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अमर-फल

फल नहीं जल्द जब मिलता था तब मैं निराश हो जाता था मन नहीं कर्म में लगता था। पर देखा पौधे-पेड़ सभी फल नियम समय पर देते हैं जो जितनी जल्दी फलते हैं उतने ही कम फल लगते हैं देरी से फलने वाले लेकिन दीर्घकाल तक टिकते हैं! तब से निराश होना ही मैंने छोड़ दिया आनंद कर्म करने में लेना शुरू किया फल नहीं जल्द जब मिलता है तब मन ही मन खुश होता हूं जो बीज बो रहा कर्मों का फल क्षणिक नहीं उसका होगा यदि मिल न सका इस जीवन में तो होता है विश्वास प्रबल यह उसका असर अमर होगा!   रचनाकाल : 13-18 सितंबर 2026

निर्भयता के अभाव में कायरों की आक्रामकता से तबाह होती दुनिया

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 अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पिछले दिनों एक हैरान कर देने वाला खुलासा किया. ट्रम्प ने बताया कि नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान तुर्की की राजधानी अंकारा से निकलते समय वे मीडिया के सामने दिखाने के लिए अपने आधिकारिक विमान एयरफोर्स वन में चढ़े जरूर थे लेकिन अंदर जाकर वे पीछे के रास्ते से उतरकर एक एयरपोर्ट कैटरिंग कंटेनर में छिप गए और गुप्त रूप से एक सैन्य जेट से बाहर निकल गए थे. एयरफोर्स वन में सवार मीडियाकर्मियों को इसकी भनक तक नहीं लगी, क्योंकि ट्रम्प के उनके साथ होने का आभास देने के लिए विदेश मंत्री और ट्रेजरी सचिव समेत शीर्ष अधिकारी उनकी नजरों के सामने ही थे. जाहिर है कि इतनी गहरी गोपनीयता के चलते ईरानियों को तो इसकी हवा भी नहीं लगी होगी और उन्होंने यही समझा होगा कि ट्रम्प एयरफोर्स वन में ही सवार हैं. फिर उन्होंने हमला क्यों नहीं किया?  तो क्या हमले की जिस खुफिया सूचना को इतना पुख्ता माना जा रहा था कि उसके चलते ट्रम्प को एक कंटेनर में छिपकर भागना पड़ा, वह झूठी थी? 22 साल पहले, सामूहिक विनाश के रासायनिक, जैविक या परमाणु हथियार बना लेने की जिस खुफिया जानकारी का दावा करते हुए...

मृग-मरीचिका

क्यों अक्सर ऐसा होता है जो पास हमारे होता है वह उतना खास नहीं लगता जितना महसूस चले जाने पर होता है! जब नहीं अधिक सुविधाएं थीं तो कष्ट-असुविधा भरी जिंदगी लगती थी पर सुविधा बढ़ जाने पर भी क्यों समय सुहाना वही पुराना लगता है! कट जाय उम्र सुख-सुविधा में हम यही कामना करते हैं संघर्षहीन जीवन का फिर क्यों अंत निरर्थक लगता है! hemdhar.blogspot.com रचनाकाल : 3-12 सितंबर 2026

बच्चों को भुगतना पड़ता है बड़ों के पाखंड का खामियाजा

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 पिछले दिनों स्कूल में एक छोटे बच्चे को टीचर ने चांटा मारा और उसकी मौत हो गई. दिल्ली के एक कन्या विद्यालय की सातवीं कक्षा की छात्रा की मौत के मामले में आरोप है कि किताब नहीं लाने पर शिक्षिका ने उसे सजा दी थी. छत्रपति संभाजीनगर में पहाड़ की चोटी से कूदने वाले किशोर की तो देशभर में चर्चा हुई, जिसमें उसके माता-पिता की भी मौत हो गई थी. दो छात्र चोरी करने के लिए अपनी प्रिंसिपल के घर में घुसे और जाग जाने के कारण प्रिंसिपल को चाकुओं से गोद कर मार डाला.  आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि आज बच्चे इतने नाजुक होते जा रहे हैं कि एक चांटा भी नहीं सह पाते, इतने जिद्दी हो रहे हैं कि मांगें मनवाने के लिए अपनी जान तक दे देते हैं! या फिर इतने क्रूर हो रहे हैं कि किसी की जान लेने से भी नहीं हिचकते! आज की बुजुर्ग हो चुकी पीढ़ी में शायद बहुतों को अपने बचपन के वे दिन याद होंगे जब स्कूल में शिक्षकों की छड़ी के जोरदार प्रहार से बचने के लिए वे क्या-क्या तरीके नहीं खोजते रहते थे. एक बार एक बच्चे ने किसी बात पर अपनी मां को कुएं में कूद जाने की धमकी दे दी. परेशान मां ने दोपहर में खाना खाने घर आए पिता को यह बा...

अच्छाई में कमी

कुछ लोगों को बुरा समझकर मैंने उनकी निंदा की पर अच्छे निकले जब वे तो मैं लज्जा से गड़ गया स्वयं की नजरों में गिर गया बुराई शायद मेरे भीतर थी! इसलिये नहीं अब कभी किसी को करता हूं बदनाम  कि मेरी अगर धारणा साबित कभी गलत हुई तो क्या नहीं डूब कर मर जाऊंगा चुल्लू भर पानी में ही! सच तो यह है कोई भी इतना बुरा नहीं अच्छाई का प्रतिदान बुराई से जो दे यदि हमको ऐसा लगता है हम तो हरदम अच्छा करते पर बुरा हमारे साथ हमेशा होता है तो कमी हमारी अच्छाई में शायद है! रचनाकाल  : 6 सितंबर 2026

क्रिया-प्रतिक्रिया

है नियम प्रकृति का ही शायद  प्रत्येक क्रिया की होती है प्रतिक्रिया कि करता है जब कोई बुरा किसी का बुरा वक्त फिर उसका भी फिर आता है फिर क्यों विश्वास हमारा यह डिग जाता है अच्छाई का बदला न हमें मिल पायेगा! अच्छाई के बदले में भी यदि कोई करता बुरा दोष ईश्वर को देने लगते हम क्यों नहीं झांकते हैं भीतर  करने को आत्मनिरीक्षण यह अच्छाई में तो कहीं हमारे खोट नहीं! रचनाकाल  : 5-6 सितंबर 2026

दु:ख जड़, सुख फल

बांटता हूं लोगों को सुख जब तो लौटता है कई गुना होकर वह दूसरों के चेहरे पर देख खुशी मन मेरा और भी खुश होता है। दु:ख के भी साथ ऐसा होता है लगता है डर उसे बांटने में देख कर लोगों को दुःखी मेरा भी दुःख न बढ़े कई गुना इसीलिए सहता हूं चुपचाप  छिपाता हूं उसी तरह वृक्ष जैसे छिपाते हैं अपनी जड़ देते हैं लोगों को फूल-फल दुःख भी मुझे लगते अपनी जड़ों जैसे चाहता हूं रखूं उन्हें भीतर ही लोगों को बांट सकूं  ताकि खूब फूल-फल। रचनाकाल : 5 सितंबर 2026