मेरे होने का अर्थ

‘ऐसा तो सोचा न था!’
यही वाक्य दोहराता है
मन बार-बार.
जबसे उठा हूँ करके
घरेलू कलह के-
प्रायश्चितस्वरूप उपवास
उबर नहीं पाया हूँ
शारीरिक कमजोरी से.
आफिस में भी मची है
छुट्टियों की मारकाट
अंतिम महीना है साल का
डटे हैं लोग शूरवीर से
लैप्स होने पाए एक भी न दिन.
कर लिया है अलग खुद को
मैंने इस दौड़ से.
मन नहीं पर मानता
कहता है अन्याय है यह.
चाहता हूँ खुद को ये समझाना
सारी दुनिया में जब
मची हो अंधेरगर्दी
खुद पर अन्याय का
रोना रोना व्यर्थ है
छोड़ कर फलों की चिंता
कर सकूँ मजबूत जड़
तभी मेरे होने का अर्थ है.

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