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प्रेम में परिष्कार

किस्मत से किसी को दुनिया में कोई चाहने वाला मिलता है तुमको भी अगर कोई मिल जाये तो गंगाजल के जैसा अपने मन को निर्मल कर लेना। यह आग नहीं कोई साधारण कर लेता है जो अग्निस्नान कुंदन की तरह दमकता है तुम भी सब कचरा जला स्वयं को सोना खरा बना लेना। तुमको शायद अहसास न हो क्या वस्तु तुम्हें अनमोल मिली तुम मोल चुका न सकोगे कभी देकर समाज को अधिकाधिक हो सके तो ब्याज चुका देना। रचनाकाल : 2-3 जून 2026

हम सही काम भी बिना प्रलोभन मिले नहीं कर पाते हैं !

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 अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण पेट्रोलियम पदार्थों की किल्लत के बीच, डीजल बचाने के लिए महाराष्ट्र के परिवहन महामंडल (एसटी) ने एक अनूठी पहल शुरू की है. एसटी की ‘डीजल बचाओ, इनाम पाओ’ मुहिम के अंतर्गत प्रत्येक डिपो को हर दिन पांच लीटर डीजल बचाने का लक्ष्य दिया गया है. कम ईंधन खर्च करने वाले एसटी के ड्राइवरों को इनाम के रूप में विशेष प्रोत्साहन भत्ता देने की घोषणा की गई है और जो दिए गए लक्ष्य से ज्यादा ईंधन बचाएंगे उन्हें हर महीने विशेष पुरस्कार मिलेगा.  देखा जाए तो हजारों लीटर डीजल रोज खर्च करने वाले डिपो के लिए रोज पांच लीटर डीजल बचाना कोई बड़ी बात नहीं है, न ही इस बचत से कोई बहुत बड़ा फर्क पड़ने वाला है. लेकिन इनाम के लालच में ही सही, ड्राइवर इससे मितव्ययी बनने की जो कोशिश करेंगे, उससे परिवहन महामंडल को तो जो फायदा होगा वह होगा ही, किफायतशारी की आदत पड़ने से ड्राइवरों को अपनी निजी जिंदगी में कई गुना ज्यादा फायदा होगा.  दरअसल अपने घर में तो हम एक-एक पैसा बचाने की कोशिश करते हैं, लेकिन घर के बाहर निकलते ही अपने कार्यस्थल पर सरकारी या निजी कंपनियों द्वारा प्रदान की जाने वाली सुव...

मशविरा

इतने नजदीक न आ, फासला रख मुझसे तू मुझे अपनी सगी बेटी जैसी प्यारी है बात किस-किस को मगर अपनी ये समझाऊंगा आड़ लेकर मेरी क्या लोग न कर जायेंगे मेरी जब देंगे मिसालें, मैं कहां जाऊंगा एक जीवन में कई बार न मर जाऊंगा! बचपना तेरा मेरे मन को बहुत भाता है देख मासूमियत बचपन मुझे याद आता है किंतु सीधा है नहीं आज जमाना इतना भेड़िये घूम रहे भेष बदल कितने ही हो रही है तू बड़ी, थोड़ी समझदारी ला इतने नजदीक न आ, फासला रख मुझसे।   रचनाकाल : 27 मई 2026

निर्दोष का निर्वासन

राम जब वन को गए, जानते थे कि उन्हें लौट कर एक दिन आना है अयोध्या फिर से चाहे कितने भी कठिन दिन हों, मगर तय हों तो हम उन्हें काट लिया करते हैं जैसे-तैसे किंतु सीता को मिला होगा जब फिर से वनवास जिंदगी कौन सी उम्मीद में काटी होगी? राजमहलों के तो सुख का था उन्हें लोभ नहीं राम के साथ वे स्वेच्छा से गई थीं वन को किंतु जब छोड़ गए वन में अकेला, लक्ष्मण कुछ क्षणों को तो समझ ही में न आया होगा किस तरह बाद में अपने को संभाला होगा! गर्भ में पल रहे बच्चे न अगर होते तो जान अपनी क्या उसी वक्त न दे दी होती? पाप इतना ये भयानक था कि महलों में भी राम संन्यासियों की भांति न रहते होते दु:ख जो सीता ने सहे वन में कहीं उससे अधिक राम ने मन में ही अपने न सहे होते तो कौन भगवान उन्हें कहता कि मानव के भी पद से नीचे, वे निगाहों से गिर गए होते! ठीक ही करते हैं अब मिथिला नगर के वासी बेटियां अपनी अयोध्या में नहीं ब्याहते हैं।   रचनाकाल : 26 मई 2026

देशभक्ति और नैतिकता के अभाव में पथभ्रष्ट करता पैसा

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 नीट पेपर लीक  मामले में पिछले कई दिनों से रोज नए-नए खुलासे हो रहे हैं. अब एक डरावनी आशंका यह उभर कर सामने आई है कि नीट के तीनों विषयों के पेपर सेट करने वाले पुणे के ही कैसे थे? क्या देश के और किसी भी हिस्से में एनटीए को एक भी विषय का पेपर सेट करने लायक शिक्षक नहीं मिल पाए? या फिर यह सब सुनियोजित तरीके से किया गया था? आखिर एनटीए में किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति की भागीदारी के बिना ऐसा होना कैसे सम्भव था!  तो क्या अभी तक जितने भी आरोपियों के नाम सामने आए हैं वे ‘छोटी-छोटी मछलियां’ हैं और ‘बड़ी मछली’ कोई और ही है? लेकिन उस ‘बड़ी मछली’ के ऊपर भी अगर कोई ‘बड़ी मछली’ हुई तो? ऐसे में क्या जांच एजेंसी के लिए उस पर हाथ डालना सम्भव हो पाएगा?  बहुत पहले एक फिल्म आई थी, जिसमें एक जांच एजेंसी के मुखिया का अपहरण करके अपराधियों ने उसके हमशक्ल को उसके पद पर बिठा दिया था. इस प्रकार शिकायत करने वाले हर व्यक्ति की जानकारी अपराधियों को मिल जाती थी और उसे ठिकाने लगा दिया जाता था. यह तो खैर फिल्मी कहानी थी लेकिन असल जिंदगी में भी हमने अभी कुछ माह पहले ही देखा है कि ईरान की टाॅप लीडरशिप क...

तर्कहीन कुछ नहीं

फल अच्छे कर्मों का जब हाथोंहाथ मिले अच्छाई करना बहुत सरल तब होता है करने पर लेकिन होम हमारा हाथ जले अच्छा बन कर रह पाना मुश्किल होता है। जीवन के इतने सरल नहीं पर नियम हमेशा दो और दो मिल चार बनें कुछ कर्मों के फल जल्दी ही मिल जाते हैं कुछ मिल पाने में साल कई लग जाते हैं कब फलीभूत होते हैं कर्म, कहां, कैसे यह हमको पता नहीं होता इसलिये मुताबिक मन के काम नहीं होता तो भला-बुरा ईश्वर को कहने लगते हैं। पर नियम सृष्टि का अगर सटीक नहीं होता अन्याय किसी के साथ जरा सा भी होता क्या सारी दुनिया नहीं अराजक हो जाती? सच तो यह है हम नहीं जानते पूरा सच सीमित सच के बल पर अनुमान लगाते हैं इसलिये कभी संतुष्ट नहीं हो पाते हैं। ईश्वर के नियमों में शायद सच-झूठ नहीं कुछ भी होता जो होता है बस होता है हां, बिना तर्क के शायद कभी नहीं होता हम तर्क समझना देते हैं जब छोड़ तभी गढ़ते अपना सच-झूठ, उसी में जीते हैं! रचनाकाल : 21-22 मई 2026

ईमानदारी के अभाव में शातिर बन जाती है समझदारी

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 पश्चिम एशिया में जारी वैश्विक संकट के मद्देनजर, हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा मितव्ययिता की अपील के बाद किफायतशारी दिखाने की होड़ लग गई है. मुख्यमंत्रियों से लेकर राज्यपालों तक ने अपने काफिले में वाहन आधे कर दिए हैं. अधिकारियों को कार की बजाय मेट्रो-बस से यात्रा करने और होटलों की बजाय वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये बैठकें करने का आदेश जारी कर दिया गया है. नेताओं से विमान यात्रा टालने को कहा गया है (यह बात और है कि साइकिल या मोटरसाइकिल पर बैठकर फोटो खिंचाने वाले कुछ नेताओं के पीछे वाहनों का लम्बा काफिला नजर आता है). फिजूलखर्ची करने वालों द्वारा प्रधानमंत्री की अपील के बाद पैसे बचाने की मची होड़ को देखकर अचरज होता है कि जिन चीजों के बिना भी काम चल सकता था, आखिर अब तक चलाया क्यों नहीं जा रहा था! नेता अगर वाहनों का काफिला अपनी सुरक्षा के लिए लेकर चलते थे तो वह मुद्दा तो अभी भी बरकरार है, लेकिन काफिले में कटौती के बावजूद कहीं भी तो किसी नेता की जान कोई नहीं ले रहा! आपदाओं या संकटों की एक अच्छी बात यह होती है कि वे हमारे सुविधाभोगी जीवन को झकझोरते हुए, आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं. क...