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जब दु:ख भी सुख बन जाता है...

जब कच्चा था, कमियां थीं मुझमें बहुत मारता था तब कोई पत्थर तो पीड़ा होती इतनी असह्य मैं सहन नहीं कर पाता था। पीड़ा तो अब भी होती है पर वह भी सुमधुर लगती है होने पर भी निर्दोष, सजा जो पाता है सुख नहीं दूसरा कोई वैसा पाता है। दु:ख लेकिन अब यह बात सोच कर होता है निर्दोषों को जो पत्थर मारा करते हैं अहसास कभी जब होगा अपनी गलती का कैसे वे खुद को माफ कभी कर पायेंगे! रचनाकाल : 20 अक्टूबर 2026

जो नायक हैं, हम खलनायक तो नहीं उन्हीं की नजरों में !

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 आज हम बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व दशहरा मना रहे हैं. कहते हैं इसी दिन भगवान राम ने अत्याचार के प्रतीक रावण का अंत किया था. मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय के रूप में भी विजयादशमी मनाई जाती है. सम्राट अशोक द्वारा इसी दिन शस्त्र त्याग करने और अहिंसा के मार्ग पर चलने का संकल्प लेने की बात कही जाती है. इस तरह की बहुत सी कहानियां दशहरा अथवा विजयादशमी के साथ जुड़ी हुई हैं.  हम मनुष्यों की यह स्वाभाविक चाहत होती है कि अपनी विरासत पर गर्व करें, इसलिए हम हर साल मनाए जाने वाले किसी दिन विशेष में अपने महापुरुषों के पुरुषार्थ के किस्से जोड़ते हैं और इस तरह अपने इतिहास को समृद्ध करते जाते हैं. लेकिन हमारे पूर्वज भी क्या नहीं चाहते होंगे कि अपने वंशजों पर गर्व करें? बेशक, हर संतान अपने पिता को आदर्श मानती है, लेकिन पिता भी चाहता है कि उसकी संतान उससे आगे निकले. नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी के जो अनुभव विरासत में मिलते हैं, उनमें अपने भी अनुभव जोड़ कर वह अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करती है. अगर ऐसा न होता और हर नई पीढ़ी को शून्य से शुरुआत करनी पड़ती तो कदाचित हम मनुष्य आदिम अवस्था से कभी आगे बढ़...

बस इतना ही देना माता...

मैं शक्तिदायिनी माता से मांगा करता था शक्ति किया करता था व्रत-उपवास बहुत। अब भी रखता उतना ही व्रत-उपवास मगर अब नहीं मांगता शक्ति प्रार्थना केवल इतनी करता हूं जो भी है मेरे पास अभी उसका कर पाऊं सदुपयोग इतना विवेक बस दे देना। बल कम होने से अधिक मुझे बल के मद में अत्याचारी बन जाने से डर लगता है। रचनाकाल : 4 अक्टूबर 2026

नया विधान

राम लड़े थे रावण से बाहर के अत्याचारी का कर अंत जगत में ‘राम-राज्य’ ले आये थे। छुप गया मगर रावण अब हम सबके भीतर लाने की खातिर राम-राज्य खुद से हमको लड़ना होगा भीतर का रावण जला दशहरा हमें मनाने का विधान अब नया शुरू करना होगा!   रचनाकाल : 16 अक्टूबर 2026

दोष दिखानेवालों का आभारी होने के बजाय हम क्यों हो जाते हैं नाराज ?

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 लगभग छह साल पहले, हरियाणा में सिरसा जिले के गांव माधोसिंघाना में एक दुकान में गाली देकर डिस्पोजल मांगने वाले युवक की हत्या कर दी गई थी. अब उसी सिरसा और आसपास के क्षेत्र में गाली देने की लोगों की आदत छुड़ाने के लिए ‘गाली बंद घर’ नामक एक अभिनव अभियान चलाया जा रहा है. सामाजिक कार्यकर्ता और ‘सेल्फी विद डाॅटर’ फाउंडेशन के संस्थापक सुनील जागलान द्वारा शुरू की गई इस पहल से अब तक दो हजार लड़कियां जुड़ चुकी हैं. वे एक चार्ट बनाकर अपने घर के सभी सदस्यों का नाम दर्ज करती हैं और जो सदस्य दिनभर में जितनी बार गाली देता है, उसके नाम के आगे उस दिन वह आंकड़ा दर्ज करती हैं. इसका असर यह हुआ है कि इलाके में लोगों द्वारा गालियों के प्रयोग में 70 प्रतिशत तक की कमी आई है. गांव बीबीपुर के सरपंच रह चुके जागलान पिछले 12 वर्षों से यह मुहिम चला रहे हैं, जिसकी प्रशंसा ब्रिटेन का अखबार ‘द गार्जियन’ भी कर चुका है.   बिना किसी जोर-जबर्दस्ती के, सिर्फ आईना दिखाकर लोगों की गाली देने की आदत छुड़ाने का यह प्रयास अद्‌भुत है. दरअसल कोई भी नहीं चाहता कि वह बदसूरत नजर आए. दिक्कत यह है कि हमें खुद अपना चेहरा दि...

ठगे जाने का दु:ख

ऐसा नहीं कि मुझे नहीं है इस पद पर विश्वास कि ‘कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय। आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय।।’ मगर मैं नहीं चाहता कोई मुझको ठग पाये। दरअसल किसी को ठगता है जब कोई तो वह उसके सारे दोष-पाप ले लेता है मैं अपने सारे दोष-पाप का दण्ड चाहता खुद भुगतूं इसलिये किसी पर अपना कोई कर्ज न रहने देता हूं। फिर भी मुझको जब कोई ठग ही लेता है बेबस होकर बस यही प्रार्थना करता हूं हे ईश्वर मेरे दोष-पाप से तुम उसकी रक्षा करना! रचनाकाल : 30 सितंबर 2026

खरे सिक्कों को चुकानी पड़ती है खोटे सिक्कों की कीमत !

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 पिछले दिनों पश्चिम बंगाल एसटीएफ ने दावा किया कि गिरफ्तार संदिग्ध जैश-ए-मोहम्मद ऑपरेटिव हमीम मंडल ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन में पुलिस की वर्दी पहन कर घुसपैठ और तोड़फोड़ की साजिश रची थी. जाहिर है कि हमीम का मकसद पुलिस की वर्दी को बदनाम करना था. लेकिन असामाजिक तत्व सिर्फ पुलिस की वर्दी का ही इस्तेमाल नहीं कर रहे. जेन-जी के दुनियाभर में हो रहे आंदोलनों में भी घुसकर वे तोड़फोड़ मचाते हुए हिंसा कर रहे हैं. नेपाल में हुए जेन-जी के आंदोलन में जब संसद और सुप्रीम कोर्ट की इमारत जैसे संवैधानिक स्थलों को ढहा दिया गया तो बहुत से युवा सदमे में आ गए थे कि उनके आंदोलन ने यह क्या कर डाला! बांग्लादेश में भी छात्रों के आंदोलन को कट्टरपंथियों ने हड़प लिया था और छात्रों को लगता रहा कि उनके बीच के ही लोग यह सब कर रहे हैं. वर्तमान दौर के आंदोलनों की सबसे खतरनाक बात यही है कि आंदोलनकारी समझ ही नहीं पाते कि उनके सहयोगियों का वेश बनाकर असामाजिक तत्व भी आंदोलन में घुस आए हैं और उसका अपने निहित स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं. आंदोलन की अगुवाई करने वाले लोग असामाजिक तत्व...