रूप बदला सुख-दु:ख ने
बादल छाये हैं और मौसम मनोहारी है
फिर भी धड़क उठता है दिल
अज्ञात की आशंका से
कुछ भी व्यवस्थित नहीं है इन दिनों
खुशी भी बेमौसम आती है
रोजमर्रा के संकटों से
हो गई है जान-पहचान
भयभीत नहीं करते वे
सुख को देख लेकिन-
छाती धड़क जाती है
चोला तो नहीं बदल लिया दु:ख ने!
सभी बदल रहे हैं रूप
दवाइयों से लड़कर
बदल रहीं बीमारियाँ
मच्छरों ने विकसित कर ली है
प्रतिरोधक शक्ति
गाँव बदल कर बन रहे शहर
और मनुष्य बन रहे मशीन
दु:खों को भी बना लिया है हमने सुख
राहत देता है प्रदूषण.
चलती है जब कभी ताजी हवा
छाते हैं बादल
असहज हो जाता है मन.
सिखाया गया है हमें
बारिश में भीगना बेवकूफी है
और जंगल में घूमना जंगलीपन
एसी का आदी हमारा शरीर
बर्दाश्त नहीं कर पाता
प्रकृति का उल्लास.
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