बड़ों की बर्बरता का ही प्रतिबिंब है बच्चों की क्रूरता
हाल ही में हरियाणा के पंचकूला में एक नामचीन सरकारी स्कूल में केजी की छह वर्षीय छात्रा को तीसरी कक्षा के आठ वर्षीय छात्र ने बेरहमी से पीटा और बेहोश होने के बाद भी उसे घसीटा. इसी साल जुलाई में लखनऊ के एक निजी स्कूल में नर्सरी कक्षा के एक पांच साल के बच्चे को क्लास माॅनिटर छात्रा ने करीब 12 मिनट तक घूंसे-थप्पड़ मारे और बाल खींचे. किशोरों या युवाओं द्वारा तो बर्बरता की हद पार करने की घटनाएं अब आम हो गई हैं, जैसे अभी कुछ दिन पहले ही 21 साल के एक युवक ने कक्षा में घुसकर दसवीं की एक छात्रा का हाथ काट डाला, पुणे में 17 वर्षीय लड़के की सात नाबालिगों ने हत्या कर दी. राष्ट्रीय अपराध रिकाॅर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2024 में किशोरों के खिलाफ कुल 34,878 आपराधिक मामले दर्ज किए गए, जो 2023 के 31,365 मामलों की तुलना में 11.2% की वृद्धि दर्शाते हैं. बच्चों और किशोरों में आखिर इतनी बर्बरता आ कहां से रही है? एआई का कहना है कि बच्चों का जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम और मोबाइल गेम्स व रील्स में मौजूद हिंसक कंटेंट उनके दिमाग पर गहरा असर डालता है, जिससे वे इसे सामान्य मानने लगते हैं...