मनुष्येतर जीवों पर तो हमने पा लिया काबू, लेकिन खुद हो चुके हैं बेकाबू !


 अभी कुछ दिन पहले ही क्लाॅड चैटबाॅट बनाने वाली कंपनी एंथ्रोपिक के एक प्रमुख एआई प्री-ट्रेनिंग रिसर्चर जैकब कॉक्सन ने यह कहते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया कि एआई कंपनियां सुपरइंटेलिजेंस बनाने की होड़ में ‘इंसानी जिंदगियों के साथ जुआ खेल रही हैं’. जैकब का कहना है कि एआई बनाने वाले लोग खुद यह मानते हैं कि यह तकनीक इस दशक के अंत तक अर्थात अगले तीन-चार सालों में पूरी मानवता को खत्म कर सकती है. एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई ने भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अर्थात एआई से खौफ खाते हुए एआई माॅडल बनाने की रफ्तार घटाए जाने की सलाह दी है. उनकी चिंता के साथ ओपनएआई के सीईओ सैम आल्टमैन और एक्स एआई के प्रमुख एलन मस्क ने भी सहमति जताई है. यानी खतरा सुदूर भविष्य में नहीं बल्कि हमारे सिर पर ही मंडरा रहा है.   

जीवन को आरामदेह बनाने की अपनी निरंतर कोशिशों के चलते हम मनुष्यों की हालत शायद उस नशेड़ी की तरह हो गई है जो यह बात तो जानता है कि नशा उसके लिए हानिकारक है लेकिन लत लग जाने के कारण वह नशे के बिना रह भी नहीं पाता. परंतु अपने जीवन को आरामदेह बनाने की कोशिश तो दुनिया का हर प्राणी करता है, फिर हम मनुष्य भी अगर ऐसा ही करते हैं तो इसमें हमारा क्या दोष? 

मनुष्येतर प्राणियों को प्रकृति अपने अंकुश में रखती है, लेकिन अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता के चलते हम मनुष्य शायद निरंकुश हो गए हैं. अगर हम स्व-नियंत्रण रखते तो यही श्रेष्ठता हमारे लिए वरदान बन सकती थी, लेकिन आरामतलब बनकर हमने इसे अपने लिए अभिशाप बना लिया है. 

आज हम किसी भी तरह से धन-संपत्ति हासिल करना चाहते हैं, ताकि सुख से जी सकें. लेकिन इतिहास गवाह है कि दुनिया उसी को याद रखती है, जिसने दुख-कष्टों से भरा, संघर्षपूर्ण जीवन जिया हो. राम ने अगर चौदह साल का वनवास न भोगा होता तो कौन उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम मानता! पांडव अगर तेरह वर्षों तक वन-वन न भटके होते तो क्या महाभारत के नायक बन पाते! शिवजी ने अगर दुनिया की भलाई के लिए हलाहल विष न पिया होता तो कौन उन्हें नीलकंठ कहकर पूजता! दुनिया में जितने भी महापुरुष हुए हैं, अथक परिश्रम के बल पर ही बने हैं. प्राचीनकाल के ऋषि-मुनि शायद इस रहस्य को जानते थे, इसलिए त्याग-तपस्या और यम-नियम के पालन के जरिये वे अपने शरीर पर कड़ा अंकुश रखते थे. वर्तमान युग में दुर्भाग्य से हमने शारीरिक सुख को ही जीवन का परम लक्ष्य मान लिया, जिससे आत्मिक विकास पीछे छूट गया.  

लेकिन जीवन को अगर आरामदेह बनाने की कोशिश न करें तो क्या हम निकम्मे बनकर बैठे रहें? हम आखिर जो भी करते हैं वह अपनी सुख-सुविधा की खातिर ही तो करते हैं!

यह सवाल इसलिए पैदा होता है क्योंकि आर्थिक सम्पन्नता को ही हमने जीवन का चरम लक्ष्य मान लिया है. बेशक, दौलत सुख देती है लेकिन तभी जब वह मेहनत से कमाई गई हो. दरअसल सुख दौलत नहीं, मेहनत में होता है, लेकिन हम साधन नहीं, साध्य को देखने के आदी होते हैं इसलिए मेहनत के मिलने वाले फल को ही खुशी का स्रोत समझ लेते हैं. पुराने जमाने में बहुत से लोग इस फर्क को समझते थे, इसलिए कहते थे कि बिना मेहनत के मिलने वाला धन पचता नहीं है, अर्थात उससे सुख-समृद्धि नहीं आती. इस तरह के उदाहरण भी सामने आते रहते थे कि अगर किसी को जमीन में कोई गड़ा खजाना या अन्य किसी तरह से मुफ्त का धन मिल जाए तो उसके ऊपर कोई न कोई मुसीबत बनी रहती थी और कई बार तो घर का कोई सदस्य विक्षिप्त तक हो जाता था. जुआ-सट्टे को इसीलिए बुराई माना जाता था क्योंकि वे धन के श्रम से संबंध को तोड़कर उसे एक स्वायत्त चीज बना देते हैं. 

धन की अपने आप में कोई कीमत नहीं होती, हमारी मेहनत ही हमारे लिए उसकी कीमत तय करती है. अगर किसी को बहुत जोरों की भूख-प्यास लगी हो तो उसके लिए भोजन-पानी का जो मूल्य होगा, उसकी कीमत को भरे पेट वाला आदमी कभी नहीं समझ सकता. मेहनत हमारी उसी भूख-प्यास को जगाती है, जिसके कारण फल सुमधुर लगता है. 

साधन और साध्य के अंतर्संबंध को नहीं समझ पाने के कारण ही आज कई लोग दुर्गम गिरि शिखरों पर स्थित मंदिरों में हेलिकाॅप्टर या डोली-खच्चर से पहुंच कर दर्शन करते हैं और यह भ्रम पाल लेते हैं कि उन्हें वही फल मिलेगा जो वहां तक पैदल पहुंच कर दर्शन करने वालों को मिलता है. यह सच है कि समाज के सारे लोग इस रहस्य को नहीं समझ सकते, इसलिए पुराने जमाने में जानकार लोग इसे धर्म का रूप दे देते थे ताकि आम लोग भी सही राह पर चल सकें- जैसे पेड़-पौधों की पूजा का विधान बनाना ताकि पर्यावरण सुरक्षित रहे; नदी-तालाब, कुएं, पहाड़ को देवता का दर्जा देना ताकि लोग उन्हें अपवित्र या प्रदूषित न करें. आज के वैज्ञानिक युग में हमने पुराने विश्वासों को तो अंधविश्वास कहकर खारिज कर दिया है लेकिन खुद को अनुशासित रखने का कोई नया विधान बना नहीं पाए. नतीजतन ईश्वर के दंड का भय तो खत्म हो गया लेकिन स्वानुशासन नहीं ला पाने के कारण हम स्वच्छंद हो गए हैं. 

पौराणिक कथाओं के अनुसार भस्मासुर को वरदान मिला था कि वह जिसके ऊपर भी हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा. हम मनुष्य प्रगति के उस शिखर तक पहुंच चुके हैं जहां दुनिया की और कोई दूसरी प्रजाति हमें खत्म नहीं कर सकती. तो क्या अब एआई ही हमारा भस्मासुर बनेगा?  

(23 सितंबर 2026 को प्रकाशित)

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