ढोंगी बाबा से जब नेता मिलें, ‘करेला नीम चढ़ा’ हो जाता है !
पिछले दिनों कथित ज्योतिषी और पाखंडी बाबा अशोक खरात उर्फ कैप्टन के काले कारनामों का भांडा फूटा, तब पता चला कि नेताओं में पैठ बनाकर किस तरह से उसने आम लोगों के बीच अपना मायाजाल फैलाया था. अपने द्वारा लिखवाई एक किताब में उसने दर्ज कराया था कि पेरिस के एक विश्वविद्यालय से ‘काॅस्मोलाॅजी ब्रह्मांड शास्त्री’ की उपाधि हासिल की है और सबने इस पर आंख मूंद कर विश्वास कर लिया! खरात की चुनी हुई टीम उसके संभावित ग्राहकों (अर्थात शिकार) के बारे में उनके रिश्तेदारों और परिचितों से जानकारी जुटाती थी, जिसके बल पर वह पहली मुलाकात में ही लोगों का भरोसा जीत लेता था.
पाखंडी बाबाओं का यह खेल नया नहीं है. अपनी टीम द्वारा संभावित शिकारों को फांसने के लिए उनके बारे में जानकारी जुटाने का तरीका वे बहुत पहले से अपनाते आ रहे हैं. हाल ही में अपनी घरेलू समस्याओं से परेशान एक सज्जन ने एक ऐसे ही बाबा से संपर्क किया, जिनका दावा था कि अपने तंत्र-मंत्र से वे घर की सारी भूत-बाधाएं दूर कर देंगे और बदले में कोई फीस भी नहीं लेंगे, मात्र रहने-खाने के खर्च के रूप में नब्बे हजार रु. स्वीकार करेंगे. लेकिन एक महीने तक तंत्र-मंत्र का विधि-विधान बताने वाले बाबा नब्बे हजार रु. मिलने के बाद जब एक ही सप्ताह में अपना डेरा-डम्बल उठाकर जाने लगे तो गृह मालिक की शंका का समाधान करते हुए बताया कि अगर वे अकेले जाप करते तब महीना भर लगता, चूंकि उनकी शिष्य मंडली साथ में थी, इसलिए महीने भर का तंत्र-मंत्र एक सप्ताह में ही निपटा लिया. मजे की बात यह है कि उस एक सप्ताह में भी वे आधे से ज्यादा समय अपने साइड बिजनेस को देते अर्थात लोगों का हाथ देखकर उनका भविष्य बताया करते थे. ग्राहकों का विश्वास जीतने के लिए उन्होंने खरात माॅडल ही अपनाया था अर्थात ग्राहकों से पहले उनके शिष्यों की टीम सवाल-जवाब कर प्राथमिक जानकारी जुटा लेती और फिर उसी जानकारी को अपनी तंत्र-मंत्र की शक्ति से बताने का ढोंग बाबा करते थे. जैसे शिष्यों ने अगर किसी के दो बच्चे होने की जानकारी दी है तो पंचांग हाथ में लेकर कुछ गणना करने का नाटक करते हुए वे पूछते कि फलां-फलां नक्षत्रों के फलां-फलां राशि में होने के संयोग से उनके भाग्य में दो संतानों का योग है, क्या यह सही है? ऐसे ही दो-चार प्राथमिक प्रश्नों का सही उत्तर पाकर ग्राहक भाव-विभोर हो जाता और जैसे डाॅक्टर मर्ज के हिसाब से मरीजों का इलाज करता है, बाबाजी अपने ग्राहकों की आर्थिक हैसियत के हिसाब से उसके संकटों को दूर करने का उपाय सुझाया करते और इस तरह नए-नए ग्राहक फंसाने का उनका सिलसिला जारी रहता था. लेकिन खरात जैसे बाबाओं से वे इस मामले में श्रेष्ठ थे कि अपने भक्तों का सिर्फ आर्थिक शोषण करते थे, दैहिक नहीं.
दरअसल ढोंगी बाबाओं की जब ढोंगी नेताओं के साथ सेटिंग हो जाती है, तभी शायद ‘करेला नीम चढ़ा’ वाली कहावत चरितार्थ होती है. बड़े-बड़े नेताओं के साथ उठना-बैठना देखकर बाबाओं के प्रति अंधभक्तों की श्रद्धा बढ़ती जाती है और नेताओं को बाबाओं के भक्तों में अपना वोट बैंक नजर आता है! इस तरह पाखंडियों के दो पाटों के बीच आम जनता गेहूं की तरह पिसती रहती है. त्रासदी यह है कि उस जनता के बीच में से जो कुछ चतुर-चालाक लोग निकलते हैं वे भी या तो ढोंगी बाबाओं की जमात में शामिल हो जाते हैं या ढोंगी नेताओं की!
तो क्या आम जनता के भाग्य में हमेशा शोषित बनकर रहना ही लिखा है?
(1 अप्रैल 2026 को प्रकाशित)

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