सात्विक क्रोध

देता नहीं पलट कर जवाब मैं
तो इसका मतलब यह नहीं
कि मेरे पास उत्तर है ही नहीं
वरन उसमें ताप इतना ज्यादा है
कि निकाल कर बाहर उसे
चाहता झुलसाना नहीं किसी को।
होती महसूस तो है लोगों को
बाहर उसकी आंच, पर
उसको नहीं रोक पाता
बाहर से खुश दिखने का
अभिनय नहीं कर पाता
लोग समझ जाते हैं कि गुस्सा हूं।
बस में ही है नहीं मेरे यह
कि थप्पड़ के बदले में फूल दूं
लेकिन अपने क्रोध को
चाहता हूं इतनी ज्यादा गरिमा दूं
कि शब्दों से ज्यादा चुप्पी करे असर
गुस्से में भी न गिरे मेरा स्तर।
 

रचनाकाल : 24 सितंबर 2026

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