शर्मिला इलोम

शर्मिला इलोम
प्रणाम करने की इच्छा होती है तुम्हें
बहुत कम सिर झुकता है मेरा
ऐसा नहीं कि झुकाना नहीं चाहता
पर मिलता ही नहीं कोई.
अभिभूत हूँ पढ़कर
अखबारों में, तुम्हारे बारे में
मैंने भी कल एक लेख लिखा
पर मन ही नहीं भरा
जैसे कोई बिछड़ा स्वजन
मिला हो सालों बाद
और दिल न चाहे उसे छोड़ना.

नौ सालों से कर रही हो
आमरण अनशन
लिखा है तुमने कि धैर्य नहीं छोड़ा है
छोड़ना भी मत
क्योंकि फिर करेगा कोई शुरुआत
तो नौ साल बाद ही
पहुँच पाएगा तुम्हारे पास.
अकेली नहीं हो तुम
टिकीं हैं तुम पर
अनगिनत आशाएँ.

मैं जानता हूँ शर्मिला
कि ये जो उग्रवादी हैं
तुम्हारे ही भाईबंद हैं
नहीं है पर उनमें
तुम्हारे जैसा आत्मबल
भटक गए हैं
सरकारी हिंसा का जवाब
प्रतिहिंसा से देने पर तुल गए हैं.
मैं यह भी जानता हूँ
कि वे हार नहीं मानेंगे
जब नहीं टूटे अंग्रेजों के सामने
तो अपनों के आगे क्या झुकेंगे!
पर तुम तो जानती हो शर्मिला
कि हिंसा के खेल में
कहाँ जीतता है कोई!
इसीलिए तुम पर
टिकी हैं हमारी आशाएँ
लगता है ऐसा
कि मरे नहीं हैं गांधीजी.
हो सकता है शर्मिला
कि सरकार जान भी ले ले तुम्हारी
पर डरना नहीं तुम
हम हैं पीछे तुम्हारे
लेंगे तुम्हारी जगह
बुझने नहीं देंगे शांति की लौ.

एक बात कहूँ शर्मिला!
जानती तो तुम होंगी ही
पर सोचता हूँ कहना मेरा फर्ज है
जिस रास्ते पर तुम चल रही हो न
वह दोधारी तलवार है
अभी तो तुम लड़ रही हो सरकार से
और हासिल है तुम्हें
अपने हथियारबंद भाई-बंधुओं का समर्थन
पर एक दिन जब झुक जाएगी सरकार
लड़ना होगा तुम्हें इनसे भी
क्योंकि हिंसा का कोई धर्म नहीं होता
उस दिन तुम झुक मत जाना
खोना पड़े चाहे अपनों का भी समर्थन.
उसी दिन होगी तुम्हारी
असली अग्निपरीक्षा
क्योंकि सबसे कठिन होता है
अपनों से लड़ना.

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