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गाँव की शवयात्रा

मैं चिंतित था दुनिया जहान के प्रति और अपने प्रति भी. ट्रेन के इंतजार में खचाखच भरी भीड़ देख व्याकुुल हो जाता था यह सोच कि जो जवान हैं- घेर लेंगे सारी सीटें कैसे सफर कर पायेंगी बच्चों को गोद लिए महिलाएँ! करता था इरादा कि नहीं शामिल होऊँगा सीटों की अंधी दौड़ में खड़-खड़ करूँगा सफर. पर सुनाई देते ही ट्रेन के आने की सीटी अज्ञात आशंका के वशीभूत हो बदलने लगता था निर्णय धीमी होते ही ट्रेन दौड़ पड़ता था सीट पाने यह सोच कर कि दिखते ही कोई जरूरतमंद छोड़ दूँगा जगह. पर बारी आई जब सीट देने की पाया मैंने आसपास अपने ही जैसे जवानों को वह, जिसे सर्वाधिक जरूरत थी खचाखच भरी ट्रेन में मुझ तक पहुँच पाने में असमर्थ थी. इसी तरह देख कर समाज में भीषण असमानता निश्चय किया था कभी कि नहीं करूँगा नौकरी पर आया समय जब परिवार चलाने का घेर लिया ऐसी ही आशंका ने. समझाया था अपने मन को कि मूकदर्शक बनने की अपेक्षा कर पाऊँगा कुछ मदद भीषण अभावग्रस्तों की तो ज्यादा होगा सार्थक. कभी नहीं कर पाया पर किसी अभावग्रस्त की मदद एक हाथ से कमाकर दूसरे हाथ से चढ़ाता रहा भेंट शहर की महँगाई को कभी नहीं उबर पाया अपनी जरूरतों से देखते ही रहे...

सृष्टा

फिर से पहुँच गया हूँ गाँव जहाँ बिखरे पड़े हैं मेरी कविता-कहानियों के पात्र. आसान होता है शहर में बैठ कर गाँव की बातें लिखना यहाँ तो कौन सा पात्र कब आकर झाँकने लगे पीछे से पता नहीं. पात्रों को कठपुतली बनाना मुझे पसंद नहीं पर यहाँ तो वे इतने सशक्त हैं कि पसीना छूट जाता है मुझे उनके बारे में लिखने में अन्याय या अनदेखी होते ही रुष्ट हो जाते हैं वे देखते हैं उलाहने से एक पर दृष्टि केंद्रित करो तो दूसरा छूटने लगता है और दूसरे पर नजर साधो तो तीसरा. कमी नहीं है यहाँ पात्रों की वरन मुश्किल होता है चुनाव जिसे छोड़ो वही नाराज हो जाता है. कुछ भी करने को तैयार हैं वे अपने आपको बदलने को भी शर्त सिर्फ यही है कि न हो अनदेखी ली जाय दखल. अब समझ में आता है कि सृष्टा बनना कितना कठिन होता है.

रेगिस्तान की यात्रा

खुश था इन दिनों अच्छी बन रही थीं कविताएँ सार्थक बीत रहे थे दिन कड़कड़ाती ठण्ड में भी उठ आता था भोर में नियत समय पर. मजा आने लगा था परेशानियों को झेलने में आसान हो गई थी जिंदगी दु:ख के आवरण में छिपा मिलने लगा था सुख. पर वह अंत नहीं था जीवन का अब जाना, कि रास्ते में मोड़ भी हैं सूखने लगा है जीवन रस और बिना पानी के पार करना है रेगिस्तान. ऐसा नहीं कि असम्भव है यह इस रास्ते पर भी मिल ही जाते हैं कुछ पदचिह्न पर ढल गए हैं जिस रूप में वे मंजूर नहीं वह बनना मुझे. जानता हूँ कि हमेशा से- ऐसा नहीं रहा होगा कैक्टस कि रेगिस्तान की यात्रा में बचाए रखने को जीवनरस परिस्थितियों ने उसे बना दिया होगा काँटेदार. इसी तरह अन्य जीव-जंतुओं ने भी बाहर से ओढ़ ली होगी कठोरता ताकि भीतर बचा रह सके जीने लायक पानी. पर मैं नहीं बनना चाहता काँटेदार परिस्थितियों में ढल कर नहीं चाहता खुद को बचाना इसीलिए रेगिस्तान में खोद रहा हूँ कुआँ. जानता हूँ कि रास्ता लम्बा है और नहीं मिला अगर पानी तो मौत निश्चित है पर यह भी मालूम है कि दम टूटने के पहले लग सका अगर कुएँ में पानी तो होगी वह रेगिस्तान के खत्म होने की शुरुआत कि गुजरेगी जब ...

लय

होता है दिनचर्या में जब कोई व्यतिक्रम और टूटती है जीवन की लय व्याकुल हो जाता हूँ चाहता हूँ यह किसी भी तरह मिले और जब मिलती है तो खुश होता हूँ इस तरह मानो अनमोल निधि मिली हो. चाहता हूँ दूसरों को बताना कि वे भी जानें कैसा होता है लय पाने का सुख. पर खाई इतनी गहरी है कि पहुँचने तक उनके उलट जाते हैं अर्थ मैं कहना चाहता हूँ ‘ब्रह्मचर्य’ और वे समझ लेते हैं ‘नपुंसक’ इस तरह खड़ी हो जाती है सम्प्रेषण की समस्या. इसलिये नहीं करता कोशिश उन्हें अब समझाने की सिर्फ तलाशता हूँ मौके कि दिखा सकूँ करके. जैसे उस दिन जब कह रहे थे वे काश! लग जाती लाटरी मैंने कुछ नहीं दिया जवाब किंतु अगली बार जब रास्ते में पड़ा दिखा पचास का लावारिस नोट मैंने उठाया और फिर उसी जगह छोड़ दिया जहाँ गिरा था वह कि शायद समझ सकें वे बिना मेहनत का धन माटी समान होता है. अगली बार जब मैं गुजरूँगा उस रास्ते से और सीख चुके होंगे वे सबक नहीं उठाऊँगा मैं नोट. लेकिन फिलहाल तो मुझे बार-बार वह नोट उठाना है और छोड़ना है अपनी लय को तोड़ना है. जैसे सिखाता है कोई बच्चों को चलना.

कविता

कभी-कभी होता है ऐसा भी कि अनथक श्रम के बावजूद रह जाता है कविता का पृष्ठ अनलिखा ही समझ पायेंगे क्या लोग उस पन्ने की भाषा! सच है यह कि जीते हैं जिस समाज के लोग कविता को नहीं रह जाती वहाँ कविता लिखने की जरूरत पर अभी तो कोसों दूर हैं हम उस अवस्था से कविता जीने तो क्या पढ़ने तक से भागते हैं दूर. अभी तो सजाने होंगे मुझे कविता के अंग-प्रत्यंग बनाना होगा उसे सर्वांग सुंदर ताकि भाग न सको तुम उससे दूर. हटा रहा हूँ झाड़-झंखाड़ बना रहा रास्ते को स्वच्छ और मनोहारी ताकि पकड़ कर उंगली जब ले चलूँ तुम्हें भागना न चाहो तुम, छुड़ाकर हाथ. जानते हो इसमें क्या है मेरा स्वार्थ! दरअसल मैं जानता हूँ कि जीने लगोगे जब तुम कविता नहीं कर सकोगे किसी पर अनाचार-अत्याचार बन सकोगे अपने प्रति ईमानदार. इसीलिए चाहता हूँ कविता की राह आसान बनाना तुम्हारे भीतर चौकीदार बिठाना ताकि करो जब कोई अपराध खुद ही मिल सके तुम्हें दण्ड जरूरत न पड़े दूसरों को बनने की न्यायाधीश.

सफेदपोश आतंकवादी

अभी-अभी सूझा है मन में कुटिल विचार क्यों नहीं सौंप देते हम आतंकवादियों को देश की सत्ता! लड़ते हैं जो आम लोगों के नाम पर उनको भी तो मिले मौका आम लोगों का भला करने का! परसों आई थी खबर इस साल बारह करोड़ का जला कपास जला या जला दिया गया! व्यंग्य से पूछा था शाहिद जी ने पेज चेक करते हुए फिर बताया उन्होंने ही कि छिपाने के लिए दो-चार करोड़ का घोटाला जला दी जाती है दस-बारह करोड़ की कपास. अभी हफ्ता भी तो नहीं बीता पीएफ घोटाले के मुख्य आरोपी की संदिग्ध मौत का बत्तीस जजों के नाम जुड़े हैं घोटाले में शामिल हैं जिसमें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज भी. पखवाड़ा भी नहीं बीता विधानसभा का चुनाव हुए जब नक्सलग्रस्त गढ़चिरोली में मतदान केंद्र पर ग्रामीणों को लाया गया हाँक कर पुलिस ने डलवाए वोट बंदूक की नोंक पर सर्वाधिक मतदान हुआ वहाँ. बेवकूफी पर यह की पुलिस ने कि ग्रामीणों के साथ-साथ पीट दिया पत्रकारों को भी. गुस्साए पत्रकारों ने उछाल दिया मामला छाप दी खबर. पर बीत चुका है पखवाड़ा कहाँ हुई कोई कार्रवाई! इसीलिए सोचता हूँ देना चाहिए एक बार असली आतंकवादियों को भी मौका जैसे देते हैं हम कांग्रेस, भाजपा या तीसरा ...

भयानक समय

क्या ये भयानक समय नहीं है? पूछता हूँ मैं अपने आप से अगर ठीकठाक है सब कुछ तो क्यों कर रहे हैं किसान आत्महत्या? गाँव छोड़ कर क्यों भाग रहे हैं लोग शहरों की ओर? शहरों में भी कहाँ है सब कुछ ठीकठाक ट्रेन पकड़ने के लिए दौैड़ते-भागते जब आफिस से निकलता हूँ स्टेशन की ओर उड़ानपुल के नीचे- पथराई आँखों, फटे चीथड़ों वाली औरतों, बच्चों और अधेड़ों को देख कलेजा मुँह को आता है. गुजरती है ट्रेन जब, मलिन बस्ती के बीच से वहाँ का दृश्य भी कुछ अलग नहीं होता फटती है दुर्गंध से नाक जहाँ और चाहते हैं हम ट्रेन गुजर जाय जल्द से जल्द हजारों को गुजारना पड़ता है वहाँ समूचा जीवन. फिर क्यों लगता है सब कुछ सामान्य? क्यों नहीं दिखाई देता कहीं असंतोष! पेट काट कर जोड़े गए पैसों से खरीद लेते हैं रंगीन टीवी और देखते रहते हैं बड़े लोगों की बड़ी बातें. सुनील बाबू, क्या सचमुच सबकुछ बढ़िया है! अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य भी कुछ अलग नहीं ढूँढ़ता ही रहता है अमेरिका कोई न कोई शिकार कभी नहीं खत्म होती उसकी दादागीरी ड्रोन विमानों की अकल्पनीय ताकत देख फटी रह जाती हैं हमारी आँखें और करते हुए उसकी चर्चा, महसूस होता है गर्व कि कितने बड़े ज...