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Showing posts from October, 2025

हमें अपनी बेशुमार क्षमताओं का अहसास करा सकता है एआई !

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 ऐसे समय में, जबकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर दुनियाभर में संदेह के बादल छाए हुए हैं, इसके सदुपयोग का एक सुंदर उदाहरण पिछले दिनों देखने को मिला, जब इस पर आधारित मौसम मॉडल के जरिये हमारे देश में 38 लाख किसानों को मानसून से जुड़ी जानकारी दी गई. पारम्परिक सुपर कम्प्यूटर मॉडल के मुकाबले यह इतना सटीक था कि 30 दिन पहले ही इसने न केवल मानसूनी बारिश के आगमन का सही समय बताया, बल्कि बीच में 20 दिन बारिश रुकने की चेतावनी भी दी, जिसे पारम्परिक मॉडल पकड़ नहीं पाए थे.  पुराने जमाने में यही काम समाज के बड़े-बुजुर्ग किया करते थे. अनुभवी आंखें मौसम की चाल को समय रहते भांप लिया करती थीं और उन्हीं की सलाह पर किसान तय करते थे कि ज्यादा पानी की जरूरत वाली धान जैसी फसल बोनी है या कम पानी में भी तैयार हो जाने वाले ज्वार, बाजरे जैसे मोटे अनाज.    अतीत के अनुभवों के आधार पर भविष्य का अनुमान लगाना कदाचित ऐसी विशेषता है जो इस धरती पर सभी जीव-जंतुओं में पाई जाती है. भूकंप का सटीक अनुमान हमारी अत्याधुनिक मशीनें अभी तक भले न लगा पाई हों लेकिन कई जीव-जंतुओं में भूकंप आने के कुछ समय पहले ...

मनोरंजन के तिलिस्म को तोड़कर भयावह यथार्थ दिखाए कौन ?

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 पिछले दिनों एक खबर आई कि अमेरिका के फ्लोरिडा में अटलांटिक महासागर के एक तट के पास समुद्र में हिचकोले खाते एक हिरण को बचाव दल ने बचाया. हमारे देश में भी तेंदुओं या अन्य जंगली जानवरों के कुएं में गिरने या अन्य कहीं फंसने पर बचाए जाने की खबरें अक्सर सामने आती हैं. बोरवेल के गड्ढे में कहीं किसी बच्चे के गिरने की खबर आती है तो उसकी सलामती के लिए पूरा देश प्रार्थना करने लगता है. करीब दस साल पहले तुर्की के समुद्री तट पर बहकर आए तीन साल के बच्चे अयलान कुर्दी का शव देखकर पूरी दुनिया की आंखें नम हो गई थीं. सूडान में 32 साल पहले एक फोटोग्राफर ने अकाल के दौरान भूख से मरती एक बच्ची की फोटो खींची थी, जिसके मरने का इंतजार करता एक गिद्ध कुछ दूर बैठा था (क्योंकि गिद्ध सिर्फ मृतकों का मांस खाते हैं). इस फोटो के लिए फोटोग्राफर को दुनिया का प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार भी मिला. लेकिन बच्ची को न बचा पाने की विवशता फोटोग्राफर की अंतरात्मा को कचोटती रही और कुछ महीने बाद ही उसने आत्महत्या कर ली. आज भी ये तस्वीरें हमें भीतर तक हिला देती हैं.  इसमें कोई शक नहीं कि मानव जाति दुनिया की सर्वाधिक संवेदनशी...

सादगी का सौंदर्य

तमस भगाने की खातिर  रातों को मैंने दिन की तरह बना डाला पर बिगड़ी सर्केडियन क्लॉक दिनचर्या सबकी अस्त-व्यस्त हो गई समझ में तब आया रातों का गहन अंधेरा भी जीवन के लिये जरूरी है विश्राम इसी में जीव-जंतु सब पाते हैं। इस दीप पर्व पर इसीलिये मिट्टी के दीप जलाता हूं जो जुगनू जैसी जगमग से तन-मन आलोकित करते हैं सुंदर चेहरे पर जैसे काला तिल भी अच्छा लगता है वैसे ही गहरी रातों में नन्हें दीपक का जलना सुंदर लगता है। (रचनाकाल : 18 अक्टूबर 2025)

दीपक को चाहे जितना नीचे रखें, मगर लौ उसकी ऊपर रहती है

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 हाल ही में ब्रिटेन में धान की खेती सफलतापूर्वक किए जाने की खबर सामने आई है. जो लोग ब्रिटेन की आबोहवा से परिचित हैं वे जानते हैं कि वहां के लोग चावल खाते जरूर हैं, लेकिन विदेशों से आयात करके, क्योंकि वहां की जलवायु धान की खेती के अनुकूल नहीं है. लेकिन जलवायु परिवर्तन ने अब इसे संभव कर दिखाया है. शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि औसत वार्षिक तापमान दो से चार डिग्री सेल्सियस बढ़ा तो ब्रिटेन में बड़े पैमाने पर चावल की खेती संभव हो सकती है.  राजस्थान का थार रेगिस्तान भारत से लेकर पाकिस्तान तक करीब दो लाख वर्ग किमी क्षेत्र में फैला है और यह दुनिया का बीसवां सबसे बड़ा रेगिस्तान है. पिछले दिनों अर्थ फ्यूचर जर्नल में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक अगर भारतीय मानसून के पश्चिम की ओर लौटने की प्रवृत्ति जारी रही तो इस सदी के अंत तक यह हरा-भरा हो सकता है (इसके संकेत अभी से दिखने लगे हैं, राजस्थान के कई हिस्सों में हरियाली नजर आने लगी है और बाढ़ भी आने लगी है). वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि हजारों वर्ष पूर्व इस क्षेत्र में सिंधु घाटी सभ्यता मौजूद थी और तब यहां भरपूर मानसूनी बारिश होती थी.  द...

सुख अधिक कीमती है या दु:ख?

भगवान जिन्हें हम कहते हैं क्या सुख वे भोगा करते हैं? वनवास बरस चौदह भोगा जब राज मिला तब निर्वासित कर सीता को सुख कितना भला मिला होगा भीतर-बाहर दु:ख जीवनभर जो सहता है क्या राम उसी को कहते हैं? जो राजमहल से दूर पर्वतों पर वनवासी लोगों जैसे रहते हैं दुनिया को लेकिन जीवन देने की खातिर जो जहर पी लिया करते हैं उन शिवशंकर को ही हम पूजा करते हैं! सोने की लंका में जो रावण रहता है धन लूट-पाट कर जो कुबेर का सब सुख भोगा करता है सीता को हर लेता है जो, हम उसे जलाया करते हैं फिर सुख के पीछे ही क्यों भागा करते हैं?   (रचनाकाल : 6 अक्टूबर 2025)

ये जो लौ जली है वो बुझ गई तो न दूर होगा तमस कभी

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 तमिलनाडु की सेंट्रल जेलों में इन दिनों एक अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है. जो कैदी पहले गैंग बनाकर आपस में लड़ते-भिड़ते रहते थे, वे अब ग्रुप बनाकर पढ़ाई कर रहे हैं. दरअसल तमिलनाडु की सभी नौ सेंट्रल जेलों में अगस्त 2024 से कोंडुकुल वनम (किताब एक आकाश की तरह है) योजना चलाई जा रही है. इसके तहत जेल में सभी पढ़े-लिखे कैदियों के लिए किताब पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया है. एक साल के भीतर ही इस योजना को इतनी अप्रत्याशित सफलता मिली है कि राज्य की बाकी 14 जिला जेलों में भी जेल विभाग लाइब्रेरी शुरू करने जा रहा है.  एक दूसरी उत्साहवर्धक खबर राजस्थान के जालौर जिले से है. वहां के दो गांवों- रेवत और कलापुरा में सरकारी स्कूल के ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षा के छात्र अपने परिवार और गांव के बुजुर्गों के पास बैठते हैं. उनसे बातचीत करके क्षेत्र के इतिहास के बारे में जानकारी जुटाते हैं और बुजुर्गों की बताई कहानियां अपनी नोटबुक में दर्ज करते हैं. फिर स्कूल में शिक्षक सभी बच्चों की डायरियां इकट्ठी करने के बाद उनमें से कॉमन कहानियों को बड़ी पोथी में लिपिबद्ध करवाते हैं. अब तक 300 बच्चे अपने बुजुर्गों के ...

विजयादशमी

युद्ध दुनिया में तो होते ही रहे हैं हरदम मानते हैं सही खुद को सभी इस दुनिया में राम ने किंतु जो वनवास के दु:ख-कष्ट सहे राजमहलों से अचानक ही निकल कर वन में छोड़कर सुख जो भटकते रहे जंगल-जंगल याद आती है तो व्याकुल मुझे कर जाती है। उन दिनों में भी क्या होती थी उम्रकैद यही वर्ष चौदह की सजा तब भी मिला करती थी? जब निरपराध कोई स्वेच्छा से इसे सहता है आग में तप के वो भगवान बना करता है! रचनाकाल : 1-2 अक्टूबर 2025

दूसरे की लकीर मिटाने की जगह हम क्यों नहीं खींचते बड़ी लकीर !

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 शून्य से भी नीचे के तापमान वाले लद्दाख का माहौल इन दिनों गरम है. अपने पर्यावरणपरक कार्यों से सिर्फ लद्दाख ही नहीं, बाकी दुनिया में भी ख्याति प्राप्त सोनम वांगचुक इन दिनों जेल में हैं, और वह भी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत, जिसमें जमानत भी जल्दी नहीं होती. उन पर हाल ही में लद्दाख में भड़की हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप है. लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठवीं अनुसूची में शामिल करने सहित कुछ अन्य मांगों को लेकर वांगचुक 35 दिनों की भूख हड़ताल पर बैठे थे, लेकिन दसवें दिन ही आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया. वांगचुक ने तत्काल अपना आंदोलन वापस ले लिया और कहा कि युवाओं ने हताश होकर ऐसा किया है लेकिन उन्हें हिंसा नहीं करनी चाहिए थी.   पिता सोनम वांग्याल राज्य सरकार में मंत्री थे, लेकिन प्रकृति और पर्यावरण में गहरी रुचि रखने वाले सोनम वांगचुक की जीवन शैली बेहद साधारण है. खुद एनआईटी से इंजीनियरिंग की डिग्री पा चुके हैं लेकिन सरकारी शिक्षा की खामियों का पता चलने पर ऐसा स्कूल खोला, जिसमें टॉप स्कूलों की उच्चतम अंकों वाली प्रवेश प्रक्रिया के उलट, फेल होने वाले...