जब दु:ख भी सुख बन जाता है...

जब कच्चा था, कमियां थीं मुझमें बहुत
मारता था तब कोई पत्थर तो
पीड़ा होती इतनी असह्य
मैं सहन नहीं कर पाता था।

पीड़ा तो अब भी होती है
पर वह भी सुमधुर लगती है
होने पर भी निर्दोष, सजा जो पाता है
सुख नहीं दूसरा कोई वैसा पाता है।

दु:ख लेकिन अब यह बात सोच कर होता है
निर्दोषों को जो पत्थर मारा करते हैं
अहसास कभी जब होगा अपनी गलती का
कैसे वे खुद को माफ कभी कर पायेंगे!


रचनाकाल : 20 अक्टूबर 2026


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