मरने का तुक
अंत में राम जब सरयूजी में उतरे होंगे जैसे सीताजी समाई थीं धरा के भीतर राम भी जल में अतल लीन हुए जब होंगे जब हिमालय में बिना पीछे मुड़े, देखे बिना पाण्डवों ने सभी स्वेच्छा से तजा होगा तन व्याघ्र ने कृष्ण के जीवन का किया होगा अंत आजकल मन में मेरे दृश्य वही आते हैं। यूं तो लेते ही जनम मृत्यु भी तय होती है लोग कुछ उसको भी उत्सव की तरह लेते हैं किंतु जो हिस्से में आई है समय में मेरे युद्ध में खत्म ये दुनिया जो हुई जाती है अंत शालीन नहीं क्या जरा हो सकता था इतने कायर तो नहीं थे कि डरें मरने से किंतु मरने का कोई तुक भी तो हो सकता था! रचनाकाल : 27 मार्च 2026