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सुख फल में नहीं, परिश्रम में

मैं बिना भूख के खाता था जब स्वाद नहीं छप्पन भोगों में आता था इसलिये खूब मेहनत करके पहले मैं अपनी भूख जगाया करता हूं रूखा-सूखा खाना भी फिर छप्पन भोगों सा लगता है। वेतन जब लेता था अग्रिम बदले में करना काम बाद में बेहद बोझिल लगता था अब काम महीने भर करना उम्मीद बंधाये रखता है तनख्वाह अंत में बेहद खुशियां देती है। ईश्वर से भी मैं यही प्रार्थना करता हूं मेहनत का फल देना या चाहे मत देना पर बिना किये मेहनत कोई फल मत देना फल नहीं मिलेगा मेहनत का तो दाता का सुख पाऊंगा खैरात मगर लेकर याचक बन जाऊंगा! रचनाकाल : 29 जुलाई 2026

उधार की सोच कहीं कुंद तो नहीं कर डालेगी हमारा दिमाग !

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 हाल ही में सामने आई यह खबर बेहद चौंकाने वाली है कि आज के डिजिटल युग में लोग खुद सोचना तक छोड़ रहे हैं और रील्स, टीवी डिबेट देखकर या एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से पूछकर अपने विचार या दृष्टिकोण बना रहे हैं. अभी तक डर यह जताया जाता था कि एआई आधारित रोबोट कहीं इतने शक्तिशाली न बन जाएं कि हम मनुष्यों को पीछे छोड़कर खुद ही फैसले लेने लगें, क्योंकि अगर ऐसा होने लगा तो मशीनें हमारे अधीन नहीं रहेंगी बल्कि हम मनुष्य उनके गुलाम बनकर रह जाएंगे. लेकिन अगर हम इसी तरह सोच-विचार तक करने में आलस करते रहे और एआई पर ही निर्भर होते गए तो एक दिन क्या खुद ही उसके गुलाम नहीं बन जाएंगे? आज यह चलन सा बन गया है कि सोशल मीडिया पर हमें कुछ भी संवेदनशील सामग्री दिखी तो हम बिना कुछ सोचे-विचारे तत्काल उसे विभिन्न ग्रुपों में फारवर्ड कर देते हैं. अफवाहें पहले भी फैलती थीं लेकिन सोशल मीडिया ने इस काम को इतना आसान बना दिया है कि कभी-कभी तो यह तय करना ही मुश्किल हो जाता है कि हम अफवाहों के युग में जी रहे हैं या हकीकत के! चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ दिनों बाद जब उन अफवाहों का खंडन आता है या हमें हकीकत पता चलती ह...

सत्याग्रह में नहीं हारता कोई, हिंसा नहीं जीतने देती है !

 लोकतंत्र में जनता ही सरकार चुनती है लेकिन कई बार परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि जनता को अपनी उसी सरकार के खिलाफ आंदोलन करना पड़ता है. अक्सर होता यह है कि सरकार ऐसे आंदोलनों को बल प्रयोग के जरिये कुचलने की कोशिश करती है और आंदोलनकारी सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़ व सुरक्षा बलों के खिलाफ हिंसा के जरिये अपनी मांगें मनवाने की कोशिश करते हैं. नतीजतन दोनों पक्षों का नुकसान होता है. इसीलिए करीब एक शताब्दी पहले महात्मा गांधी ने अहिंसक सत्याग्रह का मार्ग दिखाया था, जिसमें दोनों पक्षों की जीत होती है. आज भी जो उस मार्ग का आश्रय लेता है वह घाटे में नहीं रहता, फिर भी ऐसा क्यों होता है कि हमें हिंसा और तोड़फोड़ का आश्रय लेना ही सबसे आसान लगता है?   हाल ही में काॅकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के दौरान कुछ युवा गांधीजी के मार्ग पर चलते दिखे. मीडिया माध्यमों ने दिखाया कि नागपुर के एक युवा को सुरक्षा बल के जवान लाठियों से पीट रहे थे और वह युवा कोई प्रतिरोध करने के बजाय चिल्ला रहा था कि मारो सर, मारो, और मारो मुझे... और अचानक ही लाठियां थम गईं. एक महिला सुरक्षा कर्मी युवक को बचाते...

आप ठगे सुख होत है...

धन चोरी करने, रिश्वत लेने वालों को जो मिलता है मेहनत करते जो, कई गुना वे अधिक कमाया करते हैं जो नकल किया करते वे पास भले ही हो जायें, लेकिन मेरिट में तो पढ़ने वाले बच्चे ही आया करते हैं। जो ठगते किसी और को, थोड़ी देर भले ही खुश हो लें नुकसान उठाकर भी लेकिन, रह पाने में ईमानदार जो सुख मिलता है अतुलनीय मन ही मन में बेईमानी करने वाले महसूस नहीं कर सकते हैं। हम तुच्छ लाभ की खातिर नीचे गिरते हैं क्षमता थी लेकिन उठने की जितनी ऊपर हम उसे गंवाने की क्षति का अहसास कभी कर पाए तो क्या माफ स्वयं को किसी तरह कर सकते हैं? रचनाकाल : 21 जुलाई 2026

दानवीरों के साथ-साथ कैसे बढ़ती जा रही है दान-चोरों की संख्या ?

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 अयोध्या के राम मंदिर में दान चोरी की घटना उजागर होने के बाद, देश के अलग-अलग हिस्सों से इसी तरह की चोरी की ढेरों घटनाएं सामने आने लगी हैं. हिंदू धर्म के चार पवित्र धामों में से एक बद्रीनाथ धाम में चोरी कांड की जांच एसआईटी कर रही है. वैष्णो देवी मंदिर में भी इसी तरह के गबन का मामला कोर्ट में पहुंच गया है, आरोप है कि मंदिर में भक्तों द्वारा अर्पित की गई करीब 20 टन चांदी, जिसकी कीमत 550 करोड़ रु. होनी चाहिए, में मिलावट की गई या उसे बदल दिया गया और टकसाल में गलाए जाने पर वह मात्र 30 करोड़ की निकली. गुजरात के प्रसिद्ध अंबाजी मंदिर में दान की चोरी का सीसीटीवी फुटेज वायरल हो रहा है और इस मामले में मंदिर से जुड़े तीन कर्मचारियों को गिरफ्तार किया जा चुका है. छत्तीसगढ़ के कांकेर में पांच मंदिरों और मध्यप्रदेश के अमरकंटक में व नलखेड़ा स्थित बगलामुखी मंदिर में भी दान और चढ़ावे में गंभीर अनियमितताओं के मामले सामने आ चुके हैं.  मंदिरों में दान देने की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है. भारत में नौ लाख से अधिक पंजीकृत मंदिर हैं. अधिकांश छोटे मंदिरों के पंजीकृत रिकाॅर्ड नहीं होने के कारण स...

सहानुभूति की शक्ति

मुझसे लोगों के कष्ट न देखे जाते थे हरसम्भव कोशिश करता सुखी बनाने की इस चक्कर में पर भीतर से कमजोर लोग हो जाते थे सहृदयता मेरी उनकी खातिर निर्दयता बन जाती थी प्रतिकूल परिस्थितियों को झेल न पाते थे। इसलिये नहीं अब दु:ख उनके कम करने की कोशिश करता उनसे भी ज्यादा कष्ट स्वयं स्वेच्छा से भोगा करता हूं मेरे आगे उनके दु:ख की छोटी लकीर जब दिखती है तो सम्बल उनको मिलता है दु:ख-कष्टों को आसानी से सह पाते हैं भीतर से बनते जाते हैं मजबूत मुझे भी अपने संग मजबूत बनाते जाते हैं। रचनाकाल : 16 जुलाई 2026

आर्थिक असमानता : हल तो बहुत सरल है, लेकिन घंटी बांधे कौन ?

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 दुनिया में आर्थिक असमानता से पैदा हुई समस्याओं के हल के लिए हाल ही में पेरिस स्थित वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब ने अपनी ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट में एक सरल उपाय सुझाया है. रिपोर्ट का कहना है कि एक प्रतिशत सुपर-रिच पर अतिरिक्त टैक्स लगा दिया जाए तो दुनिया की 99 प्रतिशत आबादी की समस्याओं को सुलझाया जा सकता है. यह टैक्स भी इतना अधिक नहीं होगा कि अति-अमीरों की कमर ही तोड़ दे. इसके अनुसार 20 लाख डाॅलर (लगभग 19 करोड़ रुपए) से अधिक संपत्ति वाले हर व्यक्ति को धन-कर देना होगा जो एक प्रतिशत प्रति वर्ष से शुरू होगा और धीरे-धीरे बढ़कर उन लोगों के लिए 20 प्रतिशत तक हो जाएगा जिनकी संपत्ति 50 करोड़ डाॅलर से अधिक है.  योजना तो बहुत अच्छी है, दिक्कत सिर्फ यही है कि इसे क्रियान्वित कौन करेगा? निश्चित रूप से किसी भी देश के सत्ता संचालन के सूत्र गरीबों के हाथ में नहीं होते और अमीरों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारेंगे. कहानी है कि एक बार बिल्ली से त्रस्त चूहों की सभा हुई. इसमें उपाय सुझाया गया कि बिल्ली के गले में एक घंटी बांध दी जाए ताकि वह जहां भी जाए, घंटी की आवाज सुनकर...

असली जीत

वैसे तो मैं जिद्दी इतना ज्यादा हूं गुस्सा हो जाऊं अगर किसी से सालों तक बिन बोले भी रह सकता हूं पर अगले ही क्षण लगता है जीवन तो चार दिनों का है गुस्से की मेरे जीत भले ही हो जाये पर समय बीत जो जायेगा क्या फिर से वापस आयेगा? इसलिये मान लेता हूं हार तुरंत विरोधी के आगे झुक जाता हूं जब जीत भरोसा लेता हूं मनवाना अपनी बात सरल हो जाता है। हम बनकर मित्र किसी का जो भी चाहे करवा सकते हैं फिर क्यों शत्रुता निभाकर सबकुछ तहस-नहस कर देते हैं? (रचनाकाल : 9-10 जुलाई 2026)

अंधी दौड़

हम जाग रहे या सपना कोई देख रहे कुछ भी तो समझ नहीं आता पर दौड़ अनवरत जारी है। है नहीं किसी को पता कहां हम जायेंगे पर पिछड़ न जायें, इस डर से ज्यादा से ज्यादा तेज दौड़ते जाते हैं रफ्तार मगर बढ़ती जितनी डर उतना बढ़ता जाता है उतना ही होकर बदहवास हम और दौड़ते जाते हैं! जो ब्रेक लगाकर कभी रखे थे पुरखों ने हमने उनको बाधाएं समझ निकाल दिया नैतिकताओं को दकियानूसी कहकर स्पीड-ब्रेकरों को तो हमने तोड़ दिया पर नये बैरियर स्वयं न कोई बना सके जीवन को अपने अनुशासन में रख न सके अब बेलगाम यह दौड़ डराती जाती है दुर्घटना का अंदेशा बढ़ता जाता है। (रचनाकाल : 8 जुलाई 2026)

अपराधी से नहीं जनाब, अब प्रतिष्ठित लोगों से डर लगता है !

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 दुनिया में अपराध प्राचीनकाल से ही होते रहे हैं और अपराधियों को दंडित भी किया जाता रहा है. लेकिन पूरी मानव जाति के इतिहास में शायद हम पहली बार एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां खौफनाक अपराध ऐसे लोग कर रहे हैं जिनका पहले से कोई आपराधिक रिकाॅर्ड नहीं है. इंदौर के राजा रघुवंशी हत्याकांड की यादें अभी भी धुंधली नहीं पड़ी हैं (जांच में पुलिस की चूक से आरोपी को जमानत मिल जाने से लोग एक बार फिर सन्न रह गए हैं), कि पुणे के केतन अग्रवाल हत्याकांड ने एक बार फिर समूचे सभ्य समाज को हिलाकर रख दिया है.  ये दोनों हाईप्रोफाइल मामले बहुचर्चित हुए, लेकिन अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि इस तरह की ढेरों घटनाएं इन दिनों सामने आ रही हैं, जिनमें अपराध ऐसे लोग कर रहे हैं जो पेशेवर अपराधी नहीं हैं. बाहर से शांत दिखने वाले लोग भीतर से कितना उबल रहे हैं, इसका कोई अनुमान भी नहीं लगा  सकता. मुंबई लोकल के एक फर्स्ट क्लास डिब्बे में भारी बारिश के दौरान सिर्फ दरवाजा बंद करने को लेकर हुई बहस में एक व्यक्ति ने दूसरे की चाकू मारकर हत्या कर दी. नवी मुंबई के एक सरकारी आंगनवाड़ी केंद्र में एक बच्ची की बुरी त...

नफरत बनाम प्रेम

जब प्रेम किसी से करते हम तो सबसे अच्छा रूप दिखाई पड़ता है नफरत में लेकिन विकृत रूप में दिखते हैं मुझको डर सबसे अधिक घृणा से लगता है इसलिये प्रेम मैं सब लोगों से करता हूं सबका सर्वोत्तम रूप सामने आ पाए हरसंभव कोशिश यही, हमेशा करता हूं । सब सहमत ही हों मुझसे, नहीं जरूरी यह दुश्मनी भी अगर चाहें तो कर सकते हैं पर घृणा करें, मुझसे यह सहन नहीं होता नफरत में जीने से तो मरना बेहतर है है मजा दुश्मनी करने में तो असली तब हम अगर कभी मर भी जायें तो सबसे ज्यादा दु:खी हमारा दुश्मन हो! रचनाकाल : 19 जून-3 जुलाई 2026

पुरुषों के परजीवी होने का खामियाजा उठाती महिलाएं

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 हाल ही में अमेरिका से एक खबर सामने आई कि जीवनसाथी की तलाश में अमेरिकी पुरुष अब एशियाई और दक्षिण अमेरिकी देशों की ओर रुख कर रहे हैं, क्योंकि इन देशों में उन्हें ज्यादा ‘पारंपरिक’ और ‘सेवा करने वाली’ जीवन साथी मिलती हैं. इप्सोस जैसे सर्वेक्षणों में सामने आया है कि करीब 31 प्रतिशत युवक मानते हैं कि उनकी पत्नी सेवाभावी होनी चाहिए, वे नहीं चाहते कि शादी के बाद वह अनावश्यक विवाद करे. दरअसल बेहतर शिक्षा और अच्छी कॉर्पोरेट नौकरियों के कारण महिलाओं में भी पुरुषों की तरह स्वतंत्र व्यक्तित्व का विकास होने लगा है और वे पुरुषों से दबकर नहीं रहना चाहतीं. हम मनुष्यों में कामचोरी की प्रवृत्ति कदाचित प्राचीन काल से ही रही है. मनुष्येतर जीवों से अधिक चालाक होने का फायदा हमने हमेशा अपनी सुख-सुविधाओं को बढ़ाने में ही उठाया है. आखिर जब दुनिया के सारे जीव-जंतु लगभग आत्मनिर्भर होकर अपना जीवन गुजारते हैं तो क्या हम मनुष्य भी दूसरों का शोषण किए बिना अपना काम नहीं चला सकते थे! लेकिन अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता का दुरुपयोग हमने दूसरों का शोषण करने के लिए किया. जब तक हम ‘जंगली’ थे, तब तक तो कंदमूल-फल और शिकार के ...

अमृत-मंथन

अमृत सागर के भीतर सिर्फ नहीं होता हर मानव के भीतर अच्छाई होती है बाहर लाने को खुद को मथना पड़ता है यह सच है पहले विष ही निकला करता है पर उसको जो सच मान, वहीं रुक जाते हैं भीतर के अमृत को न कभी वे पाते हैं। है नीलकण्ठ सी शक्ति नहीं मेरे भीतर सारी दुनिया को ‘कालकूट’ से बचा सकूं पर आसपास के लोग बुरे जो दिखते हैं उनकी कमियों के प्रति सहृदयता रखता हूं अपनी कमियों के किस्से उन्हें सुनाता हूं मुझ जैसा बनने की कोशिश वे करते हैं। सच तो यह है अपनी कमियों से लड़कर मैं आगे बढ़ने की कोशिश हरदम करता हूं सब लोग मुझे अपने जैसे ही दिखते हैं उनकी कमियां अपनी कमियों सी लगती हैं प्रोत्साहन पाकर कोई आगे बढ़ता है तो मुझको लगता है मैं आगे बढ़ता हूं। रचनाकाल : 18 जून 2026

प्रेम परिष्कृत करता है, फिर क्यों निकृष्ट बनकर ही रह जाते हैं हम !

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  युवाओं के आक्रोश और असंतोष को भुनाने के लिए ‘काॅकरोच पार्टी’ का गठन होने के बाद, अब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने ‘इश्क करो पार्टी’ नामक एक नए प्लेटफाॅर्म का ऐलान किया है. उन्होंने युवाओं से इसे ज्वाइन करने की अपील करते हुए ‘मेक लव, नाॅट वार’ अर्थात ‘युद्ध नहीं, प्रेम करो’ का नारा दिया है. हालांकि जस्टिस काटजू की इस पार्टी का कोई औपचारिक मेनिफेस्टो या संगठन ढांचा सामने नहीं आया है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि युद्धों की विभीषिका से जूझती दुनिया में प्रेम अब हमारे लिए शौक की चीज नहीं बल्कि अस्तित्व का सवाल बन गया है. दुनिया में कौन ऐसा इंसान होगा जो प्रेम नहीं बल्कि नफरत करना चाहता हो! लेकिन ‘इश्क’ शब्द से आज हमारे मन में जो तस्वीर बनती है, क्या वह सचमुच इतनी निर्मल है कि हर कोई बिना किसी झिझक के इस पार्टी में शामिल हो सके? हकीकत शायद यह है कि आज प्रेम को भी हमने इतना सस्ता और सड़कछाप बना दिया है कि उसी धारणा के चलते ‘इश्क करो पार्टी’ समाज में किसी गंभीर विमर्श का केंद्र बनने के बजाय मजाक का विषय बन कर रह गई है और सोशल मीडिया में उस पर मीम्स की बाढ़ आई हुई है. ...

कल्पना और हकीकत

जब नहीं चांद पर पहुंचे थे हम चंदा मामा बहुत सुहाने लगते थे सच लेकिन उनका जान कहीं कुछ मूल्यवान अत्यंत चीज तो हमने नहीं गंवा डाली! पशु-पक्षी, पौधे-पेड़ और इंसान सभी आपस में बातें करते हैं जब पढ़ते थे ये कहानियां वे मंत्रमुग्ध कर देती थीं जब से लेकिन यह पता चला वे सिर्फ कल्पनाएं ही थीं क्या नहीं उन दिनों की तुलना में जीवन थोड़ा नीरस, बोझिल लगता है! हर एक आदमी के भीतर दस-बीस आदमी होते हैं यह निदा फ़ाज़ली कहते हैं फिर सच के क्यों हो सकते रूप अनेक नहीं जिस तरह देखते-सुनते हैं हम दुनिया को सब जीव-जंतु भी क्या वैसे ही सुनते और देखते हैं? सपने यदि नहीं जरूरी होते जीवन में तो क्यों रातों को सोते समय देखते हम अब कौन फैसला करे कि दिन की दुनिया ही सच है, रातों की झूठी है क्या पता कि दोनों ही सच हों क्यों नहीं संतुलन दोनों में हम रखते हैं!   रचनाकाल : 14 जून 2026

हम नहीं जानते पूरा सच, फिर गलत किसी को मान बैर क्यों करते हैं ?

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 पिछले दिनों खबर आई कि नाॅर्वे इस बार फुटबाॅल विश्वकप को जीतने नहीं बल्कि ‘लूटने’ के इरादे से आक्रामक ‘वाइकिंग- थीम’ बना रहा है. वाइकिंग्स स्कैंडिनेविया अर्थात वर्तमान नाॅर्वे, स्वीडन और डेनमार्क में रहने वाले मध्यकालीन समुद्री लुटेरे थे, जिनकी निर्दयता के किस्से जगजाहिर हैं. जाहिर है विश्वकप को कोई लूट तो नहीं सकता लेकिन नाॅर्वे शायद दो कारणों से ऐसा कर रहा है. एक तो इसलिए कि उसके खिलाड़ियों में लुटेरों जैसी आक्रामकता आ सके, जो कि जीत में बहुत सहायक होती है और दूसरी इसलिए कि अपने पूर्वजों का महिमामंडन कर सके! लेकिन आज के सभ्य युग में कोई लुटेरों को महिमामंडित कैसे कर सकता है? नाॅर्वेजियन लोग शायद अपवाद नहीं हैं. पूर्वज अच्छे रहे हों या बुरे, हम इंसानों की प्रवृत्ति अपनी विरासत पर गर्व करने की ही होती है. इसलिए वर्तमान दृष्टि से उनके बुरे नजर आने वाले कार्यों को भी हम न्यायोचित ठहराने की कोशिश करते हैं. क्रूर से क्रूर शासक भी अपने समुदाय की नजरों में नायक होता है. प्राचीन और मध्यकालीन भारत पर हमला करने वाले मंगोल, शक, हूणों, यवनों, तुर्कों को हम भले ही क्रूर आक्रमणकारी मानते हों, ल...

पत्थर भी पिघलते हैं

मुझको सब लोग डराते थे यदि दरियादिली दिखाओगे तो दुनिया तुमको ठग लेगी चमड़ी मोटी यदि नहीं करोगे मार-मार कर पत्थर घायल कर देगी। फिर भी मैंने अनसुना किया सबके ऊपर विश्वास किया पहने न कवच-कुण्डल सबसे दिल खोल मिला। बेशक वैसे भी लोग मिले डर जैसा लोग दिखाते थे पर कुछ ऐसे भी लोग मिले जिनसे मिल बेहद खुशी मिली खुश उतने वे भी लोग हुए सब बुरे नहीं हैं, उनसे मिलकर मुझे लगा उनको भी मुझसे मिलकर बिल्कुल यही लगा। ऐसे लोगों की खातिर मैंने ठान लिया जो लूटा करते हैं उनकी खातिर मैं लुट भी सकता हूं अनहित का बदला हित करके दे सकता हूं बस इसी तरह से दुनिया को थोड़ा बेहतर कर सकता हूं। जैसे ही मैंने ऐसा करना ठान लिया अद्‌भुत है, जिनको बुरा समझता था पहले मन परिवर्तित उनका भी होना शुरू हुआ शायद उनको था ठगा किसी ने इसीलिए ठगहार बने पत्थर सहकर ही कभी जमाने के अपने वे पत्थरदिल बन, लगे मारने थे पत्थर! रचनाकाल : 5 जून 2026

प्रेम परिष्कृत करता है

किस्मत से किसी को दुनिया में कोई चाहने वाला मिलता है तुमको भी अगर कोई मिल जाये तो खुद को पावन कर लेना गंगाजल जैसा मन को निर्मल कर लेना। यह आग नहीं कोई साधारण कर लेता है जो अग्निस्नान कुंदन की तरह दमकता है तुम भी सब कचरा जला स्वयं को सोना खरा बना लेना। तुमको शायद अहसास न हो क्या वस्तु तुम्हें अनमोल मिली तुम मोल चुका न सकोगे कभी देकर समाज को अधिकाधिक हो सके तो ब्याज चुका देना। रचनाकाल : 2-3 जून 2026

हम सही काम भी बिना प्रलोभन मिले नहीं कर पाते हैं !

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 अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण पेट्रोलियम पदार्थों की किल्लत के बीच, डीजल बचाने के लिए महाराष्ट्र के परिवहन महामंडल (एसटी) ने एक अनूठी पहल शुरू की है. एसटी की ‘डीजल बचाओ, इनाम पाओ’ मुहिम के अंतर्गत प्रत्येक डिपो को हर दिन पांच लीटर डीजल बचाने का लक्ष्य दिया गया है. कम ईंधन खर्च करने वाले एसटी के ड्राइवरों को इनाम के रूप में विशेष प्रोत्साहन भत्ता देने की घोषणा की गई है और जो दिए गए लक्ष्य से ज्यादा ईंधन बचाएंगे उन्हें हर महीने विशेष पुरस्कार मिलेगा.  देखा जाए तो हजारों लीटर डीजल रोज खर्च करने वाले डिपो के लिए रोज पांच लीटर डीजल बचाना कोई बड़ी बात नहीं है, न ही इस बचत से कोई बहुत बड़ा फर्क पड़ने वाला है. लेकिन इनाम के लालच में ही सही, ड्राइवर इससे मितव्ययी बनने की जो कोशिश करेंगे, उससे परिवहन महामंडल को तो जो फायदा होगा वह होगा ही, किफायतशारी की आदत पड़ने से ड्राइवरों को अपनी निजी जिंदगी में कई गुना ज्यादा फायदा होगा.  दरअसल अपने घर में तो हम एक-एक पैसा बचाने की कोशिश करते हैं, लेकिन घर के बाहर निकलते ही अपने कार्यस्थल पर सरकारी या निजी कंपनियों द्वारा प्रदान की जाने वाली सुव...

मशविरा

इतने नजदीक न आ, फासला रख मुझसे तू मुझे अपनी सगी बेटी जैसी प्यारी है बात किस-किस को मगर अपनी ये समझाऊंगा आड़ लेकर मेरी क्या लोग न कर जायेंगे मेरी जब देंगे मिसालें, मैं कहां जाऊंगा एक जीवन में कई बार न मर जाऊंगा! बचपना तेरा मेरे मन को बहुत भाता है देख मासूमियत बचपन मुझे याद आता है किंतु सीधा है नहीं आज जमाना इतना भेड़िये घूम रहे भेष बदल कितने ही हो रही है तू बड़ी, थोड़ी समझदारी ला इतने नजदीक न आ, फासला रख मुझसे।   रचनाकाल : 27 मई 2026