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बस इतना ही देना माता...

मैं शक्तिदायिनी माता से मांगा करता था शक्ति किया करता था व्रत-उपवास बहुत। अब भी रखता उतना ही व्रत-उपवास मगर अब नहीं मांगता शक्ति प्रार्थना केवल इतनी करता हूं जो भी है मेरे पास अभी उसका कर पाऊं सदुपयोग इतना विवेक बस दे देना। बल कम होने से अधिक मुझे बल के मद में अत्याचारी बन जाने से डर लगता है। रचनाकाल : 4 अक्टूबर 2026

नया विधान

राम लड़े थे रावण से बाहर के अत्याचारी का कर अंत जगत में ‘राम-राज्य’ ले आये थे। छुप गया मगर रावण अब हम सबके भीतर लाने की खातिर राम-राज्य खुद से हमको लड़ना होगा भीतर का रावण जला दशहरा हमें मनाने का विधान अब नया शुरू करना होगा!   रचनाकाल : 16 अक्टूबर 2026

दोष दिखानेवालों का आभारी होने के बजाय हम क्यों हो जाते हैं नाराज ?

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 लगभग छह साल पहले, हरियाणा में सिरसा जिले के गांव माधोसिंघाना में एक दुकान में गाली देकर डिस्पोजल मांगने वाले युवक की हत्या कर दी गई थी. अब उसी सिरसा और आसपास के क्षेत्र में गाली देने की लोगों की आदत छुड़ाने के लिए ‘गाली बंद घर’ नामक एक अभिनव अभियान चलाया जा रहा है. सामाजिक कार्यकर्ता और ‘सेल्फी विद डाॅटर’ फाउंडेशन के संस्थापक सुनील जागलान द्वारा शुरू की गई इस पहल से अब तक दो हजार लड़कियां जुड़ चुकी हैं. वे एक चार्ट बनाकर अपने घर के सभी सदस्यों का नाम दर्ज करती हैं और जो सदस्य दिनभर में जितनी बार गाली देता है, उसके नाम के आगे उस दिन वह आंकड़ा दर्ज करती हैं. इसका असर यह हुआ है कि इलाके में लोगों द्वारा गालियों के प्रयोग में 70 प्रतिशत तक की कमी आई है. गांव बीबीपुर के सरपंच रह चुके जागलान पिछले 12 वर्षों से यह मुहिम चला रहे हैं, जिसकी प्रशंसा ब्रिटेन का अखबार ‘द गार्जियन’ भी कर चुका है.   बिना किसी जोर-जबर्दस्ती के, सिर्फ आईना दिखाकर लोगों की गाली देने की आदत छुड़ाने का यह प्रयास अद्‌भुत है. दरअसल कोई भी नहीं चाहता कि वह बदसूरत नजर आए. दिक्कत यह है कि हमें खुद अपना चेहरा दि...

ठगे जाने का दु:ख

ऐसा नहीं कि मुझे नहीं है इस पद पर विश्वास कि ‘कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय। आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय।।’ मगर मैं नहीं चाहता कोई मुझको ठग पाये। दरअसल किसी को ठगता है जब कोई तो वह उसके सारे दोष-पाप ले लेता है मैं अपने सारे दोष-पाप का दण्ड चाहता खुद भुगतूं इसलिये किसी पर अपना कोई कर्ज न रहने देता हूं। फिर भी मुझको जब कोई ठग ही लेता है बेबस होकर बस यही प्रार्थना करता हूं हे ईश्वर मेरे दोष-पाप से तुम उसकी रक्षा करना! रचनाकाल : 30 सितंबर 2026

खरे सिक्कों को चुकानी पड़ती है खोटे सिक्कों की कीमत !

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 पिछले दिनों पश्चिम बंगाल एसटीएफ ने दावा किया कि गिरफ्तार संदिग्ध जैश-ए-मोहम्मद ऑपरेटिव हमीम मंडल ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन में पुलिस की वर्दी पहन कर घुसपैठ और तोड़फोड़ की साजिश रची थी. जाहिर है कि हमीम का मकसद पुलिस की वर्दी को बदनाम करना था. लेकिन असामाजिक तत्व सिर्फ पुलिस की वर्दी का ही इस्तेमाल नहीं कर रहे. जेन-जी के दुनियाभर में हो रहे आंदोलनों में भी घुसकर वे तोड़फोड़ मचाते हुए हिंसा कर रहे हैं. नेपाल में हुए जेन-जी के आंदोलन में जब संसद और सुप्रीम कोर्ट की इमारत जैसे संवैधानिक स्थलों को ढहा दिया गया तो बहुत से युवा सदमे में आ गए थे कि उनके आंदोलन ने यह क्या कर डाला! बांग्लादेश में भी छात्रों के आंदोलन को कट्टरपंथियों ने हड़प लिया था और छात्रों को लगता रहा कि उनके बीच के ही लोग यह सब कर रहे हैं. वर्तमान दौर के आंदोलनों की सबसे खतरनाक बात यही है कि आंदोलनकारी समझ ही नहीं पाते कि उनके सहयोगियों का वेश बनाकर असामाजिक तत्व भी आंदोलन में घुस आए हैं और उसका अपने निहित स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं. आंदोलन की अगुवाई करने वाले लोग असामाजिक तत्व...

अपरिमित बनने की चाह

मुझको अथाह सागर आकर्षित करता है उसके जैसा ही बन पाऊं इसलिये स्वयं को रोज-रोज मैं थोड़ा-थोड़ा गहरा करता हूं। मैं आसमान की तरह चाहता अंतहीन ऊंचा बनना इसलिये स्वयं की मानवता को थोड़ा-थोड़ा ऊंचा रोज उठाता हूं। यह सच है ऐसा बन पाने को एक जनम क्या, कई जनम कम पड़ते हैं सागर-सी गहराई पाने को समय कहां कम लगता है! ऊंचा बन पाना आसमान-सा अंतहीन अरबों वर्षों में ही सम्भव हो पाता है (कहते हैं जब बिग बैंग हुआ तब निकट एक-दूजे के सारी चीजें थीं)! इसलिये नहीं होता अधीर मैं जैसा भी हूं आज करोड़ों वर्षों के जैविक विकास का पुरखों का वह प्रतिफल है जो आज करूंगा कोशिश, वह हो सफल भले चाहे अनगिनती वर्षों में मैं धरती जैसा धैर्यवान बनने की इच्छा रखता हूं। रचनाकाल : 4 अक्टूबर 2026

साध्य को साधन से अलग समझने की नासमझी ही है समस्याओं की जड़

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 क्या आपने भी पिछले कुछ दिनों, महीनों या वर्षों में महसूस किया है कि किसी चीज पर ध्यान एकाग्र करने की आपकी क्षमता कमजोर होती जा रही है? बहुत से लोग शिकायत कर रहे हैं कि अब उनके लिए किसी चीज पर ज्यादा देर तक दिमाग स्थिर रख पाना कठिन होता जा रहा है.  अब लोग 2-3 घंटे की फिल्में देखने के बजाय यूट्यूब शाॅर्ट्‌स, इंस्टाग्राम रील्स और टिकटाॅक जैसे 15 से 60 सेकंड के वीडियो देखना पसंद करते हैं. पूरा समाचार या विश्लेषणात्मक लेख पढ़ने के बजाय सिर्फ सुर्खियां (हेडलाइंस) या शॉर्ट-न्यूज ऐप्स पर 60 शब्दों का सारांश पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं. पारंपरिक तरीके से खाना पकाने में समय देने के बजाय 2-मिनट नूडल्स, रेडी-टू-ईट भोजन और 10-20 मिनट में डिलीवरी करने वाले क्विक-कॉमर्स ऐप्स की मांग चरम पर है. फोन पर लोग अब लंबी बात करने के बजाय छोटे टेक्स्ट मैसेज, वॉयस नोट्स या सिर्फ इमोजी भेजकर बात खत्म करना चाहते हैं. परिश्रम के बल पर पैसे कमाने के बजाय रातोंरात अमीर बनना चाहते हैं. साहित्य के क्षेत्र में उपन्यास या लंबी कहानियां तो दूर, कविताएं या लघुकथाएं तक पढ़ पाने का सब्र साहित्य प्रेमियों में खत्म होता ...