अपरिमित बनने की चाह
मुझको अथाह सागर आकर्षित करता है
उसके जैसा ही बन पाऊं
इसलिये स्वयं को रोज-रोज मैं
थोड़ा-थोड़ा गहरा करता हूं।
मैं आसमान की तरह चाहता
अंतहीन ऊंचा बनना
इसलिये स्वयं की मानवता को
थोड़ा-थोड़ा ऊंचा रोज उठाता हूं।
यह सच है ऐसा बन पाने को
एक जनम क्या, कई जनम कम पड़ते हैं
सागर-सी गहराई पाने को
समय कहां कम लगता है!
ऊंचा बन पाना आसमान-सा अंतहीन
अरबों वर्षों में ही सम्भव हो पाता है
(कहते हैं जब बिग बैंग हुआ
तब निकट एक-दूजे के सारी चीजें थीं)!
इसलिये नहीं होता अधीर
मैं जैसा भी हूं आज
करोड़ों वर्षों के जैविक विकास का
पुरखों का वह प्रतिफल है
जो आज करूंगा कोशिश, वह
हो सफल भले चाहे अनगिनती वर्षों में
मैं धरती जैसा धैर्यवान
बनने की इच्छा रखता हूं।
रचनाकाल : 4 अक्टूबर 2026
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