ये कहां आ गये हम!
जीने की खातिर जाने-अनजाने मुझसे
गलतियां कई हो जाती थीं
अपराधबोध से मन विनम्र हो जाता था
हर जीव-जंतु से क्षमा प्रार्थी रहता था
चर-अचर सभी प्राणी मुझको जो देते थे
एहसानमंद हो उन्हें देवता कहता था
आकस्मिक विपदा अगर कभी आ जाती थी
प्रायश्चित उसको समझ सह लिया करता था।
जाने कब लेकिन मैंने, जो कुछ मिलता है
अधिकार उसे हम इंसानों का मान लिया
जो स्वेच्छा से सब जीव-जंतु दे देते थे
बलपूर्वक उनसे वह सब लेना शुरू किया
मन से कृतज्ञता भाव पुराना विदा हुआ
मैं धीरे-धीरे इतना ज्यादा क्रूर हुआ
चर-अचर सभी को जीत, बंधुओं से ही अपने लड़ता हूं
दुनिया जो स्वर्ग सरीखी थी, अब नर्क बनाया करता हूं!
रचनाकाल : 11-12 अप्रैल 2026
Comments
Post a Comment