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मन की निगरानी

मन मेरा मुझको चकमा देने की कोशिश में रहता है गढ़ता है ऐसे तर्क कि मानो किस्मत का वह मारा है सब शोषण करते उसका, दुनिया में सबसे बेचारा है इसलिये जरा वह भी ठग ले दुनिया को, क्या हो जायेगा यदि काम बने बातों को घुमा-फिरा कर वह तो झूठ नहीं कहलाएगा! दलबदलू लोगों को ‘गद्दारों’ की श्रेणी में रखता हूं पर स्वयं बदलता दल तो ‘वैचारिक परिवर्तन’ लगता है आतंक मचाता कोई तो आतंकी उसको कहता हूं पर खुद जब शस्त्र उठाता हूं तो क्रांतिकारिता लगती है कथनी-करनी में अंतर रखने वालों को पाखण्डी माना करता हूं पर अपना छल ‘व्यवहार कुशलता’ लगता है! मैं लोगों के अन्याय-न्याय का मापदण्ड जो रखता हूं खुद पर लागू करने की बारी आती जब मन चालाकी से उन्हें बदलने की कोशिश में रहता है इसलिये स्वयं पर हरदम रखता कड़ी नजर लोगों के प्रति सहृदयता जितनी रखता हूं अपने प्रति उतना ज्यादा निर्मम रहता हूं।

जब अपने दुश्मन बनते हैं तो दुश्मन से भी अधिक भयानक होते हैं !

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 हाल ही में पांच राज्यों के हुए विधानसभा चुनावों की एक खासियत यह रही कि दो राज्यों के निर्वाचित होने वाले मुख्यमंत्रियों ने अपनी वर्तमान पार्टी को उसी राजनीतिक दल के खिलाफ जिताया, जिसमें वे कभी खुद शामिल थे. पश्चिम बंगाल में भाजपा के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी अभी कुछ वर्ष पहले तक ममता बनर्जी के दाहिने हाथ माने जाते थे, जिन्हें हराकर अब वे मुख्यमंत्री बने है. इसी तरह असम में लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने वाले हिमंत बिस्वा सरमा भी भाजपा में शामिल होने के पहले तक कांग्रेस के उन्हीं राहुल गांधी के खासमखास थे, जिन पर वे दल बदलने के बाद तीखा हमला करने लगे हैं. अपनी मूल पार्टी का ही कट्टर प्रतिद्वंद्वी बन जाने के ऐसे उदाहरणों की राजनीति में भरमार है. राजनीति ही नहीं, जीवन के प्राय: सभी क्षेत्रों में ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे जहां कभी घुल-मिल कर रहने वाले बाद में एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन गए. खेती या अन्य प्राॅपर्टी के विवाद में भाई द्वारा भाई की ही जान लेने या हमला करने की खबरें आए दिन पढ़ने-सुनने को मिलती हैं. मुगलकाल में तो सत्ता के लिए अपने सगे भाइयों को मौत के घाट...

सब अपने बन जायें !

क्यों आखिर ऐसा होता है जब सगा हमारा कोई, दुश्मन बन जाये तो दुश्मन से भी अधिक भयानक होता है! संघर्ष पराये लोगों में जब होता है तब खून-खराबा बेशक भारी होता है परिवार मगर जब आपस में ही लड़ता है तब भी तो युद्ध महाभारत-सा होता है! सुर-असुर सदा प्राचीन काल में लड़ते थे था ‘देवासुर-संग्राम’ हजारों साल चला पर यह भी तो सच है वे भाई-भाई थे! हम अपना जिन्हें समझते हैं ‘धत्कर्म’ उन्हीं की खातिर सारे करते हैं पर वे ही तो फिर जानी दुश्मन बनते हैं! फिर सच्चाई के पथ पर ही क्यों हम न चलें अपनों की खातिर पक्षपात कोई न करें क्या पता कि बनकर रहने से ईमानदार अपने तो अपने रहें, पराये भी अपने ही बन जायें! (रचनाकाल : 10 मई 2026)

ये कहां आ गए हम, उल्टी दिशा में चल के !

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 पिछले दिनों उत्तरप्रदेश के बिजनौर में साइबर अपराधियों ने एक महिला को दस दिनों तक डिजिटल अरेस्ट रखकर इतना डराया-धमकाया कि शादी की सालगिरह से एक दिन पहले उसने फांसी लगाकर जान दे दी. अंतिम संस्कार के समय साइबर ठग का फोन आने पर परिजनों को शक हुआ, जिसके बाद पूरे मामले का खुलासा हुआ. महिला के मोबाइल में पांच नंबरों से धमकी वाले मैसेज मिले. इस खुलासे के बाद जब महिला के कमरे की छानबीन की गई तो एक डायरी में सुसाइड नोट मिला, जिसमें उसने एक लड़के द्वारा परेशान करने और ब्लैकमेल करने की बातें लिखी थीं.   डिजिटल अरेस्ट का यह मामला नया नहीं है, इन दिनों इस तरह की खबरों से अखबार रंगे रहते हैं. सरकारों और सामाजिक संगठनों की ओर से इस बारे में जनजागृति की जा रही है कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई चीज नहीं होती, इसलिए ऐसे साइबर ठगों के चंगुल में नागरिक न फंसें. जो अभी तक नहीं फंसे हैं उन्हें ताज्जुब भी होता है कि आज के जमाने में कोई इतना बेवकूफ कैसे हो सकता है! लेकिन हकीकत यह है कि खूब पढ़े-लिखे और समझदार लोग भी ‘डिजिटल अरेस्ट’ के झांसे में आ रहे हैं. ऐसा आखिर क्यों हो रहा है?  दरअसल कोई भी ...

पैमाना

जब नहीं पास था मेरे कुछ तब जो भी मिल जाता था उसको मान अनुग्रह ईश्वर का खुश रहता था मिल गया बहुत कुछ लेकिन जब तब थोड़ा भी घट जाने पर दु:ख उसका होने लगता था जो पास बचा, आनंद न उसका मिलता था। इसलिये नहीं मैं तुलना अब अच्छे दिन से, कम अच्छे दिन की करता हूं पैमाना हरदम बुरे दिनों का रखता हूं छोटे-मोटे दु:ख-कष्टों में सबसे खराब दिन याद कर लिया करता हूं उसकी तुलना में कम खराब दिन भी अब अच्छे लगते हैं। (रचनाकाल : 2-3 मई 2026)

मशीनें सेवक अच्छी होती हैं, पर मालिक निर्मम बनती हैं

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 पिछले दिनों एक खबर सामने आई कि नगालैंड के युवा किसान स्वयीवेजो डजुडो ने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री के उपयोग से एक कम लागत वाला ‘सोलर ड्रायर’ बनाया है, जो किसानों की सब्जियों को पारंपरिक तरीकों की तुलना में 30 प्रतिशत तेजी से सुखाता है. उन किसानों के लिए, जिन्हें सीजन में बम्पर पैदावार होने पर अपनी सब्जियां माटी मोल बेचनी पड़ती हैं या फेंकनी पड़ती हैं, निश्चय ही इस खबर से राहत मिली होगी, क्योंकि वे फेंकने के बजाय सुखाकर अपनी सब्जियों का जीवनकाल बढ़ा सकेंगे और उनकी यथेष्ट कीमत पा सकेंगे.  जब दुनिया में सिलाई मशीन का आविष्कार हुआ था या साइकिल ईजाद हुई थी तो इसे बहुत बड़ी क्रांति माना गया था. मनुष्य बल से चलने वाली इन दोनों मशीनों ने एक झटके में ही मानव श्रम को कई गुना बचाने में मदद की थी. जो दूरी पैदल तय करने में एक घंटे लगते, साइकिल से उसे बीस मिनट में ही तय किया जा सकता था. जो कपड़ा हाथ से सिलने में एक घंटा लगता, उसे सिलाई मशीन दस मिनट में ही सिल सकती थी.  तब से लेकर अब तक तकनीकी विकास जमीन से आसमान पर पहुंच गया है, लेकिन दुर्भाग्य से मानव श्रम से चलने वाली मशीनों का ...

खण्डहरों में सृजन

जब मारकाट चहुंओर मची हो हिंसा का उन्माद हर जगह फैला हो तब नया सृजन नि:सार दिखाई पड़ता है। पर कितना भी हो ध्वंस खण्डहर हो जाये सबकुछ चाहे जीवन तो इससे खत्म नहीं हो जायेगा! जब हिरोशिमा-नागासाकी सा हाल समूची दुनिया का हो जायेगा जो बचे रहेंगे या कि नये पैदा होंगे जीना बेहद मुश्किल उनका हो जायेगा तब उनको शायद नये सृजन की जिंदा रह पाने के लिये जरूरत हो! इसलिये तबाही का ताण्डव जो मचा रहे उनसे भी ज्यादा शिद्दत से हमको मिलकर कुछ नया सृजन करना होगा जब हद से दर्द गुजर जाये तब चीख-पुकार मचाने के बदले में कोई गीत नया सुमधुर स्वर में गाना होगा कचरा जलता है जैसे अग्निपरीक्षा में पर सोना और दमकता है जो गीत उपजता है असह्य पीड़ा में वह हर काल में अमर होता है। (रचनाकाल : 26 अप्रैल 2026)