यातना

भोगता है जब कोई गहन पीड़ा
कम नहीं होती मुझे
देख कर उसे यातना
दिल की गहराइयों से
करता हूँ प्रार्थना
उसकी पीड़ा मुक्ति की.
पर बावजूद इस पीड़ा के
नहीं होता जब उनका आत्मविस्तार
बची रह जाती है संकीर्णता
असह्य हो जाती है यातना
और नहीं कर पाता ईश्वर से
पीड़ामुक्ति की प्रार्थना.
बावजूद इसके
शामिल होता हूँ उनकी पीड़ा में
पूरी शिद्दत से.
जानता हूँ कि इस पीड़ा के बाद
आयेंगे उनके पास
खुशियों के भी क्षण
पर नहीं शामिल होऊँगा मैं
उनकी खुशी में
क्योंकि उपजी होगी वह संकीर्णता से
कि नहीं होगी उसमें गंध
सर्वजन हिताय और सुखाय की
और उनकी खुशियों से
पहुँचेगा जिन्हें कष्ट
शामिल होना होगा मुझे
उनकी भी पीड़ा में.
इसी तरह झेलनी होगी
अंतहीन यातना
जब तक पैदा न हो जाय सब में
विश्व बंधुत्व की भावना.

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