वरदान को अभिशाप बनाते हम इंसान और आडम्बर में जीता समाज
हमारे देश को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों को हम कितना भी कोसें लेकिन राजमार्गों के दोनों किनारों पर उन्होंने जो पेड़ लगाए थे, वे कई जगह आज भी राहगीरों को छाया व फल और पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान दे रहे हैं. आज हम राजमार्गों के किनारे फलदार पेड़ों के बजाय फूलदार पौधे लगाते हैं जो सुंदरता तो जितनी भी बिखेरते हों, रख-रखाव के नाम पर राजकोष को चूना जरूर लगाते हैं. कहते हैं एक बार अकाल के दौरान गांधीजी ने अमीरों को सुझाव दिया था कि वे अपनी बगिया में गुलाब की जगह फूल गोभी लगाएं! अब जहां तक सौंदर्य की बात है, वह तो देखने का अपना-अपना नजरिया है, लेकिन उस समय भी गांधीजी का विरोध करने वाले सौंदर्यप्रेमी कम नहीं थे और आज तो उपयोगितावादियों की आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह भी सुनाई नहीं देती! यह ठीक है कि अमीरों की आंखों को गुलाब का फूल सुकून देता है लेकिन गरीबों का पेट तो गोभी का फूल ही भरता है!
हकीकत लेकिन यह है कि गरीबों के देश में भी उपयोगिता की बात करने वालों को हिकारत की नजर से ही देखा जाता है. हम साइकिल की उपयोगिताओं का कितना भी महिमामंडन करें लेकिन साइकिल से चलने वालों को न सम्मान की नजर से देखते हैं, न रोड में उनके सुरक्षित चलने की व्यवस्था करते हैं. प्लास्टिक से पर्यावरण प्रदूषित होने का रोना खूब रोते हैं लेकिन बाजार में यूज एंड थ्रो पेन की ऐसी बाढ़ लाते हैं कि रिफिल वाले पेन ढूंढ़े नहीं मिलते, स्याही वाले पेन तो दूर की बात है. प्लास्टिक के चम्मच-कड़छुल तक का उपयोग करते हैं और फिर हैरानी जताते हैं कि कैंसर इतनी तेजी से कैसे बढ़ रहा है!
(25 जुलाई 2024 को प्रकाशित)

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