साध्य को साधन से अलग समझने की नासमझी ही है समस्याओं की जड़
अब लोग 2-3 घंटे की फिल्में देखने के बजाय यूट्यूब शाॅर्ट्स, इंस्टाग्राम रील्स और टिकटाॅक जैसे 15 से 60 सेकंड के वीडियो देखना पसंद करते हैं. पूरा समाचार या विश्लेषणात्मक लेख पढ़ने के बजाय सिर्फ सुर्खियां (हेडलाइंस) या शॉर्ट-न्यूज ऐप्स पर 60 शब्दों का सारांश पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं. पारंपरिक तरीके से खाना पकाने में समय देने के बजाय 2-मिनट नूडल्स, रेडी-टू-ईट भोजन और 10-20 मिनट में डिलीवरी करने वाले क्विक-कॉमर्स ऐप्स की मांग चरम पर है. फोन पर लोग अब लंबी बात करने के बजाय छोटे टेक्स्ट मैसेज, वॉयस नोट्स या सिर्फ इमोजी भेजकर बात खत्म करना चाहते हैं. परिश्रम के बल पर पैसे कमाने के बजाय रातोंरात अमीर बनना चाहते हैं. साहित्य के क्षेत्र में उपन्यास या लंबी कहानियां तो दूर, कविताएं या लघुकथाएं तक पढ़ पाने का सब्र साहित्य प्रेमियों में खत्म होता जा रहा है. ऐसा नहीं है कि रचनाओं की रोचकता खत्म हो गई है बल्कि सोशल मीडिया रील्स देखने की आदत ने लोगों के लिए ज्यादा देर तक किसी चीज पर ठहरना ही कठिन बना दिया है. स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन हमारे दिमाग को बार-बार विचलित करते हैं. वे दिन हवा हुए, जब मास्टरजी स्कूल में क्लास के सारे बच्चों को एक लाइन में खड़ा करके पहाड़े रटवाते थे या कोई अन्य चीज. एआई ने आज कुछ भी रटने को इतना बोझिल बना दिया है कि बहुत से लोगों को दूसरों का तो दूर, अपना मोबाइल नंबर तक याद नहीं रहता!
हर चीज आज राॅकेट की रफ्तार से भाग रही है. पुराने जमाने में जब यातायात के साधन सुलभ नहीं थे और मार्ग दुर्गम, तब लोगों को पैदल या बैलगाड़ी से अपने गंतव्य तक पहुंचने में कई-कई दिन या महीने लग जाते थे. टेलीफोन जब सहज-सुलभ नहीं थे तो परदेस में रहने वालों को अपने घरवालों का हालचाल चिट्ठी-पत्री के माध्यम से महीने-पंद्रह दिन बाद मिलता. लेकिन धीमी गति की वह यात्रा आज की तेज रफ्तार के मुकाबले कहीं ज्यादा सुखद लगती थी. देर से मिलने वाली चिट्ठी से तब इतनी खुशी मिलती थी मानो वह ताजा समाचार हो.
आज पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की कीमत पर निर्मित दैत्याकार मशीनें हमारा बहुत सारा समय और श्रम तो बचा रही हैं लेकिन ऐसा लगता है कि हमें समझ में ही नहीं आ रहा है उस बचे समय का सदुपयोग कैसे करें! एआई ने जीवन को आज इतना आरामदेह बना दिया है कि अब हमें हाथ-पैर हिलाने की भी जरूरत नहीं, रोबोट हमारे सारे काम करके दे सकता है. लेकिन सुख-सुविधाओं के शिखर पर पहुंच जाने के बावजूद हमें चैन क्यों नहीं मिल पा रहा? मेहनत और संघर्ष भरे पुराने दिन सुनहरे क्यों नजर आने लगे हैं?
शायद इसलिए क्योंकि हम साधन और साध्य के बीच के अंतर्संबंध को भूल चुके हैं. हमने साध्य को ही सबकुछ समझ लिया और मान लिया कि उसे चाहे जैसे भी साधन से हासिल किया जा सकता है. और इस चक्कर में हम शाॅर्टकट ढूंढ़
ने लगे तो अब मंजिल पर पहुंचने के बाद पता चल रहा है कि यह तो वह जगह ही नहीं जिसकी हमने कल्पना की थी!
हमें यह समझना होगा कि जितना साध्य का महत्व है, उतना ही साधन का भी; कि धन किसी भी तरीके से कमा लेना पर्याप्त नहीं है, उसका सदुपयोग तो मेहनत से कमाने पर ही हो सकता है. शायद इसीलिए हमें अब पुराने दिनों की यादें सुनहरी लगने लगी हैं.
प्रकृति का यह नियम है कि जिस चीज का भी इस्तेमाल कम होने लगता है, धीरे-धीरे वह खत्म होने लगती है. हम मनुष्यों का शरीर इसीलिए इतना नाजुक हो गया है क्योंकि दिमागी श्रेष्ठता के बल पर हमने अपनी सुख-सुविधा के इतने साधन जुटा लिए हैं कि मनुष्येतर जीवों की तरह हमें प्राकृतिक विषमताओं का सामना नहीं करना पड़ता.
तो क्या अब सोचने-समझने का काम एआई के हवाले कर देने से हमारा दिमाग भी धीरे-धीरे हमारे शरीर की तरह ही कमजोर होना शुरू हो जाएगा?
अमेरिका के सबसे बड़े शहर न्यूयाॅर्क के स्कूलों में बच्चों के एआई का इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है क्योंकि अब पता चला है कि एआई के जरिये रेडीमेड उत्तर पा जाने के कारण बच्चों का दिमाग धीरे-धीरे कुंद होता जा रहा है.
प्राकृतिक आपदाएं शायद हम मानवों को चेतावनी देने के लिए आ रही हैं कि अगर अपनी प्रजाति के अस्तित्व को कायम रखना है तो हम विषमताओं से जूझ कर अपने शरीर को मजबूत बनाना शुरू कर दें. इसी तरह एआई का खौफ हमें चेता रहा है कि अपने दिमाग का काम मशीनों के हाथों में सौंप देना हम मनुष्यों के मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं है.
क्या हम इन चेतावनियों को समझ कर खुद को बदलना शुरू करेंगे? अगर हम ऐसा कर पाए, तभी शायद सर्वाइव कर पाएंगे, वरना कुछ सेकंड में ही ध्यान भटका देने वाली रील्स की लत और शाॅर्टकट ढूंढ़ने की आदत हमें ले डूबेगी.

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