कवि और कविता की होड़

चाहता हूँ मैं लिख पाना
एक अच्छी कविता
तैयार हूूँ उसके लिये
खून देने को अपना
ताकि स्वस्थ रहे वह
काम आए लोगों के
यही है भावना.
हर माँ-बाप की तरह
यही है कामना
कि रौशन करे वह
अपने रचयिता का नाम
फैले दिग्-दिगंत तक.
पर यह भी तो नहीं चाहता
कि रह जाय पीछे उससे
मेरी मनुष्यता!
चाहता हूँ मैं होड़ लगाना
कवि और कविता की
मंजूर नहीं पर मुझे
किसी का भी हारना.
भयावह युद्धों में जैसे
हारते हैं दोनों पक्ष
चाहता हूँ जीतें दोनों
कवि और कविता भी
कि एक का भी हारना
दूसरे का अपमान है.
इसीलिए लिख पाता जब
कोई अच्छी कविता
करता हूँ प्रयत्न अपनी-
मनुष्यता बढ़ाने का
और अगले दिन जब फिर
बैठता हूँ लिखने
चाहता हूँ बढ़ जाय
कवि से आगे कविता.
इसी तरह बढ़ाता हूँ
रोज अपनी कविता
कविता भी रोज-रोज
मुझको बढ़ाती है
कि जिस तरह मुझको है
अपनी कविता पर गर्व
कविता भी कर सके
मुझ पर वैसा ही गर्व
इसीलिए एक घण्टे
लिखता हूँ कविता
बाकी तेईस घण्टे
करता प्रयत्न उसे जीने का.

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