूं पर नींद किसी की कच्ची तोड़े जाने से मैं डरता हूं। रचनाकाल : 31 जनवरी 2026

अच्छे लोगों की कमजोरी

जीवन में इतने अच्छे-अच्छे लोग मिले सबसे कुछ अच्छी सीख मिली जिनको कहते थे लोग बुरे वे भी तो इतने बुरे न थे! करते ही उनके साथ जरा-सी अच्छाई वे दूना बदला देने में जुट जाते थे खुद भले गिरे हों दलदल में पर मुझ पर लगने से वे दाग बचाते थे! जितना वे करते थे मुझ पर विश्वास काश! मैं भी उन पर उतना विश्वास जता पाता मैले कपड़ों से डरे बिना यदि उनको गले लगा पाता तो दुनिया यह कितनी सुंदर बन सकती थी! रचनाकाल : 29 जनवरी 2026