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निर्भयता के अभाव में कायरों की आक्रामकता से तबाह होती दुनिया

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 अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पिछले दिनों एक हैरान कर देने वाला खुलासा किया. ट्रम्प ने बताया कि नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान तुर्की की राजधानी अंकारा से निकलते समय वे मीडिया के सामने दिखाने के लिए अपने आधिकारिक विमान एयरफोर्स वन में चढ़े जरूर थे लेकिन अंदर जाकर वे पीछे के रास्ते से उतरकर एक एयरपोर्ट कैटरिंग कंटेनर में छिप गए और गुप्त रूप से एक सैन्य जेट से बाहर निकल गए थे. एयरफोर्स वन में सवार मीडियाकर्मियों को इसकी भनक तक नहीं लगी, क्योंकि ट्रम्प के उनके साथ होने का आभास देने के लिए विदेश मंत्री और ट्रेजरी सचिव समेत शीर्ष अधिकारी उनकी नजरों के सामने ही थे. जाहिर है कि इतनी गहरी गोपनीयता के चलते ईरानियों को तो इसकी हवा भी नहीं लगी होगी और उन्होंने यही समझा होगा कि ट्रम्प एयरफोर्स वन में ही सवार हैं. फिर उन्होंने हमला क्यों नहीं किया?  तो क्या हमले की जिस खुफिया सूचना को इतना पुख्ता माना जा रहा था कि उसके चलते ट्रम्प को एक कंटेनर में छिपकर भागना पड़ा, वह झूठी थी? 22 साल पहले, सामूहिक विनाश के रासायनिक, जैविक या परमाणु हथियार बना लेने की जिस खुफिया जानकारी का दावा करते हुए...

मृग-मरीचिका

क्यों अक्सर ऐसा होता है जो पास हमारे होता है वह उतना खास नहीं लगता जितना महसूस चले जाने पर होता है! जब नहीं अधिक सुविधाएं थीं तो कष्ट-असुविधा भरी जिंदगी लगती थी पर सुविधा बढ़ जाने पर भी क्यों समय सुहाना वही पुराना लगता है! कट जाय उम्र सुख-सुविधा में हम यही कामना करते हैं संघर्षहीन जीवन का फिर क्यों अंत निरर्थक लगता है! hemdhar.blogspot.com रचनाकाल : 3-12 सितंबर 2026

बच्चों को भुगतना पड़ता है बड़ों के पाखंड का खामियाजा

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 पिछले दिनों स्कूल में एक छोटे बच्चे को टीचर ने चांटा मारा और उसकी मौत हो गई. दिल्ली के एक कन्या विद्यालय की सातवीं कक्षा की छात्रा की मौत के मामले में आरोप है कि किताब नहीं लाने पर शिक्षिका ने उसे सजा दी थी. छत्रपति संभाजीनगर में पहाड़ की चोटी से कूदने वाले किशोर की तो देशभर में चर्चा हुई, जिसमें उसके माता-पिता की भी मौत हो गई थी. दो छात्र चोरी करने के लिए अपनी प्रिंसिपल के घर में घुसे और जाग जाने के कारण प्रिंसिपल को चाकुओं से गोद कर मार डाला.  आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि आज बच्चे इतने नाजुक होते जा रहे हैं कि एक चांटा भी नहीं सह पाते, इतने जिद्दी हो रहे हैं कि मांगें मनवाने के लिए अपनी जान तक दे देते हैं! या फिर इतने क्रूर हो रहे हैं कि किसी की जान लेने से भी नहीं हिचकते! आज की बुजुर्ग हो चुकी पीढ़ी में शायद बहुतों को अपने बचपन के वे दिन याद होंगे जब स्कूल में शिक्षकों की छड़ी के जोरदार प्रहार से बचने के लिए वे क्या-क्या तरीके नहीं खोजते रहते थे. एक बार एक बच्चे ने किसी बात पर अपनी मां को कुएं में कूद जाने की धमकी दे दी. परेशान मां ने दोपहर में खाना खाने घर आए पिता को यह बा...

अच्छाई में कमी

कुछ लोगों को बुरा समझकर मैंने उनकी निंदा की पर अच्छे निकले जब वे तो मैं लज्जा से गड़ गया स्वयं की नजरों में गिर गया बुराई शायद मेरे भीतर थी! इसलिये नहीं अब कभी किसी को करता हूं बदनाम  कि मेरी अगर धारणा साबित कभी गलत हुई तो क्या नहीं डूब कर मर जाऊंगा चुल्लू भर पानी में ही! सच तो यह है कोई भी इतना बुरा नहीं अच्छाई का प्रतिदान बुराई से जो दे यदि हमको ऐसा लगता है हम तो हरदम अच्छा करते पर बुरा हमारे साथ हमेशा होता है तो कमी हमारी अच्छाई में शायद है! रचनाकाल  : 6 सितंबर 2026

क्रिया-प्रतिक्रिया

है नियम प्रकृति का ही शायद  प्रत्येक क्रिया की होती है प्रतिक्रिया कि करता है जब कोई बुरा किसी का बुरा वक्त फिर उसका भी फिर आता है फिर क्यों विश्वास हमारा यह डिग जाता है अच्छाई का बदला न हमें मिल पायेगा! अच्छाई के बदले में भी यदि कोई करता बुरा दोष ईश्वर को देने लगते हम क्यों नहीं झांकते हैं भीतर  करने को आत्मनिरीक्षण यह अच्छाई में तो कहीं हमारे खोट नहीं! रचनाकाल  : 5-6 सितंबर 2026

दु:ख जड़, सुख फल

बांटता हूं लोगों को सुख जब तो लौटता है कई गुना होकर वह दूसरों के चेहरे पर देख खुशी मन मेरा और भी खुश होता है। दु:ख के भी साथ ऐसा होता है लगता है डर उसे बांटने में देख कर लोगों को दुःखी मेरा भी दुःख न बढ़े कई गुना इसीलिए सहता हूं चुपचाप  छिपाता हूं उसी तरह वृक्ष जैसे छिपाते हैं अपनी जड़ देते हैं लोगों को फूल-फल दुःख भी मुझे लगते अपनी जड़ों जैसे चाहता हूं रखूं उन्हें भीतर ही लोगों को बांट सकूं  ताकि खूब फूल-फल। रचनाकाल : 5 सितंबर 2026

गहरी नींद से झकझोर कर हमें जगाने के लिए आती हैं आपदाएं !

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 पिछले दिनों अचानक आई भयावह बाढ़ ने नेपाल को दहला दिया. बाढ़ का कारण हिमालय क्षेत्र में एक विशाल ग्लेशियर और चट्टान का टूटना बताया जाता है. लेकिन ग्लेशियर यूं ही नहीं टूट गया. वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय क्षेत्र के तापमान में वृद्धि हो रही है, जिससे ग्लेशियर कमजोर हो रहे हैं और इस तरह आपदाओं की आशंका बढ़ गई है. पिछले साल भारत में कई स्थानों पर फ्लैश फ्लड ने कहर ढाया था. तेरह साल पहले की केदारनाथ त्रासदी आज भी लोगों के जेहन में ताजा है. ‘नासा साइंस’ जैसी वैज्ञानिक संस्थाओं और संयुक्त राष्ट्र के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार हमारी पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिससे मौसम का चक्र पूरी तरह से बिगड़ चुका है. दुनिया के अधिकांश देशों में हाल के वर्ष सबसे गर्म दर्ज किए गए हैं. समुद्र का तापमान बढ़ने से हवा में नमी बढ़ी है जिससे अचानक बादल फटने और विनाशकारी बाढ़ आने की घटनाएं बढ़ गई हैं. दुनिया के कई हिस्से बाढ़ से जूझ रहे हैं तो कई सूखे से. अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अमेजन के जंगलों में लगने वाली आग बेहद खतरनाक होती जा रही है तो अंटार्कटिक...

अलविदा

सूर्योदय में ही सिर्फ नहीं होता सौंदर्य डूबते सूरज की लालिमा की भी अपनी गरिमा होती है सिर्फ जन्म लेने की ही नहीं मनाई जातीं खुशियां आयु पूर्ण कर मरने वालों को भी धूमधाम से किया जाता है विदा। परिवर्तन ही नियम है सृष्टि का पुराना जाता है, तभी नया आता है किन्तु नया ही जब चला जाये तो कौन ले सकता है उसका स्थान? बहुत त्रासद होता है असमय जाना बहुत कठिन होता है किसी को बीच राह में ही कहना, अलविदा!!! hemdhar.blogspot.com रचनाकाल : 5 जून 2026

मुनाफाखोरों के शोषण से आम जनता को बचाए कौन ?

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 बच्चों में मोबाइल की लत लगने को लेकर बड़े अक्सर चिंता जाहिर करते हैं. कुछ माह या साल के बच्चों तक के मोबाइल एडिक्ट होने की चिंताजनक खबरें आती रही हैं. अब खुलासा हो रहा है कि ये अनायास नहीं है, सोशल मीडिया कंपनियों ने जानबूझ कर ऐसे फीचर बनाए हैं जो बच्चों को मोबाइल एडिक्ट बनाते हैं. अमेरिका के 29 राज्यों ने तो मेटा पर इसके लिए केस भी कर दिया है. उनका आरोप है कि इंस्टाग्राम व फेसबुक के लाइक, असीमित (या अनंत) स्क्राॅलिंग, ऑटो प्ले व नोटिफिकेशन बच्चों को ज्यादा देर एप्प इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किए गए हैं. सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों को पता होगा कि अनंत स्क्राॅलिंग में फीड खत्म ही नहीं होती, यानी कितना इस्तेमाल करना है, यह पता ही नहीं चलता.  कुछ माह पहले यह सनसनीखेज जानकारी सामने आई थी कि जब आपके मोबाइल फोन की बैटरी ‘लो’ हो तो एप्प आधारित कोई सर्विस लेने पर ज्यादा पैसे कटते हैं, क्योंकि सर्विस प्रोवाइडर अंदाजा लगा लेते हैं कि बैटरी कम होने से आपके पास ज्यादा ऑप्शन बचे नहीं होंगे, यानी आप झख मारकर ज्यादा पैसे चुकाएंगे! यही नहीं, आईफोन के जरिये कोई सर्विस लेने पर, एंड्राॅइड ...

चरैवेति-चरैवेति

मैं रोज सुबह से शाम काम जब वही-वही करके हो जाता बोर सोचता हूं कई बार चकित होकर यह धरती रोज लगाती चक्कर सूरज के धरती के चक्कर रोज लगाता चांद सूर्य भी जाने किसके चक्कर काटा करता है क्या नहीं बोर ये सब भी हो जाते होंगे, मैं तो कुछ दिन में ही घबरा जाया करता क्या ग्रह-नक्षत्र ये कभी न घबराते होंगे! पर धरती जब हल्की भी करवट लेती है भूकम्प हमें तब तहस-नहस कर जाते हैं सूरज को हल्की-सी भी झपकी आती है तो धरती हिमयुग में प्रवेश कर जाती है जब चंदा मामा उद्वेलित हो जाते हैं हम मानव भी तो ‘लूनाटिक’ हो जाते हैं! पर परिवर्तन तो रोज कुछ न कुछ सब में ही आता होगा वरना धरती पर मानव इतना विकसित कैसे हो पाता वैज्ञानिक कैसे यह अनुमान लगा पाते अरबों वर्षों ही बाद सही दिन ऐसा भी वह आयेगा जब सूरज भी बुझ जायेगा धरती यह मृत हो जायेगी चंदा मामा तो पहले ही खो जायेंगे! जब सबकी उम्र नियत है तो हर बार लगाते चक्कर जो कुछ तो अंतर आता होगा पिछले दिन जैसा ही कैैसे अगला दिन रह जाता होगा! मैं भी इसलिये नयापन लाने की खातिर सब तहस-नहस कर जाने से अब बचता हूं फिर भी हर रोज कदम कुछ आगे बढ़ता हूं यह समझ गया हूं नियम सृष्टि का मृत...

हम लय बिगाड़ कर क्यों सुलझी चीजों को उलझा देते हैं ?

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 इन दिनों बेंगलुरु के एक टीचर का वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वे बाॅलीवुड गाने की धुन पर छात्रों को पीरियॉडिक टेबल याद करा रहे हैं और बच्चे नाचते-गाते हुए इस मुश्किल टेबल को भी बहुत आसानी से याद कर ले रहे हैं. इसके पहले भी भौतिकी, रसायन, गणित जैसे नीरस माने जाने वाले विषयों को मजेदार तरीके से पढ़ाने वाले कई शिक्षकों के वीडियो वायरल हुए हैं.  आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में सबसे ज्यादा बच्चे गणित में फेल होते हैं, क्योंकि उसे सबसे नीरस विषय माना जाता है. जबकि श्रीनिवास रामानुजन् जैसे महान गणितज्ञ को गणित में इतना मजा आता था कि दिन-रात उसी में डूबे रहते थे और इस चक्कर में अन्य विषयों में फेल तक हो जाते थे. इससे लगता है कि समस्या शायद गणित विषय के साथ नहीं है, बल्कि उसे पढ़ाने का तरीका नीरस होने पर छात्रों को उससे डर लगने लगता है. रवींद्रनाथ टैगोर के बाल-मन पर अपने शिक्षकों के पढ़ाने के तरीके की ऐसी बुरी छाप पड़ी कि बड़े होकर उन्होंने शांतिनिकेतन जैसी महान शिक्षण संस्था बनाई, जहां विद्यार्थी प्रकृति के सान्निध्य में पढ़ते थे.  कहा जाता है कि किसी काम में मजा आने लगे तो व...

कठिन लड़ाई

मैंने देखा नहीं राज अंग्रेज का  उनके किस्से सुने हैं मगर जुल्म के  आज कोई फिरंगी नहीं देश में  हम हैं आजाद, अपना ही अब राज है । किन्तु शासक तो वैसे ही आते नजर  क्रूरता में तो दिखती न हीं है कमी नाम हों सब दलों के भले ही अलग  सब का शासन का ढंग तो मगर एक है ! शत्रु बलवान कितना ही बाहर का हो  उससे लड़ना नहीं होता इतना कठिन  किन्तु अपने ही बन जाएं दुश्मन अगर  कौन भीतर की अपने लड़ाई लड़े ! रचनाकाल : 15 अगस्त 2026 

खजाना भरने के लिए नैतिकता को ताक पर रखना कितना उचित ?

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 कैंसर से जूझते एक पिता की अपने मासूम बेटे से अंतिम बातचीत का मार्मिक वीडियो हाल ही में वायरल हुआ. वीडियो में पिता कह रहे थे, ‘अगर मैं कहीं चला जाऊं तो मम्मी जो कहे वो मान लेना. मत पूछना कि पापा कहां हैं, अपनी दोनों बहनों का ख्याल रखना...जब भी तुम्हें मेरी याद आए, मैं तुम्हारे आसपास ही रहूंगा...’ उस आदमी को कौन सा कैंसर था, यह तो पता नहीं लेकिन एक यूजर की प्रतिक्रिया थी, ‘कम से कम तंबाकू और शराब का इस्तेमाल तो ज्यादा मत करो. हम जितना हो सके इनसे बचने की कोशिश कर सकते हैं, बाकी तो किस्मत और भगवान की मर्जी है.’ एक दूसरे यूजर का कहना था, ‘किसी भी बेटे या पिता को ऐसी स्थिति नहीं देखनी चाहिए. यह बहुत दुखद है.’ दो माह पहले एक मासूम बच्ची का भी वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह बेहद उदास मुद्रा में खड़ी, अपने पापा की तस्वीर को देखते हुए कहती है, ‘मम्मी आपको मना करती थी ना कि दारू मत पिया करो, फिर आपने क्यों पी? देखो, आज सबके पापा हैं, लेकिन आप दारू पीकर मर गए...’ उस वीडियो ने भी देखने वालों को भावुक कर दिया था.  उधर बिहार में शराबबंदी खत्म करने की सिफारिश से संबंधित समाचार हाल ही में अख...

भीतर का न्याय

जीवन में ऐसे अवसर आए कई बहुत आसानी से सबकी आंखों में धूल झोंक मैं सकता था अपराध घोर करके भी लोगों की नजरों में पाक-साफ रह सकता था उस समय आत्म-अनुशासन ने ही मेरे, पर हर बार मुझे नीचे गिरने से बचा लिया जब कोई देख नहीं सकता था बाहर से मेरे अंतर्मन ने ही मुझको सजग किया। इसलिये कौन क्या सोचेगा, अब इसकी मैं परवाह बहुत कम करता हूं अपनी नजरों में कभी न गिरने पाऊं बस कोशिश यह हरदम करता हूं जो ईश्वर को अन्यायी कह कोसा करते उनको भी यह समझाता हूं बस अपने प्रति ईमानदार रहने की कोशिश किया करो सब स्वत: ठीक हो जायेगा हम सिर्फ देख पाते बाहर इसलिये हमेशा न्याय अधूरा करते हैं पर ईश्वर हम लोगों के भीतर बैठा है इसलिये कभी अन्याय नहीं वह करता है। रचनाकाल : 3 अगस्त 2026

हम मानव, जग में सर्वश्रेष्ठ हैं; या फिर सबसे बदतर हैं ?

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 पिछले दिनों स्पेन के तटीय शहर सेउटा की तस्वीरें अखबारों में छपीं, जहां अफ्रीकी देश मोरक्को से करीब 60 हजार लोगों ने समुद्र में पांच किमी तक तैरकर घुसपेैठ की. इस दौरान समंदर में डूबने और भगदड़ में अनेक लोगों की मौत भी हो गई. बेहतर जीवन की तलाश में पलायन की यह घटना कोई अपवाद नहीं है बल्कि दुनियाभर में इस तरह के दृश्य देखने को मिल रहे हैं. अमेरिका में तो डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति चुनाव जीतने का एक बड़ा कारण ही यह था कि उन्होंने मैक्सिको से आने वाले घुसपैठियों को रोकने के लिए दो हजार मील लंबी सीमा पर दीवार बनवाने का वादा किया था. कई साल पहले समुद्र किनारे औंधे पड़े एलन कुर्दी नामक बच्चे के शव ने शरणार्थियों के संकट की भयावहता के बारे में पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था. म्यांमार से भगाए गए रोहिंग्या शरण पाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार विश्व में मजबूरीवश विस्थापित होने वालों और आश्रय की तलाश में दर-दर भटकने वालों की संख्या 12.3 करोड़ से भी अधिक है.  माना जाता है कि मनुष्य दुनिया का सबसे बुद्धिमान प्राणी है. लेकिन जिस प्रजाति के करोड़ों लोगों को आश्रय तक क...

सुख फल में नहीं, परिश्रम में

मैं बिना भूख के खाता था जब स्वाद नहीं छप्पन भोगों में आता था इसलिये खूब मेहनत करके पहले मैं अपनी भूख जगाया करता हूं रूखा-सूखा खाना भी फिर छप्पन भोगों सा लगता है। वेतन जब लेता था अग्रिम बदले में करना काम बाद में बेहद बोझिल लगता था अब काम महीने भर करना उम्मीद बंधाये रखता है तनख्वाह अंत में बेहद खुशियां देती है। ईश्वर से भी मैं यही प्रार्थना करता हूं मेहनत का फल देना या चाहे मत देना पर बिना किये मेहनत कोई फल मत देना फल नहीं मिलेगा मेहनत का तो दाता का सुख पाऊंगा खैरात मगर लेकर याचक बन जाऊंगा! रचनाकाल : 29 जुलाई 2026

उधार की सोच कहीं कुंद तो नहीं कर डालेगी हमारा दिमाग !

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 हाल ही में सामने आई यह खबर बेहद चौंकाने वाली है कि आज के डिजिटल युग में लोग खुद सोचना तक छोड़ रहे हैं और रील्स, टीवी डिबेट देखकर या एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से पूछकर अपने विचार या दृष्टिकोण बना रहे हैं. अभी तक डर यह जताया जाता था कि एआई आधारित रोबोट कहीं इतने शक्तिशाली न बन जाएं कि हम मनुष्यों को पीछे छोड़कर खुद ही फैसले लेने लगें, क्योंकि अगर ऐसा होने लगा तो मशीनें हमारे अधीन नहीं रहेंगी बल्कि हम मनुष्य उनके गुलाम बनकर रह जाएंगे. लेकिन अगर हम इसी तरह सोच-विचार तक करने में आलस करते रहे और एआई पर ही निर्भर होते गए तो एक दिन क्या खुद ही उसके गुलाम नहीं बन जाएंगे? आज यह चलन सा बन गया है कि सोशल मीडिया पर हमें कुछ भी संवेदनशील सामग्री दिखी तो हम बिना कुछ सोचे-विचारे तत्काल उसे विभिन्न ग्रुपों में फारवर्ड कर देते हैं. अफवाहें पहले भी फैलती थीं लेकिन सोशल मीडिया ने इस काम को इतना आसान बना दिया है कि कभी-कभी तो यह तय करना ही मुश्किल हो जाता है कि हम अफवाहों के युग में जी रहे हैं या हकीकत के! चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ दिनों बाद जब उन अफवाहों का खंडन आता है या हमें हकीकत पता चलती ह...

सत्याग्रह में नहीं हारता कोई, हिंसा नहीं जीतने देती है !

 लोकतंत्र में जनता ही सरकार चुनती है लेकिन कई बार परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि जनता को अपनी उसी सरकार के खिलाफ आंदोलन करना पड़ता है. अक्सर होता यह है कि सरकार ऐसे आंदोलनों को बल प्रयोग के जरिये कुचलने की कोशिश करती है और आंदोलनकारी सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़ व सुरक्षा बलों के खिलाफ हिंसा के जरिये अपनी मांगें मनवाने की कोशिश करते हैं. नतीजतन दोनों पक्षों का नुकसान होता है. इसीलिए करीब एक शताब्दी पहले महात्मा गांधी ने अहिंसक सत्याग्रह का मार्ग दिखाया था, जिसमें दोनों पक्षों की जीत होती है. आज भी जो उस मार्ग का आश्रय लेता है वह घाटे में नहीं रहता, फिर भी ऐसा क्यों होता है कि हमें हिंसा और तोड़फोड़ का आश्रय लेना ही सबसे आसान लगता है?   हाल ही में काॅकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के दौरान कुछ युवा गांधीजी के मार्ग पर चलते दिखे. मीडिया माध्यमों ने दिखाया कि नागपुर के एक युवा को सुरक्षा बल के जवान लाठियों से पीट रहे थे और वह युवा कोई प्रतिरोध करने के बजाय चिल्ला रहा था कि मारो सर, मारो, और मारो मुझे... और अचानक ही लाठियां थम गईं. एक महिला सुरक्षा कर्मी युवक को बचाते...

आप ठगे सुख होत है...

धन चोरी करने, रिश्वत लेने वालों को जो मिलता है मेहनत करते जो, कई गुना वे अधिक कमाया करते हैं जो नकल किया करते वे पास भले ही हो जायें, लेकिन मेरिट में तो पढ़ने वाले बच्चे ही आया करते हैं। जो ठगते किसी और को, थोड़ी देर भले ही खुश हो लें नुकसान उठाकर भी लेकिन, रह पाने में ईमानदार जो सुख मिलता है अतुलनीय मन ही मन में बेईमानी करने वाले महसूस नहीं कर सकते हैं। हम तुच्छ लाभ की खातिर नीचे गिरते हैं क्षमता थी लेकिन उठने की जितनी ऊपर हम उसे गंवाने की क्षति का अहसास कभी कर पाए तो क्या माफ स्वयं को किसी तरह कर सकते हैं? रचनाकाल : 21 जुलाई 2026

दानवीरों के साथ-साथ कैसे बढ़ती जा रही है दान-चोरों की संख्या ?

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 अयोध्या के राम मंदिर में दान चोरी की घटना उजागर होने के बाद, देश के अलग-अलग हिस्सों से इसी तरह की चोरी की ढेरों घटनाएं सामने आने लगी हैं. हिंदू धर्म के चार पवित्र धामों में से एक बद्रीनाथ धाम में चोरी कांड की जांच एसआईटी कर रही है. वैष्णो देवी मंदिर में भी इसी तरह के गबन का मामला कोर्ट में पहुंच गया है, आरोप है कि मंदिर में भक्तों द्वारा अर्पित की गई करीब 20 टन चांदी, जिसकी कीमत 550 करोड़ रु. होनी चाहिए, में मिलावट की गई या उसे बदल दिया गया और टकसाल में गलाए जाने पर वह मात्र 30 करोड़ की निकली. गुजरात के प्रसिद्ध अंबाजी मंदिर में दान की चोरी का सीसीटीवी फुटेज वायरल हो रहा है और इस मामले में मंदिर से जुड़े तीन कर्मचारियों को गिरफ्तार किया जा चुका है. छत्तीसगढ़ के कांकेर में पांच मंदिरों और मध्यप्रदेश के अमरकंटक में व नलखेड़ा स्थित बगलामुखी मंदिर में भी दान और चढ़ावे में गंभीर अनियमितताओं के मामले सामने आ चुके हैं.  मंदिरों में दान देने की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है. भारत में नौ लाख से अधिक पंजीकृत मंदिर हैं. अधिकांश छोटे मंदिरों के पंजीकृत रिकाॅर्ड नहीं होने के कारण स...