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यातना

भोगता है जब कोई गहन पीड़ा कम नहीं होती मुझे देख कर उसे यातना दिल की गहराइयों से करता हूँ प्रार्थना उसकी पीड़ा मुक्ति की. पर बावजूद इस पीड़ा के नहीं होता जब उनका आत्मविस्तार बची रह जाती है संकीर्णता असह्य हो जाती है यातना और नहीं कर पाता ईश्वर से पीड़ामुक्ति की प्रार्थना. बावजूद इसके शामिल होता हूँ उनकी पीड़ा में पूरी शिद्दत से. जानता हूँ कि इस पीड़ा के बाद आयेंगे उनके पास खुशियों के भी क्षण पर नहीं शामिल होऊँगा मैं उनकी खुशी में क्योंकि उपजी होगी वह संकीर्णता से कि नहीं होगी उसमें गंध सर्वजन हिताय और सुखाय की और उनकी खुशियों से पहुँचेगा जिन्हें कष्ट शामिल होना होगा मुझे उनकी भी पीड़ा में. इसी तरह झेलनी होगी अंतहीन यातना जब तक पैदा न हो जाय सब में विश्व बंधुत्व की भावना.

जहर मोहरा

सूली पर तो मैं चढ़ा नहीं फिर भी याद आते हैं ईसामसीह जब तक हमले हुए दुश्मनों के करता रहा मुकाबला कैसे लड़ूँ लेकिन अब दोस्तों ने उठा लिए जब हथियार! नहीं मेरे मित्र मत करो पीठ पर वार तुम्हारे लिए तो खुला है सीना बताया होता एक बार क्या नहीं था मुझ पर विश्वास! नहीं उठा सकता मैं हाथ कि खत्म हो जायेगी दुनिया आओ, गले लग जाओ एक बार कि चूस लूँ तुम्हारा सारा विष भले न बन पाया होऊँ नीलकण्ठ कि मार ही डाले चाहे मुझे यह पर खत्म तो कर जाऊँगा दुनिया से जहर कि जीने लायक तो बन जायेगी दुनिया यह! सच कहूँ मित्र- तुम्हारी दुश्मनी ने बदल दिये हैं दुश्मनी के भी अर्थ अब नहीं लगता कोई अपना या पराया क्या इसी तरह बनते हैं सुकरात, ईसामसीह या महात्मा गांधी! पर डरता हूँ मित्र कि इसी तरह ही तो बनते हैं हिटलर और जिन्ना भी! नहीं उठाना चाहता खतरा खींच लेना चाहता हूँ इसीलिए सारा विष कि भले न बन सके कोई महामानव इस धरती की बेहतरी के लिए मनुष्य बन पाना भी पर्याप्त है. बस दानव न बने कोई कि चढ़ना पड़े किसी को सूली खानी पड़े गोली.

मेरे होने का अर्थ

‘ऐसा तो सोचा न था!’ यही वाक्य दोहराता है मन बार-बार. जबसे उठा हूँ करके घरेलू कलह के- प्रायश्चितस्वरूप उपवास उबर नहीं पाया हूँ शारीरिक कमजोरी से. आफिस में भी मची है छुट्टियों की मारकाट अंतिम महीना है साल का डटे हैं लोग शूरवीर से लैप्स होने पाए एक भी न दिन. कर लिया है अलग खुद को मैंने इस दौड़ से. मन नहीं पर मानता कहता है अन्याय है यह. चाहता हूँ खुद को ये समझाना सारी दुनिया में जब मची हो अंधेरगर्दी खुद पर अन्याय का रोना रोना व्यर्थ है छोड़ कर फलों की चिंता कर सकूँ मजबूत जड़ तभी मेरे होने का अर्थ है.

कवि और कविता की होड़

चाहता हूँ मैं लिख पाना एक अच्छी कविता तैयार हूूँ उसके लिये खून देने को अपना ताकि स्वस्थ रहे वह काम आए लोगों के यही है भावना. हर माँ-बाप की तरह यही है कामना कि रौशन करे वह अपने रचयिता का नाम फैले दिग्-दिगंत तक. पर यह भी तो नहीं चाहता कि रह जाय पीछे उससे मेरी मनुष्यता! चाहता हूँ मैं होड़ लगाना कवि और कविता की मंजूर नहीं पर मुझे किसी का भी हारना. भयावह युद्धों में जैसे हारते हैं दोनों पक्ष चाहता हूँ जीतें दोनों कवि और कविता भी कि एक का भी हारना दूसरे का अपमान है. इसीलिए लिख पाता जब कोई अच्छी कविता करता हूँ प्रयत्न अपनी- मनुष्यता बढ़ाने का और अगले दिन जब फिर बैठता हूँ लिखने चाहता हूँ बढ़ जाय कवि से आगे कविता. इसी तरह बढ़ाता हूँ रोज अपनी कविता कविता भी रोज-रोज मुझको बढ़ाती है कि जिस तरह मुझको है अपनी कविता पर गर्व कविता भी कर सके मुझ पर वैसा ही गर्व इसीलिए एक घण्टे लिखता हूँ कविता बाकी तेईस घण्टे करता प्रयत्न उसे जीने का.

लिखते रहना होगा

रुकने का यह समय नहीं कसनी होगी कमर और भी दृढ़ता से क्या तुम जानते नहीं कि जितना ही घना होता है अंधेरा उतनी ही बढ़ जाती है- दीपक की जिम्मेदारी! ठीक है कि तुम्हारी कल्पना में भी नहीं था कि इस दिशा से हो सकता है हमला गढ़ में घुस आए हैं वे घर के भीतर से कर रहे प्रहार पढ़ने-लिखने को बना दिया है उन्होंने सामाजिक उपहास की वस्तु इसीलिए तुम्हारे बाहर बैठ कर लिखने पर घर वाले महसूस करते हैं शर्म अगर नहीं हैं पत्नी-बच्चे तुम्हारी तरह मजबूत तो यह उनका दोष तो नहीं! कोई बात नहीं   चोरी-छिपे ही सही घर के भीतर घुटन में बैठ कर ही सही लिखते जाना है तुम्हें अनवरत. क्या तुम नहीं जानते कि कितना बड़ा है तुम्हारा अपराध! प्रवाह के विरुद्ध चलने की उसकी दिशा गलत बताने की जितनी भी दें वे सजा कम है. रहना होगा तुम्हें तैयार जेल में बैठकर लिखने को भी. जिस दिन तुम छोड़ दोगे लिखना बंद हो जाएगा तारों का टिमटिमाना अंधेरे को मान लिया जाएगा सार्वभौमिक सत्य नहीं जान पाएगा कोई कि क्या होता है प्रकाश. इसलिए निकलने तक दिन तुम्हें टिमटिमाते रहना होगा लिखते रहना होगा.

शर्मिला इलोम

शर्मिला इलोम प्रणाम करने की इच्छा होती है तुम्हें बहुत कम सिर झुकता है मेरा ऐसा नहीं कि झुकाना नहीं चाहता पर मिलता ही नहीं कोई. अभिभूत हूँ पढ़कर अखबारों में, तुम्हारे बारे में मैंने भी कल एक लेख लिखा पर मन ही नहीं भरा जैसे कोई बिछड़ा स्वजन मिला हो सालों बाद और दिल न चाहे उसे छोड़ना. नौ सालों से कर रही हो आमरण अनशन लिखा है तुमने कि धैर्य नहीं छोड़ा है छोड़ना भी मत क्योंकि फिर करेगा कोई शुरुआत तो नौ साल बाद ही पहुँच पाएगा तुम्हारे पास. अकेली नहीं हो तुम टिकीं हैं तुम पर अनगिनत आशाएँ. मैं जानता हूँ शर्मिला कि ये जो उग्रवादी हैं तुम्हारे ही भाईबंद हैं नहीं है पर उनमें तुम्हारे जैसा आत्मबल भटक गए हैं सरकारी हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा से देने पर तुल गए हैं. मैं यह भी जानता हूँ कि वे हार नहीं मानेंगे जब नहीं टूटे अंग्रेजों के सामने तो अपनों के आगे क्या झुकेंगे! पर तुम तो जानती हो शर्मिला कि हिंसा के खेल में कहाँ जीतता है कोई! इसीलिए तुम पर टिकी हैं हमारी आशाएँ लगता है ऐसा कि मरे नहीं हैं गांधीजी. हो सकता है शर्मिला कि सरकार जान भी ले ले तुम्हारी पर डरना नहीं तुम हम हैं पीछे तुम्हारे लेंगे तुम्ह...

रूप बदला सुख-दु:ख ने

बादल छाये हैं और मौसम मनोहारी है फिर भी धड़क उठता है दिल अज्ञात की आशंका से कुछ भी व्यवस्थित नहीं है इन दिनों खुशी भी बेमौसम आती है रोजमर्रा के संकटों से हो गई है जान-पहचान भयभीत नहीं करते वे सुख को देख लेकिन- छाती धड़क जाती है चोला तो नहीं बदल लिया दु:ख ने! सभी बदल रहे हैं रूप दवाइयों से लड़कर बदल रहीं बीमारियाँ मच्छरों ने विकसित कर ली है प्रतिरोधक शक्ति गाँव बदल कर बन रहे शहर और मनुष्य बन रहे मशीन दु:खों को भी बना लिया है हमने सुख राहत देता है प्रदूषण. चलती है जब कभी ताजी हवा छाते हैं बादल असहज हो जाता है मन. सिखाया गया है हमें बारिश में भीगना बेवकूफी है और जंगल में घूमना जंगलीपन एसी का आदी हमारा शरीर बर्दाश्त नहीं कर पाता प्रकृति का उल्लास.