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Showing posts from July, 2024

अंतरात्मा

कठिन तो न था कोई  होकर शैतान भी दुनिया की नजरों में बने रहना साधु-संत अपनी ही नजरों से पर बच नहीं सकता था इसीलिये बना अच्छा आदमी करता परवाह नहीं लोगों की निंदा या प्रशंसा की कोशिश बस करता हूं अपनी ही नजरों में रह सकूं ईमानदार भीतर अगर न्यायाधीश बैठा नहीं होता तो दुनिया में जीना बन पाखण्डी बेहद आसान था। रचनाकाल : 27 जुलाई 2024

गलतफहमी

होता यूं भी कई बार गलतफहमी के कारण दूर चले जाते मुझसे कुछ लोग उन्हें करता कोशिश समझाने की महसूस मगर यह होता है मन में हो यदि पूर्वाग्रह तो जो कहते हैं हम उसका उल्टा अर्थ लगाते लोग समझना वही चाहते हैं जो मन में पहले से ही उनके स्थापित होता है। इसलिये सफाई देना अपनी छोड़ दिया कोशिश करता ईमानदार अपने प्रति हरदम रहूं देखकर कर्मों को ही मेरे बदल सकी यदि तो बदलेगी मन में बसी धारणा लोगों की शब्दों में तो बेहद कम क्षमता होती है दिखता उनके पीछे बल जो वह कर्मों का ही होता है। रचनाकाल : 25 जुलाई 2024

वरदान को अभिशाप बनाते हम इंसान और आडम्बर में जीता समाज

  बारिश इस साल फिर देश के अधिकांश हिस्सों में जल-थल एक कर रही है. ज्यादा दिन नहीं बीते जब लू झुलसा रही थी और हम ईश्वर से बारिश की प्रार्थना कर रहे थे. ईश्वर तो दयालु है, भरपूर देता है लेकिन हमारा दामन ही शायद इतना छोटा है कि उसमें कोई चीज ज्यादा समा नहीं पाती और ईश्वर के सारे वरदान हमारे लिए अभिशाप बन कर रह जाते हैं! अब जैसे बादल हमें इतना पानी दे रहे हैं लेकिन सब जानते हैं कि बारिश बीतते न बीतते जलकिल्लत फिर शुरू हो जाएगी और गर्मी आने के पहले तो त्राहि-त्राहि मच जाएगी. यह हाल सिर्फ हमारे देश का ही नहीं, शायद सारी दुनिया का है. इसीलिए चीन ने स्पंज शहरों का विकास शुरू किया है, जहां ऐसी छिद्रदार संरचनाएं बनाई जाती हैं, जिनसे अतिरिक्त पानी जमीन के भीतर जा सके. यूनाइटेड किंगडम में भी बारिश के पानी को संभालने के लिए सस्टेनेबल अर्बन ड्रेनेज सिस्टम अपनाया गया है, जिसके अंतर्गत बारिश का पानी सीधे नालों में न जाकर जमीन में सोख लिया जाता है. यही काम हमारे देश में पहले पेड़ किया करते थे. उनकी जड़ें बारिश के पानी को जमीन में जमा कर लेती थीं और भूजलस्तर इतना ऊपर बना रहता था कि अकाल के समय ...

नकारात्मक से सकारात्मक

रखता था जब तक सोच नकारात्मक अपनी हर चीज मुझे दु:ख देती थी हरदम चिंतातुर रहता था सुख आता तो भय लगता था अब दु:ख भी आगे आयेगा कितना भी कोई गुणी व्यक्ति हो सबके भीतर का दुर्गुण मैं खोज निकाला करता था। जब देखा लेकिन आईना तब पता चला मन-दर्पण मेरा धुंधला था जो दाग लगे थे उसमें उससे दागदार सब चीज दिखाई पड़ती थी अब जितना ज्यादा रगड़-रगड़ कर मन को करता साफ स्वच्छ उतना सबका प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है कितना भी कोई बुरा व्यक्ति कहलाता हो गुण उसके भीतर खोज निकाला करता हूं दु:ख आते ही हर्षित होता अब सुख भी आगे आयेगा। जब तक रखता था सोच निराशावादी खुद भी रहता हरदम दु:खी दूसरों को भी दु:ख पहुंचाता था जब से दामन पकड़ा है लेकिन आशा का उम्मीद मुझे हर जगह दिखाई पड़ती है खुद भी प्रसन्न रहता हूं औरों को भी मेरी संगत में सुख मिलता है। रचनाकाल : 17-18 जुलाई 2024

सत्ता का लालच या समाजसेवा की छटपटाहट !

 बचपन में अक्सर हमें लगता था कि लोग हमें बच्चा क्यों समझते हैं, बड़े ऐसा कौन सा तीर मार लेते हैं जो हम बच्चे नहीं मार सकते! महसूस ही नहीं होता था कि हम बच्चे हैं. किशोरावस्था में तो खास तौर पर बड़े जब हमें कमतर समझते तो कोफ्त होती थी. छुटपन में लगता था कि नवयुवक सिर्फ 18-20 या 22 साल की उम्र के लोग ही होते होंगे, उसके बाद युवक बन जाते होंगे. लेकिन 25-30 साल की उम्र तक हम खुद को नौजवान ही समझते रहे और जवान तो अभी 50 की उम्र में भी महसूस करते हैं, कोई अंकल बोल दे तो बुरा लगता है. दाढ़ी और सिर के बाल सफेद होने का तो ऐसा है कि आजकल तो प्रदूषण के चलते छोटे-छोटे बच्चों के भी बाल पकने लगे हैं. अब हैरानी होती है कि पचास की उम्र के लोगों को हम प्रौढ़ कैसे कह देते थे, और मात्र साठ साल की उम्र में कोई कैसे ‘सठिया’ सकता है? अधिक से अधिक वह युवावस्था के ढलने की उम्र होती होगी. दरअसल भुक्तभोगी हुए बिना चीजें समझ में नहीं आतीं, लोग तो कुछ भी कह देते हैं.  कुछ ऐसा ही शायद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन भी महसूस कर रहे होंगे, जब लोगों को कहते सुनते होंगे कि वे बुढ़ा गए हैं और भूलने की उम्रगत बीम...

कोमल और कठोर

कभी-कभी जब मन व्याकुल हो जाता है पत्थरदिल जैसे लोगों से सिर फोड़ बहुत थक जाता हूं तब लगता है मृदुता की मेरी हार अवश्यम्भावी है कितनी भी कर लूं कोशिश जीतेगी कठोरता ही हरदम हो जाता हूं बेहद हताश तब शक्तिहीन हो जाता हूं। होता हूं पर जब सुस्थिर तब यह लगता है पानी ने यदि सोचा होता कब तक पत्थर से आखिर सिर टकराऊंगा तब रेत बना पाता क्या वह चट्टानों को? बेशक कितना भी समय लगे पर जीत अंत में कोमलता की होती है जड़ के आगे यदि जीव हार मानेगा तो वह भी जड़ पत्थर जैसा ही बन जायेगा। रचनाकाल : 12 जुलाई 2024

बचपन

बचपन में हमको जब किस्से सुनाते थे बड़े-बूढ़े बचपन के सुनते हम बच्चे तल्लीन हो हो गये जब बड़े हम अपने भी बचपन की यादें हमें करने लगीं मंत्रमुग्ध। सबके ही साथ शायद ऐसा ही होता है बीतता है समय जब तो यादें सुनहरी होती जाती हैं  लगता है लौट आते काश, वे दिन बचपन के! लेकिन नागासाकी, हिरोशिमा में बच गये थे बच्चे जो कैसी रही होंगी उनकी यादें अपने बचपन की ! हिटलर के कान्सन्ट्रेशन कैम्प से निकले थे बच्चे-बड़े जिंदा जो क्यों वे चीख पड़ते थे रातों? समझ नहीं पाते हैं बच्चे जो अपने साथ होने वाली बड़ों की हैवानियत कैसे कर पायेंगे याद अपने बचपन को! बड़े होकर क्या बनेंगे बच्चे गाजापट्टी, यूक्रेन के? खोने जब लगता हूं बचपन की अपनी मधुर यादों में सहसा ही मुझे ऐसे बच्चे याद आते हैं उठता सैलाब मन में पीड़ा का दिखता है कोई ऐसा बच्चा तो करता हूं कोशिश उसके जीवन में रंग मधुर भरने की। बचपन की यादों का बनना डरावना जीवन में सबसे ज्यादा खतरनाक होता है। रचनाकाल : 9 जुलाई 2024

दीर्घायु होने की लालसा और बीमारियों से सड़ता शरीर

 प्राचीनकाल में एक राजा हुए थे, ययाति; जिन्होंने भोग-विलास की अपनी अतृप्त इच्छाओं को पूरा करने के लिए अपने बेटे से उसकी जवानी मांग ली थी. खबर है कि अमेरिका के 47 वर्षीय अरबपति ब्रायन जॉनसन ने 18 साल के युवा की तरह दिखने के लिए अपने 18 वर्षीय बेटे का प्लाज्मा अपने शरीर में इंजेक्ट करवाया है. बहुत समय पहले एक खबर आई थी कि एक शख्स ने अपने बायसेप्स बनाने के लिए उसमें जेल इंजेक्ट करवा लिया था, जिससे नसें फट गईं और उसकी जान पर बन आई थी. जॉनसन इतने अनाड़ी नहीं हैं और उनके पास दिमाग चाहे जितना हो, पैसा भरपूर है. तीस डॉक्टरों की टीम उन पर लगातार नजर रखती है. इसके बावजूद उनके कारनामे को भी डॉक्टरों ने जोखिम भरा बताया है.  भारत में ययाति जैसे राजा अपवाद ही रहे हैं. प्राय: सारे भारतीय अपनी संतानों में ही अपने जीवन की निरंतरता को देखते हैं. पश्चिमी देशों की एकल और भारत की संयुक्त परिवार की परंपरा का यह भी एक कारण रहा है. हालांकि अब ग्लोबलाइजेशन ने सबकुछ गड्ड-मड्ड कर दिया है और ययाति दुनिया में अकेला नहीं है, बल्कि कहना चाहिए कि उसकी अतृप्त इच्छाएं आज प्राय: सारी दुनिया की अतृप्त इच्छाएं है...

असली-नकली

निपट दुनियादारी में जब तक अनाड़ी था ठगा गया कई बार लेकिन फिर सीख गया कोशिश अब जैसे ही करता कोई ठगने की तुरत भांप लेता हूं कोई भी जरूरतमंद करता जब याचना सीधे टरका देता हूं। सोचता पर कभी-कभी जिसको ठग समझा था सचमुच ही कहीं तो नहीं वह जरूरतमंद था! लेकिन ठगहारों ने बनकर बहरूपिया छोड़ा ही उपाय नहीं कोई भी भेद असली-नकली में करने का नकली के कर्मों का असली भुगतता है खामियाजा। इसीलिये होने के बाद भी निपुण दुनियादारी में जोखिम उठाकर भी खुद के ठगे जाने का करना विश्वास नहीं छोड़ता असली के साथ ताकि होने न पाये ज्यादा अन्याय  दुनिया में बची रहे थोड़ी सी मनुष्यता। रचनाकाल : 6 जुलाई 2024

उल्टी रीत

जब देखा मुझे सुखी लोगों ने मुझसे पूछा सुख पाने का राजमार्ग मैंने जब दु:ख की ओर इशारा किया उन्होंने अपमानित महसूस किया यह सोच, उड़ाया है मजाक मैंने उनका। दरअसल सत्य जब से मैंने यह जाना है सिक्के के दो पहलू जैसे ही सुख-दु:ख हैं  दु:ख सहता हूं, सुख मिलता है कोशिश करता लोगों को भी समझाने की सम्मान चाहते हो पाना तो स्वेच्छा से अपमान सभी सह लिया करो यदि है पसंद स्वच्छता गंदगी जहां दिखे, वह साफ करो जो चीज चाहते हो पाना यदि औरों को वह दोगे तो तुमको वह खुद मिल जायेगी पर भागोगे उसके पीछे  तो दूर चली वह जायेगी। परछाईं के जो पीछे भागा करते हैं  कहता उनसे वे भागें उससे दूर चली वह पीछे-पीछे आयेगी वे समझ नहीं पाते लेकिन सुख के पीछे जितना ही भागा करते हैं  दु:ख उनके पीछे-पीछे भागा करता है। रचनाकाल : 30 जून 2024

दुनिया को दुश्मनी नहीं, भाईचारे के पैगाम की जरूरत

 उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच इन दिनों दिलचस्प बैलून युद्ध छिड़ा हुआ है. उत्तर कोरिया गुब्बारों में गोबर, सिगरेट के टुकड़े, फालतू कागज सहित अन्य कचरा भरकर दक्षिण कोरिया भेज रहा है तो दक्षिण कोरिया पर्चे, यूएसबी स्टिक, लाउड स्पीकर आदि भेज रहा है, जिन्हें उत्तर कोरिया की सरकार राजनीतिक कूड़ा कहती है. ध्यान रहे कि उत्तर और दक्षिण कोरिया कभी एक ही देश थे, जो कई दशक पहले टूट कर दो बने, जैसे दुनिया के कई अन्य देश बने हैं.  कहते हैं अगर मिल-जुलकर रहें तो भाई से बढ़कर कोई दोस्त नहीं होता और दुश्मनी पर उतर आएं तो भाई से बढ़कर कोई दुश्मन भी नहीं होता! उत्तर और दक्षिण कोरिया भी ऐसे ही दुश्मन हैं, जो कभी भाई-भाई थे. दुश्मनी भी ऐसी कि परमाणु हथियार बनाने की होड़ में उत्तर कोरिया कंगाल ही हो गया! गनीमत है कि परमाणु हथियारों की धमकी से मामला अब नीचे उतर कर कचरे भेजने तक आ गया है. यह भी कम राहत की बात नहीं है कि दोनों देशों द्वारा भेजे गए गुब्बारों में अभी तक कोई खतरनाक पदार्थ नहीं मिला है. कहते हैं अपना खून आखिर अपना ही होता है. तो क्या दोनों देशों के निवासियों में अभी भी अपनत्व की भावना कह...