दोहरा जीवन जीते-जीते हम सभी नहीं क्या पाखंडी बन जाते हैं !
पिछले दिनों ‘परीक्षा पे चर्चा’ करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छात्रों से पूछा कि क्या किसी को पिछले साल बोर्ड परीक्षा के टाॅपर का नाम याद है? जवाब में सारे छात्रों ने ‘ना’ में सिर हिलाया तो प्रधानमंत्री ने समझाया कि इससे साफ है कि नंबर क्षणिक होते हैं और छात्रों को अंकों की दौड़ के पीछे भागने की बजाय पढ़ाई की लय को पहचानना चाहिए तथा परीक्षा को बोझ नहीं, उत्सव की तरह लेना चाहिए. सवाल यह है कि नंबर क्या परीक्षा से बाहर की कोई चीज है, जिस पर ध्यान दिए बिना हमें पढ़ाई की लय को पहचानना चाहिए? और अगर वह पढ़ाई का ही परिणाम है तो फिर परीक्षा में टाॅप करने वाले सिर्फ एक दिन के लिए ही खबरों की सुर्खियां बनकर क्यों रह जाते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि स्कूल-काॅलेजों की पढ़ाई हमारे व्यावहारिक जीवन से कटने के कारण बोझ बनती जा रही हो? एक बार किसी पहाड़ी पर चढ़ते पर्यटकों ने देखा कि तेरह-चौदह साल की एक पहाड़ी लड़की भी पांच-छह साल के एक बच्चे को पीठ पर लादे कुछ गुनगुनाती ऊपर जा रही थी. थककर बेहाल हो चुके पर्यटकों ने पूछा कि इतना बोझ लेकर चढ़ते हुए क्या उसे थकान महसूस नहीं ...