सबकुछ बदल गया!
त्यौहार नहीं दीवाली का दो-चार दिनों का होता था
शुरुआत महीनों पहले ही तैयारी की हो जाती थी
होती थी साफ-सफाई भीतर-बाहर की
जो भी आनी हो चीज नई, इस अवसर पर ही आती थी।
पकवान तीज-त्यौहारों पर ही बनते थे
टिकली वाली बंदूक मिले, दुनिया सारी मिल जाती थी
जब सांझ ढले अंधियारा गहराने लगता
नन्हें दीपों की जगमग से तन-मन रौशन हो जाता था।
अब चकाचौंध इतनी है, रातें भी दिन जैसी लगती हैं
कुछ कमी नहीं है खाने और पहनने की
जब मन चाहे तब चीज नई आ जाती है
पर जाने क्यों बाजारू चीजों से अब डर सा लगता है।
ध्वनिवर्धक यंत्रों के कोलाहल से होता सिरदर्द
रौशनी चकाचौंध वाली आंखों को चुभती है
डर धुआंधार आतिशबाजी से लगता है
मैं बदल गया या बचपन वाली दीवाली ही बदल गई!
(रचनाकाल : 26-27 अक्टूबर 2026)
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