जहर मोहरा

सूली पर तो मैं चढ़ा नहीं
फिर भी याद आते हैं ईसामसीह
जब तक हमले हुए दुश्मनों के
करता रहा मुकाबला
कैसे लड़ूँ लेकिन अब
दोस्तों ने उठा लिए जब हथियार!
नहीं मेरे मित्र
मत करो पीठ पर वार
तुम्हारे लिए तो खुला है सीना
बताया होता एक बार
क्या नहीं था मुझ पर विश्वास!
नहीं उठा सकता मैं हाथ
कि खत्म हो जायेगी दुनिया
आओ, गले लग जाओ एक बार
कि चूस लूँ तुम्हारा सारा विष
भले न बन पाया होऊँ नीलकण्ठ
कि मार ही डाले चाहे मुझे यह
पर खत्म तो कर जाऊँगा दुनिया से जहर
कि जीने लायक तो बन जायेगी दुनिया यह!
सच कहूँ मित्र-
तुम्हारी दुश्मनी ने बदल दिये हैं
दुश्मनी के भी अर्थ
अब नहीं लगता कोई अपना या पराया
क्या इसी तरह बनते हैं
सुकरात, ईसामसीह या महात्मा गांधी!
पर डरता हूँ मित्र
कि इसी तरह ही तो बनते हैं
हिटलर और जिन्ना भी!
नहीं उठाना चाहता खतरा
खींच लेना चाहता हूँ
इसीलिए सारा विष
कि भले न बन सके कोई महामानव
इस धरती की बेहतरी के लिए
मनुष्य बन पाना भी पर्याप्त है.
बस दानव न बने कोई
कि चढ़ना पड़े किसी को सूली
खानी पड़े गोली.

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