सत्याग्रह में नहीं हारता कोई, हिंसा नहीं जीतने देती है !
लोकतंत्र में जनता ही सरकार चुनती है लेकिन कई बार परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि जनता को अपनी उसी सरकार के खिलाफ आंदोलन करना पड़ता है. अक्सर होता यह है कि सरकार ऐसे आंदोलनों को बल प्रयोग के जरिये कुचलने की कोशिश करती है और आंदोलनकारी सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़ व सुरक्षा बलों के खिलाफ हिंसा के जरिये अपनी मांगें मनवाने की कोशिश करते हैं. नतीजतन दोनों पक्षों का नुकसान होता है. इसीलिए करीब एक शताब्दी पहले महात्मा गांधी ने अहिंसक सत्याग्रह का मार्ग दिखाया था, जिसमें दोनों पक्षों की जीत होती है. आज भी जो उस मार्ग का आश्रय लेता है वह घाटे में नहीं रहता, फिर भी ऐसा क्यों होता है कि हमें हिंसा और तोड़फोड़ का आश्रय लेना ही सबसे आसान लगता है? हाल ही में काॅकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के दौरान कुछ युवा गांधीजी के मार्ग पर चलते दिखे. मीडिया माध्यमों ने दिखाया कि नागपुर के एक युवा को सुरक्षा बल के जवान लाठियों से पीट रहे थे और वह युवा कोई प्रतिरोध करने के बजाय चिल्ला रहा था कि मारो सर, मारो, और मारो मुझे... और अचानक ही लाठियां थम गईं. एक महिला सुरक्षा कर्मी युवक को बचाते...