जंगली बनता आदमी
मुझको डर तो दु:खों का नहीं था कभी
आपदाओं की खातिर भी तैयार था
चाहे जितना भी बन जाए जीवन कठिन
सबको स्वेच्छा से सह लेना स्वीकार था
किंतु जीना अधम इतना इंसान बन
मुझसे हो ही नहीं पा रहा है सहन
हो अगर कोई ईश्वर तो है बस यही प्रार्थना
या तो सद्भाव से हम मनुष्यों को जीने का वरदान दो
अन्यथा खत्म दुनिया से हमको करो
जंगली जानवर पेट भर जाए तो मारते फिर नहीं
आदमी जंगली किंतु बन जाए तो
खत्म दुनिया ही ये हो न जाए कहीं!
(रचनाकाल : 14 मार्च 2026)
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