ठगे जाने का दु:ख

ऐसा नहीं कि मुझे नहीं है इस पद पर विश्वास
कि ‘कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय।
आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय।।’
मगर मैं नहीं चाहता कोई मुझको ठग पाये।
दरअसल किसी को ठगता है जब कोई तो
वह उसके सारे दोष-पाप ले लेता है
मैं अपने सारे दोष-पाप का दण्ड चाहता खुद भुगतूं
इसलिये किसी पर अपना कोई कर्ज न रहने देता हूं।
फिर भी मुझको जब कोई ठग ही लेता है
बेबस होकर बस यही प्रार्थना करता हूं
हे ईश्वर मेरे दोष-पाप से
तुम उसकी रक्षा करना!

रचनाकाल : 30 सितंबर 2026

Comments

Popular posts from this blog

गूंगे का गुड़

सम्मान

उल्लास उधारी का