सकारात्मक शक्तियां क्यों नहीं कर पातीं गठबंधन !
जिस तरह अकेले व्यक्ति की तुलना में व्यक्तियों का समूह ज्यादा काम कर पाता है, उसी तरह अकेले देश की तुलना में देशों के गठबंधन से फायदा होता है. लेकिन जिस तरह हम अपनी सुरक्षा या आर्थिक फायदे के लिए गठबंधन करते हैं, वैसे ही नैतिक विकास के लिए कोई गठबंधन क्यों नहीं करते?
गठबंधन के जरिये हम एक-दूसरे से नई-नई चीजें सीखते या उनका आदान-प्रदान करते हैं. सवाल यह है कि हम अपने स्वार्थ या नकारात्मक चीजों के लिए तो बहुत जल्दी गठबंधन कर लेते हैं लेकिन परमार्थ या सकारात्मक चीजों के लिए गठजोड़ बनाने की उत्सुकता क्यों नहीं दिखा पाते? निंदा रस हम मनुष्यों के संबंधों में बहुत जल्दी घनिष्ठता पैदा करता है, जबकि सकारात्मक बातों के जरिये हम मुश्किल से ही एकजुट हो पाते हैं.
नकारात्मकता ढलान की तरह होती है, जिसमें हम बिना किसी परिश्रम के फिसलते हुए अपनी गति तीव्र होने का अभिमान पाल सकते हैं, जबकि सकारात्मकता पर्वत शिखर पर चढ़ने के समान है, जिसमें परिश्रम लगता है. मनुष्येतर जीव-जंतुओं में ऊंचा उठने की ललक नहीं होती, इसलिए उन्हें नीचे गिरने का डर भी नहीं होता. हम मनुष्यों ने अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता के कारण ऊंचा उठने में मिलने वाले अलौकिक सुख का स्वाद चख लिया है, इसलिए ऊंचाई हासिल करने की कोशिश में लगे रहते हैं.
क्या आपको लगता है कि परोपकार करने वाले बिना किसी स्वार्थ के ऐसा करते हैं? हर्गिज नहीं. वे जान चुके होते हैं स्वार्थसिद्धि से मिलने वाले सुख की अपेक्षा परमार्थ से मिलने वाला सुख अपूर्व है, इसलिए तात्कालिक लाभ की बजाय वे दीर्घकालिक फायदे को ध्यान में रखते हुए काम करते हैं. चूंकि निकृष्ट दर्जे के सुख के बाद उतना ही दु:ख भी भोगना पड़ता है, इसलिए हमारे पूर्वज उत्कृष्ट दर्जे के सुख को महत्व देते थे, जिसका नाम उन्होंने ‘आनंद’ रखा. सुख और दु:ख एक-दूसरे के विलोम हैं जबकि आनंद शब्द का कोई विलोम नहीं होता. पूर्वी और पश्चिमी सभ्यता में यह एक बुनियादी फर्क है कि पश्चिमी सभ्यता में जहां तात्कालिक सुख को महत्व दिया गया है, वहीं पूर्वी सभ्यता में दीर्घकालिक सुख को ध्यान में रखा गया है. शायद यही कारण है कि पश्चिमी देशों के शब्दकोश में हमें आनंद, ब्रह्मचर्य, तपस्या जैसे शब्दों के कोई पर्यायवाची या समानार्थी शब्द नहीं मिलते.
विडंबना यह है कि हम भारतीय अपनी पूर्वी सभ्यता का गुणगान चाहे जितना करें, जीवनशैली हमने पश्चिम वाली ही अपना रखी है. इसलिए हम भी तात्कालिक सुखों के पीछे ही दौड़ रहे हैं. हालांकि इस चक्कर में हम धरती पर उपलब्ध संसाधनों को जिस तेजी से नष्ट-भ्रष्ट करते जा रहे हैं, उससे इतना तो तय है कि अंत में हमें दीर्घकालिक सुख वाली जीवनशैली (अर्थात परमार्थ) की ओर लौटना ही होगा. चूंकि पश्चिमी मानस के डीएनए में ही यह चीज नहीं है, इसलिए इसकी अगुवाई हम भारतीयों को ही करनी होगी. हमारे लिए यह इसलिए भी सरल है क्योंकि महात्मा गांधी की विरासत अभी ताजा है. हम चाहें तो सभी देशों के सकारात्मक तत्वों के बीच गठबंधन की अगुवाई करके दुनिया में ऐसा माहौल बना सकते हैं कि नकारात्मक शक्तियों का हावी होना असंभव हो जाए. इसमें कोई शक नहीं कि न्यूनाधिक मात्रा में हर देश में ऐसी सकारात्मक शक्तियां विद्यमान होती हैं, किंतु एकजुटता के अभाव में नकारात्मक शक्तियों के सामने कमजोर पड़ जाती हैं. तो क्यों न हम भारत के लोग ऐसी शक्तियों को एकजुट करने की पहल करें! यह अवश्य ध्यान में रखना होगा कि ऐसी शक्तियों के काम करने के तरीके सर्वथा अलग होते हैं. नकारात्मक शक्तियां जहां हिंसा, अराजकता, दंगा-फसाद और तोड़फोड़ के जरिये अपनी मांगें मनवाने की कोशिश करती हैं, वहीं सकारात्मक शक्तियों को अहिंसा, अनुशासन, आत्मसंयम और स्वयं कष्टसहन के जरिये अपना लक्ष्य हासिल करना होता है. जरा सोचिए, रूस-यूक्रेन और अमेरिका-ईरान में शांति के पक्षधर अगर युद्ध के पक्षधरों जितनी ही सक्रियता दिखाते और शेष दुनिया के शांतिवादियों की तरफ से भी उन्हें समर्थन मिलता तो क्या दुनिया को दो भयावह युद्धों से बचाया नहीं जा सकता था! जरूरी नहीं कि शांति के पक्षधर सफल ही हों, लेकिन पुरुषार्थ लड़कर हारने में है या बिना लड़े ही हार मान लेने में?
(28 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित)

Comments
Post a Comment