जो नायक हैं, हम खलनायक तो नहीं उन्हीं की नजरों में !
हम मनुष्यों की यह स्वाभाविक चाहत होती है कि अपनी विरासत पर गर्व करें, इसलिए हम हर साल मनाए जाने वाले किसी दिन विशेष में अपने महापुरुषों के पुरुषार्थ के किस्से जोड़ते हैं और इस तरह अपने इतिहास को समृद्ध करते जाते हैं. लेकिन हमारे पूर्वज भी क्या नहीं चाहते होंगे कि अपने वंशजों पर गर्व करें? बेशक, हर संतान अपने पिता को आदर्श मानती है, लेकिन पिता भी चाहता है कि उसकी संतान उससे आगे निकले. नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी के जो अनुभव विरासत में मिलते हैं, उनमें अपने भी अनुभव जोड़ कर वह अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करती है. अगर ऐसा न होता और हर नई पीढ़ी को शून्य से शुरुआत करनी पड़ती तो कदाचित हम मनुष्य आदिम अवस्था से कभी आगे बढ़ ही न पाते.
आज दशहरा-दिवाली जैसे त्यौहारों के जरिये हम अपने पूर्वजों की उपलब्धियों का उत्सव तो मनाते हैं, लेकिन हमारे पूर्वजों को भी क्या अपने वंशजों के (अर्थात हमारे) ऊपर वैसा ही गर्व हो रहा होगा? सवाल यह भी है कि एक दिन जब हम भी पूर्वज बन जाएंगे तो हमारे वंशज हमारी किन उपलब्धियों का जश्न मनाएंगे?
लेकिन आगामी पीढ़ियां हम पर गर्व करें, इसके लिए हम आज क्या करें या कर सकते हैं?
जाहिर है कि इसके लिए हमें अतीत में झांकना होगा कि अपने पूर्वजों पर हम क्यों गर्व करते हैं. राम ने अगर स्वेच्छा से वनवास न भोगा होता तो क्या वे मर्यादा पुरुषोत्तम बन पाते? शिवजी ने अगर दुनिया की भलाई के लिए कालकूट विष न पिया होता तो उन्हें महादेव की उपाधि कौन देता? राजा हरिश्चंद्र ने अगर सत्य की रक्षा के लिए अपार कष्ट न सहे होते तो क्या वे युगों बाद भी आज सत्यवादी के रूप में याद किए जाते? पुराने जमाने में भी ऐसे बहुत से लोग रहे होंगे जिन्होंने बिना कोई संघर्ष झेले पूरी सुख-सुविधा के साथ जीवन जिया होगा. लेकिन उनके नाम आज कौन जानता है? जो जितना ज्यादा संघर्ष झेलता है, समाज से थोड़ा लेकर ज्यादा देता है, इतिहास उसे ही याद रखता है. हमें भी आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि आज हम जितना उपभोग कर रहे हैं, क्या उससे ज्यादा (या कम से कम उतना भी) समाज को दे पा रहे हैं?
हो सकता है आज के कठिन दौर में हम अपनी रोजी-रोटी के संघर्ष में ही इतना उलझे हुए हों कि पूर्वजों की विरासत में नया कुछ न जोड़ पा रहे हों. ऐसी हालत में हमारा कालखंड मानव जाति के इतिहास में गुमनाम होकर रह जाएगा. लेकिन कुछ नया न जोड़ पाएं, तब भी हमें यह ध्यान तो रखना ही चाहिए कि कहीं हम अपनी समृद्ध विरासत को नष्ट तो नहीं कर रहे हैं? जो प्राकृतिक (जैसे स्वच्छ पर्यावरण, जैव विविधता) और अर्जित (त्याग, परोपकार, ईमानदारी जैसे मानवीय सद्गुणों की) संपदा हमें पुरानी पीढ़ी से मिली है, क्या हम उसे कोई क्षति पहुंचाए बिना नई पीढ़ी को सौंप रहे हैं? उदाहरण के लिए, हम जिस स्वच्छ हवा में सांस ले रहे हैं, क्या वह हमारी अगली पीढ़ियों को भी (पर्यावरण प्रदूषण को देखते हुए) मिल पाएगी? आज खेत जिस तरह हमारा पेट भर रहे हैं, क्या अगली पीढ़ियों का पेट भरने लायक इतनी ही उर्वरा शक्ति (फर्टिलाइजर, पेस्टिसाइड्स के अंधाधुंध इस्तेमाल के मद्देनजर) उनमें बची रह पाएगी? जिस सहज विश्वास, ईमानदारी व भरोसे के बल पर हम समाज में सुरक्षित और निर्भय होकर जी रहे हैं, वैसे ही मानवीय सद्गुण (बढ़ती स्वार्थवृत्ति को देखते हुए) क्या हम अपनी भावी पीढ़ियों को विरासत में दे पाएंगे?
किसी को शैतान, राक्षस या खलनायक इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वह समाज की भलाई में योगदान देना तो दूर, उल्टे उसे हानि पहुंचाता है. हम तो अपने पूर्वजों को नायक मानते हैं, लेकिन कहीं ऐसा न हो कि हमारे वंशज हमें खलनायक मानने पर मजबूर हो जाएं!
त्यौहार याद दिलाते हैं कि हमारे जीवन का ध्येय क्या है. इसलिए हम अपने पूर्वजों के पुरुषार्थ का उत्सव तो मनाएं ही, उनके आदर्शों को अपनाने की कोशिश भी करें. आखिर जिन आदर्शों को हासिल करना हम जीवन का लक्ष्य मानते हैं, क्या अपने ऐसे वंशजों को पसंद करेंगे जो उन लक्ष्यों को हासिल करने की बजाय सिर्फ हमारे गुणगान में ही लगे रहें? फिर हमारे पूर्वज सिर्फ हमारे गुणगान करने भर से कैसे संतुष्ट हो सकते हैं!
(20 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित)

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