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ये कहां आ गए हम, उल्टी दिशा में चल के !

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 पिछले दिनों उत्तरप्रदेश के बिजनौर में साइबर अपराधियों ने एक महिला को दस दिनों तक डिजिटल अरेस्ट रखकर इतना डराया-धमकाया कि शादी की सालगिरह से एक दिन पहले उसने फांसी लगाकर जान दे दी. अंतिम संस्कार के समय साइबर ठग का फोन आने पर परिजनों को शक हुआ, जिसके बाद पूरे मामले का खुलासा हुआ. महिला के मोबाइल में पांच नंबरों से धमकी वाले मैसेज मिले. इस खुलासे के बाद जब महिला के कमरे की छानबीन की गई तो एक डायरी में सुसाइड नोट मिला, जिसमें उसने एक लड़के द्वारा परेशान करने और ब्लैकमेल करने की बातें लिखी थीं.   डिजिटल अरेस्ट का यह मामला नया नहीं है, इन दिनों इस तरह की खबरों से अखबार रंगे रहते हैं. सरकारों और सामाजिक संगठनों की ओर से इस बारे में जनजागृति की जा रही है कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई चीज नहीं होती, इसलिए ऐसे साइबर ठगों के चंगुल में नागरिक न फंसें. जो अभी तक नहीं फंसे हैं उन्हें ताज्जुब भी होता है कि आज के जमाने में कोई इतना बेवकूफ कैसे हो सकता है! लेकिन हकीकत यह है कि खूब पढ़े-लिखे और समझदार लोग भी ‘डिजिटल अरेस्ट’ के झांसे में आ रहे हैं. ऐसा आखिर क्यों हो रहा है?  दरअसल कोई भी ...

पैमाना

जब नहीं पास था मेरे कुछ तब जो भी मिल जाता था उसको मान अनुग्रह ईश्वर का खुश रहता था मिल गया बहुत कुछ लेकिन जब तब थोड़ा भी घट जाने पर दु:ख उसका होने लगता था जो पास बचा, आनंद न उसका मिलता था। इसलिये नहीं मैं तुलना अब अच्छे दिन से, कम अच्छे दिन की करता हूं पैमाना हरदम बुरे दिनों का रखता हूं छोटे-मोटे दु:ख-कष्टों में सबसे खराब दिन याद कर लिया करता हूं उसकी तुलना में कम खराब दिन भी अब अच्छे लगते हैं। (रचनाकाल : 2-3 मई 2026)

मशीनें सेवक अच्छी होती हैं, पर मालिक निर्मम बनती हैं

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 पिछले दिनों एक खबर सामने आई कि नगालैंड के युवा किसान स्वयीवेजो डजुडो ने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री के उपयोग से एक कम लागत वाला ‘सोलर ड्रायर’ बनाया है, जो किसानों की सब्जियों को पारंपरिक तरीकों की तुलना में 30 प्रतिशत तेजी से सुखाता है. उन किसानों के लिए, जिन्हें सीजन में बम्पर पैदावार होने पर अपनी सब्जियां माटी मोल बेचनी पड़ती हैं या फेंकनी पड़ती हैं, निश्चय ही इस खबर से राहत मिली होगी, क्योंकि वे फेंकने के बजाय सुखाकर अपनी सब्जियों का जीवनकाल बढ़ा सकेंगे और उनकी यथेष्ट कीमत पा सकेंगे.  जब दुनिया में सिलाई मशीन का आविष्कार हुआ था या साइकिल ईजाद हुई थी तो इसे बहुत बड़ी क्रांति माना गया था. मनुष्य बल से चलने वाली इन दोनों मशीनों ने एक झटके में ही मानव श्रम को कई गुना बचाने में मदद की थी. जो दूरी पैदल तय करने में एक घंटे लगते, साइकिल से उसे बीस मिनट में ही तय किया जा सकता था. जो कपड़ा हाथ से सिलने में एक घंटा लगता, उसे सिलाई मशीन दस मिनट में ही सिल सकती थी.  तब से लेकर अब तक तकनीकी विकास जमीन से आसमान पर पहुंच गया है, लेकिन दुर्भाग्य से मानव श्रम से चलने वाली मशीनों का ...

खण्डहरों में सृजन

जब मारकाट चहुंओर मची हो हिंसा का उन्माद हर जगह फैला हो तब नया सृजन नि:सार दिखाई पड़ता है। पर कितना भी हो ध्वंस खण्डहर हो जाये सबकुछ चाहे जीवन तो इससे खत्म नहीं हो जायेगा! जब हिरोशिमा-नागासाकी सा हाल समूची दुनिया का हो जायेगा जो बचे रहेंगे या कि नये पैदा होंगे जीना बेहद मुश्किल उनका हो जायेगा तब उनको शायद नये सृजन की जिंदा रह पाने के लिये जरूरत हो! इसलिये तबाही का ताण्डव जो मचा रहे उनसे भी ज्यादा शिद्दत से हमको मिलकर कुछ नया सृजन करना होगा जब हद से दर्द गुजर जाये तब चीख-पुकार मचाने के बदले में कोई गीत नया सुमधुर स्वर में गाना होगा कचरा जलता है जैसे अग्निपरीक्षा में पर सोना और दमकता है जो गीत उपजता है असह्य पीड़ा में वह हर काल में अमर होता है। (रचनाकाल : 26 अप्रैल 2026)

दुश्मन की नजरों से खुद को यदि देखें तो हम भी वैसे ही दिखते हैं !

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 इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग के बीच, सभी पक्षों द्वारा खुद को सही और दूसरे पक्ष को गलत ठहराया जा रहा है. अपने तर्कों के आधार पर सारे देश अपनी-अपनी जगह सही भी लगते हैं. अमेरिका का यह डर निराधार नहीं लगता कि ईरान ने अगर परमाणु बम बना लिया तो इजराइल के अस्तित्व को तो वह ऐसे एक ही बम से मिटा सकता है! और ईरान की बात भी अपनी जगह ठीक लगती है कि उसने किसी देश के साथ कभी युद्ध की शुरुआत नहीं की और न ही करने का इरादा रखता है बल्कि वह तो एक पीड़ित राष्ट्र है. लेकिन अपनी नजर में जब गलत कोई नहीं है तो फिर क्यों देश एक-दूसरे को मारने-मरने पर उतारू हैं? सभी देश दूसरे पर दोषारोपण करते हैं लेकिन अपने ऊपर लगाए गए आरोपों पर भी क्या वे उतनी ही शिद्दत से गौर करते हैं? ईरान के बारे में अमेरिकी मीडिया में जो छपता है, उसे अगर ईरानी लोग पढ़ें तो शायद उन्हें अपना देश एक खलनायक की तरह नजर आए. इसी तरह ईरान के अखबारों में अपने देश के बारे में छपी खबरों को पढ़कर अमेरिकियों को अपना देश क्या सचमुच उतना ही महान नजर आएगा जितनी उन्होंने धारणा बना रखी है? ईरान के कुछेक परमाणु बम बना लेने की आशंका से भयभीत ...

दुश्मन मेरे जैसा

दुश्मन की नजरों से खुद को देखा जब तो रह गया स्तब्ध यह देख कि चेहरा मेरा भी दुश्मन जैसा हू-ब-हू दिखाई पड़ता है! दुश्मन में जितनी मुझे बुराई दिखती है उसको भी मेरे भीतर उतनी दिखती है मैं खुद को जितना अच्छा माना करता हूं वह भी खुद को वैसा ही माना करता है! तो जितना मैं निर्दयी समझता था उसको क्या उतनी ही निर्दयता मेरे भीतर है मन का काला जितना उसको माना करता क्या मैं भी भीतर से उतना ही काला हूं! जब से देखा है अक्स स्वयं का दुश्मन में मैं कांप गया हूं मन ही मन गहराई तक अब वह भी मुझको अपने जैसा लगता है हे ईश्वर, मेरे दुश्मन की रक्षा करना! रचनाकाल : 15 अप्रैल 2026

जब भविष्य बता सकता है एआई तो हम क्यों नहीं रोक पाते तबाही ?

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 हाल ही में एक खबर सामने आई कि पार्किंसन रोग होने का समय रहते अनुमान लगाने के लिए अत्याधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित क्लिनिकल अध्ययन की शुरुआत की गई है, जिससे लाइलाज होने से पहले ही इस बीमारी की पहचान कर, उसका इलाज संभव हो सकेगा.  पार्किंसन ही नहीं, एआई ने सैकड़ों बीमारियों की, उनके लक्षण दिखाई देने के पहले ही पहचान करके उनके समय रहते इलाज को संभव बनाया है. दरअसल हर बीमारी दिखाई देने के बहुत पहले से ही अपनी आहट देना शुरू कर देती है और एल्गोरिद्‌म के जरिये एआई पारंपरिक तरीकों की तुलना में अधिक सटीक रूप से अनुमान लगा सकता है कि किसी व्यक्ति को भविष्य में किस बीमारी का कितना खतरा है. स्वास्थ्य ही नहीं, अपराध रोकने के क्षेत्र में भी एआई बहुत मददगार साबित हो रहा है. ब्रिटेन की सरकार तो एक ऐसे एआई टूल पर काम कर रही है जो हत्या की घटना से पहले ही हत्यारे के बारे में भविष्यवाणी कर सकेगा. ‘मर्डर प्रिडिक्शन प्रोग्राम’ नाम का यह एआई पुलिस रिकाॅर्ड्‌स और सरकारी डाटा का इस्तेमाल करके अपराध होने के पहले ही उसकी संभावना के बारे में जानकारी दे देगा, जिससे वारदात रोकने में मदद मिल ...

ये कहां आ गये हम!

जीने की खातिर जाने-अनजाने मुझसे गलतियां कई हो जाती थीं अपराधबोध से मन विनम्र हो जाता था हर जीव-जंतु से क्षमा प्रार्थी रहता था चर-अचर सभी प्राणी मुझको जो देते थे एहसानमंद हो उन्हें देवता कहता था आकस्मिक विपदा अगर कभी आ जाती थी प्रायश्चित उसको समझ सह लिया करता था। जाने कब लेकिन मैंने, जो कुछ मिलता है अधिकार उसे हम इंसानों का मान लिया जो स्वेच्छा से सब जीव-जंतु दे देते थे बलपूर्वक उनसे वह सब लेना शुरू किया मन से कृतज्ञता भाव पुराना विदा हुआ मैं धीरे-धीरे इतना ज्यादा क्रूर हुआ चर-अचर सभी को जीत, बंधुओं से ही अपने लड़ता हूं दुनिया जो स्वर्ग सरीखी थी, अब नर्क बनाया करता हूं!   रचनाकाल : 11-12 अप्रैल 2026

जो खुद को नायक कहता है, खलनायक से भी अधिक भयावह लगता है !

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 हममें से शायद बहुत से लोगों ने वह कहानी सुनी होगी कि एक चिड़िया बहुत मेहनत से अपना घोंसला बनाती लेकिन एक उत्पाती बंदर उसे उजाड़ देता था. बार-बार उजाड़ने के बाद भी चिड़िया ने जब घोंसला बनाना नहीं छोड़ा तो आखिरकार बंदर को अपने कृत्य पर शर्म आई, उसने चिड़िया की मदद करने की सोची. लेकिन बहुतेरी कोशिशों के बावजूद जब वह दो-चार तिनके भी सही ढंग से नहीं जोड़ पाया, तब उसे अहसास हुआ कि तोड़ना कितना सरल है और जोड़ना कितना कठिन!  इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच पिछले सवा महीने से जारी युद्ध में विनाशलीला जारी है. ईरान तो अपने अस्तित्व पर खतरा मंडराते देख मरने-मारने पर उतारू है ही, युद्ध लंबा खिंचने से बौखलाए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी आखिरकार शांति दूत का अपना मुखौटा उतार फेंका है. ईरान की परमाणु क्षमता खत्म करने को युद्ध का मकसद बताने वाले ट्रम्प ने अब ईरान के पुलों को उड़ाना और बिजली केंद्रों को तबाह करना शुरू कर दिया है. उन्होंने नौ करोड़ की जनसंख्या वाले ईरान की पूरी सभ्यता को ही मटियामेट कर देने और पाषाण युग में धकेलने की धमकी दी है.  ट्रम्प को शायद यह सपने में भी अनु...

...सदा मगर मन रहना जी

पहले मुझको कुछ बातों या कुछ लोगों पर गुस्सा आ जाया करता था मैं बातें करके बंद उन्हें गुस्सा दिखलाया करता था पर लगा बाद में, जीवन चार दिनों का है गुस्से में ही यदि काट दिया क्या खाक इसे जी पाऊंगा! इसलिये जहां जो जैसा है वैसा ही कर स्वीकार उसे खुश रहने की कोशिश करता हर हालत में डर लगता है बातें मनवाने की अपनी जिद में यदि सबकुछ तहस-नहस कर डालूंगा तो मुझमें और डोनाल्ड ट्रम्प में फर्क कहां रह जायेगा! रचनाकाल : 4अप्रैल 2026

रफ्तार

यूं तो बदलाव हमेशा ही हुआ करते थे जिंदगी एक जगह पर न ठिठकती थी कभी किंतु होने में नया पीढ़ियां लग जाती थीं द्वंद्व चलता था नये और पुराने में ही। हो गई है मगर रफ्तार तेज अब इतनी कुछ दिनों में ही बदल जाती है सारी दुनिया खुद की नजरों में पराये हुए हम जाते हैं अपने ही आप को पहचान नहीं पाते हैं! जिंदगी पहले बहुत सुस्त लगा करती थी गति बढ़ी जब तो हुआ तन-मन रोमांचित, पर अब डराने ही लगी है बहुत भीषण रफ्तार हादसों का सदा अंदेशा बना रहता है! रचनाकाल : 31 मार्च 2026

ढोंगी बाबा से जब नेता मिलें, ‘करेला नीम चढ़ा’ हो जाता है !

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 पुरानी पीढ़ी के लोगों ने अपने बचपन में मेलों-ठेलों के दौरान अक्सर ही किसी मदारी और जादू जानने वाले के बीच का खेल देखा होगा. दोनों ही अपनी पूरी ताकत से एक-दूसरे पर मंत्रों की शक्ति से प्रहार करते थे. लगभग आधे-पौन घंटे तक जोर-आजमाइश का यह खेल चलता रहता था और अंत में दर्शकों की तरफ से जो पैैसा मिलता, वह या तो दोनों के बीच बराबर बंट जाता या अधिक मार सहने और हारने का नाटक करने वाला अधिक पैसा लेता था. हमारे गांव के स्कूल में मास्टरी करने वाला व्यक्ति इस खेल में हमेशा मदारी से जीत जाता और दर्शकों से मिलने वाले पैसे में कोई हिस्सा भी नहीं लेता था, क्योंकि बदले में लोगों के बीच उसकी अच्छी-खासी साख जम जाती और इतवार-मंगलवार को सुबह-सुबह टोना झारने (उतारने) का उसका व्यवसाय दिनोंदिन चमकता जाता था. बहुत दिनों तक हम बच्चे उनके इस नाटक को सच मानते रहे थे, लेकिन एक बार दूसरे गांव में मेले के दौरान जब जादू जानने वाले एक व्यक्ति ने मदारी के सामने हारने का नाटक किया और बदले में मिलने वाले पैसों में आधा हिस्सा बंटा लिया तो अनायास ही जैसे सारा तिलिस्म टूट गया था.  पिछले दिनों कथित ज्योतिषी और पाखं...

मरने का तुक

अंत में राम जब सरयूजी में उतरे होंगे जैसे सीताजी समाई थीं धरा के भीतर राम भी जल में अतल लीन हुए जब होंगे जब हिमालय में बिना पीछे मुड़े, देखे बिना पाण्डवों ने सभी स्वेच्छा से तजा होगा तन व्याघ्र ने कृष्ण के जीवन का किया होगा अंत आजकल मन में मेरे दृश्य वही आते हैं। यूं तो लेते ही जनम मृत्यु भी तय होती है लोग कुछ उसको भी उत्सव की तरह लेते हैं किंतु जो हिस्से में आई है समय में मेरे युद्ध में खत्म ये दुनिया जो हुई जाती है अंत शालीन नहीं क्या जरा हो सकता था इतने कायर तो नहीं थे कि डरें मरने से किंतु मरने का कोई तुक भी तो हो सकता था! रचनाकाल : 27 मार्च 2026

हम जिन्हें मानते हैं असभ्य या सभ्य, हकीकत कहीं उलट तो नहीं !

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 हाल ही में एक रिसर्च सामने आई कि चींटियां आपरेशन और इलाज करना जानती हैं. चोट से संक्रमण न फैले, इसलिए अफ्रीका की कैम्पोनोटस और मैकुलेटम चींटियां अपनी घायल साथियों का पैर काटकर उनकी जान बचाती हैं. जर्मनी की बुर्जबर्ग यूनिवर्सिटी के एरिक फ्रैंक ने अपने शोध में पाया कि मेगापोनेरा एनालिस चींटियां घायल साथियों के घाव पर एक विशेष प्रकार का तरल पदार्थ लगाती हैं, जिससे उनके जीवित रहने की संभावना 30 से बढ़कर 80 प्रतिशत हो जाती है. अध्ययन से पता चला कि चींटियों का यह व्यवहार जन्मजात होता है, जो जटिल मेडिकल सिस्टम जैसा है.  कुत्ते-बिल्लियों को हम कभी-कभी घास खाते देखते हैं और बहुत से लोगों को पता होगा कि वे अपने पाचन तंत्र को दुरुस्त करने के लिए ऐसा करते हैं. अफ्रीकी हाथी गठिया के दर्द को कम करने के लिए एक विशेष पेड़ की छाल चबाते हैं. चींटी और दीमक की कई प्रजातियां संक्रमण फैलने पर संक्रमित साथी को झुंड से अलग कर देती हैं. कई जानवर बीमार पड़ने पर खाना छोड़ देते हैं और तब तक आराम करते हैं जब तक वे स्वस्थ न हो जाएं. हम मनुष्य लेकिन क्यों नहीं जान पाते कि हमारे शरीर के भीतर क्या चल रहा है?...

बड़ी बुराई के आगे छोटी भी अच्छी लगने लगती है!

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शर्माजी एक आम आदमी हैं. पिछले दिनों उनके स्मार्टफोन में व्हाट्‌सएप्प पर वेडिंग कार्ड का एक लिंक आया. चूंकि मैसेज किसी परिचित का था, इसलिए यह जानने की जिज्ञासा में उन्होंने लिंक पर क्लिक किया कि किसकी शादी  है. लेकिन क्लिक करते ही मोबाइल हैक हो गया. दूसरे फोन से उन्होंने तत्काल अपने परिचित से पूछताछ की तो पता चला कि उन्होंने तो ऐसा कोई लिंक भेजा ही नहीं! दरअसल हैकरों ने उक्त परिचित के फोन को ऐसा ही वेडिंग कार्ड भेजकर हैक कर लिया था और उनकी कांटैक्ट लिस्ट में दर्ज सारे नंबरों पर वह वेडिंग कार्ड रूपी मालवेयर भेज दिया था. आनन-फानन में शर्माजी ने अपने स्मार्टफोन को फैक्टरी रिसेट किया और धोखाधड़ी का शिकार होने से बचे.  दूसरी घटना में एक बार किसी ने उनको फोन करके बड़े प्यार से पूछा कि कैसे हो भाई साहब! मुझे पहचाना? उन्होंने जब इंकार किया तो वह कहने लगा कि क्या भाई, मुझे नहीं पहचान रहे! आप कोशिश तो करो. अब शर्माजी हैरान! अटकलें लगाते हुए उन्होंने एक परिचित का नाम लिया तो उस बंदे ने तपाक से कहा कि अरे हां वही तो हूं मैं! दरअसल मेरा यूपीआई काम नहीं कर रहा है, इसलिए अभी आपको कोई साढ़े अठ...

जंगली बनता आदमी

मुझको डर तो दु:खों का नहीं था कभी आपदाओं की खातिर भी तैयार था चाहे जितना भी बन जाए जीवन कठिन सबको स्वेच्छा से सह लेना स्वीकार था किंतु जीना अधम इतना इंसान बन मुझसे हो ही नहीं पा रहा है सहन हो अगर कोई ईश्वर तो है बस यही प्रार्थना या तो सद्‌भाव से हम मनुष्यों को जीने का वरदान दो अन्यथा खत्म दुनिया से हमको करो जंगली जानवर पेट भर जाए तो मारते फिर नहीं आदमी जंगली किंतु बन जाए तो खत्म दुनिया ही ये हो न जाए कहीं! (रचनाकाल : 14 मार्च 2026)

पुल बनने की ख्वाहिश

मैं अक्सर पुल बनने की कोशिश करता हूं कुछ लोग बहुत आगे हो जाते कुछ पीछे रह जाते हैं तो मैं दोनों के बीच, राह पर चलता हूं। यह सच है आगे-पीछे जो भी हैं समूह में अपने-अपने चलते हैं मैं दोनों को जोड़े रखने के चक्कर में निपट अकेला ही अक्सर रह जाता हूं पर मुझे पता है टूट गया संबंध अगर तो दुनिया यह दो हिस्सों में बंट जायेगी दोनों ही एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन जायेंगे मिलकर दोनों कर सकते हैं अद्‌भुत विकास पर अलग-अलग हो लड़-भिड़कर मर जायेंगे इसलिये क्षीण ही सही मगर संबंध बीच दोनों के कायम रखता हूं मैं नहीं तोड़ने में रखता विश्वास जोड़ना मुझको अच्छा लगता है। (रचनाकाल : 26-27 फरवरी 2026)

हम ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ बनकर खुद को धोखा देते रहते हैं !

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बच्चों में स्मार्टफोन की बढ़ती लत देश ही नहीं, पूरी दुनिया में चिंता का विषय है. यह न सिर्फ बच्चों की आंखें कमजोर कर रहा है, मोटापा बढ़ा रहा है और आलसी बना रहा है बल्कि इसके जरिये उपलब्ध सामग्री भी इतनी हानिकारक है कि ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, इंडोनेशिया जैसे देशों ने सोलह साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है और फ्रांस, पुर्तगाल जैसे नौ देश इस पर बैन लगाने की योजना बना रहे हैं. हमारे देश में भी कर्नाटक और आंध्रप्रदेश ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधित कर दिया है तथा गोवा, महाराष्ट्र और बिहार भी ऐसा करने के बारे में सोच रहे हैं. इसके बावजूद मोबाइल के बच्चों पर दुष्प्रभाव की खबरें थमने का नाम नहीं ले रही हैं, जो दर्शाती हैं कि बच्चों के स्क्रीन टाइम में कमी नहीं आ रही है और मैदानी खेल के बजाय वे मोबाइल से ही चिपके रहते हैं. हालत इतनी खराब है कि दुनिया में जितने बच्चे कुपोषित हैं, उससे ज्यादा मोटापे का शिकार हैं. हमारे देश में तो एक रिपोर्ट के अनुसार तीन में से सिर्फ एक बच्चा ही बिना हांफे दौड़ पाता है.  ऐसे समय में पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिले...

असली जीत

जब गाली कोई देता है बदले में चुप रह जाता हूं तब कायर मुझको लोग समझने लगते हैं। पर मुझे पता है गाली मैं भी दे दूंगा तो जीत सामने वाले की हो जायेगी मैं भी उसके जैसा ही कीचड़ में लथपथ हो जाऊंगा इसलिये कभी जब कोई गुस्सा होता है मैं बदले में देकर मीठी मुस्कान आग में पानी डाला करता हूं जो अपने गुस्से की ज्वाला में मुझे जलाने वाला था वह आग बुझाते ही मेरे शर्मिंदा होने लगता है। धुलने लगता जब मैल साफ-सुथरा वह होने लगता है तब मुझको अपनी जीत दिखाई पड़ती है।   (रचनाकाल : 7-8 मार्च 2026)

बहादुरों की अहिंसा के अभाव में तबाह होती दुनिया

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 दुनिया इन दिनों भीषण युद्धों से कराह रही है. रूस-यूक्रेन और इजराइल-फिलिस्तीन के संघर्ष मानो कम थे कि अमेरिका-इजराइल ने ईरान को नेस्तनाबूद करने की ठान ली है. बदले में ईरान भी इजराइल और मिडिल ईस्ट के अमेरिकी ठिकानों पर जबर्दस्त पलटवार कर रहा है, जिससे यूरोपीय देशों के लिए अमेरिका का साथ देना मजबूरी बन गई है. इधर पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच संघर्ष भी तेज हो गया है.  यह सच है कि दुनिया में युद्ध प्राचीन काल से ही होते रहे हैं. इतिहास के पन्ने युद्धों में शूरवीरता दिखाने वाले नायकों के महिमा-मंडन से भरे पड़े हैं. हालांकि अहिंसा का प्रतिपादन करने वाले बुद्ध और महावीर जैसे महामानव भी आज से ढाई हजार साल पहले ही हो चुके हैं, इसलिए यह तो नहीं कहा जा सकता कि मानव जाति को अहिंसा के महत्व की पूरी जानकारी ही नहीं थी, लेकिन अहिंसा के इन पुरोधाओं को भगवान मान कर पूजने के बावजूद हमने उनके सपनों के अहिंसक समाज के निर्माण में कितनी प्रगति की है? लगभग एक सदी पूर्व महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के जरिये व्यावहारिक जीवन में अहिंसा के कार्यान्वयन की कुछ हद तक सफल कोशिश की थी लेकिन वह सत्ता पक्ष के खि...