निर्भयता के अभाव में कायरों की आक्रामकता से तबाह होती दुनिया




 अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पिछले दिनों एक हैरान कर देने वाला खुलासा किया. ट्रम्प ने बताया कि नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान तुर्की की राजधानी अंकारा से निकलते समय वे मीडिया के सामने दिखाने के लिए अपने आधिकारिक विमान एयरफोर्स वन में चढ़े जरूर थे लेकिन अंदर जाकर वे पीछे के रास्ते से उतरकर एक एयरपोर्ट कैटरिंग कंटेनर में छिप गए और गुप्त रूप से एक सैन्य जेट से बाहर निकल गए थे. एयरफोर्स वन में सवार मीडियाकर्मियों को इसकी भनक तक नहीं लगी, क्योंकि ट्रम्प के उनके साथ होने का आभास देने के लिए विदेश मंत्री और ट्रेजरी सचिव समेत शीर्ष अधिकारी उनकी नजरों के सामने ही थे. जाहिर है कि इतनी गहरी गोपनीयता के चलते ईरानियों को तो इसकी हवा भी नहीं लगी होगी और उन्होंने यही समझा होगा कि ट्रम्प एयरफोर्स वन में ही सवार हैं. फिर उन्होंने हमला क्यों नहीं किया? 

तो क्या हमले की जिस खुफिया सूचना को इतना पुख्ता माना जा रहा था कि उसके चलते ट्रम्प को एक कंटेनर में छिपकर भागना पड़ा, वह झूठी थी?

22 साल पहले, सामूहिक विनाश के रासायनिक, जैविक या परमाणु हथियार बना लेने की जिस खुफिया जानकारी का दावा करते हुए अमेरिका ने इराक को तबाह कर डाला था, सद्दाम हुसैन को मौत के घाट उतारे जाने के बाद वह बेबुनियाद निकली, लेकिन उस गलत सूचना की बुनियाद पर इराक को तो अमेरिका ने नेस्तनाबूद कर ही डाला था! हैरानी की बात है कि न तो तब अमेरिका को अपने किए पर कोई पछतावा हुआ था और न अब ट्रम्प को अपने खुफिया विभाग की विफलता पर कोई शर्मिंदगी है, उल्टे अपने छिपकर भागने की बहादुरी का बखान उन्होंने ऐसे किया है मानो अपनी चालाकी से ईरान को बहुत बड़ी मात दे दी हो! 

हम मनुष्यों के डर ने हमें अकल्पनीय नुकसान पहुंचाया है. यह कहा जाए तो शायद अतिशयोक्ति न होगी कि दुनिया के सारे झगड़ों की जड़ में कोई न कोई डर ही होता है. पुतिन को डर है कि यूक्रेन अगर नाटो में शामिल हो गया तो रूस के लिए सीमा पर खतरा बढ़ जाएगा, जबकि यूक्रेन को डर है कि अगर वह नाटो की शरण में नहीं गया तो रूस उसे निगल जाएगा. अपने इन्हीं डरों की वजह से दोनों पिछले साढ़े चार साल से एक-दूसरे पर बम-गोलों की बरसात कर रहे हैं. अमेरिका को डर है कि ईरान ने अगर परमाणु हथियार बना लिया तो इजराइल के अस्तित्व को ही मिटा देगा, जबकि ईरान को डर है कि अगर उसने अपने परमाणु कार्यक्रम को खत्म कर दिया तो इजराइल पूरे मिडिल ईस्ट पर हावी हो जाएगा! 

इतिहास चूंकि हमेशा विजेता का लिखा जाता है इसलिए हारने वाले को हम बुरा ही समझते हैं, लेकिन हारने वाले के पक्ष को भी अगर हम जान पाएं तो शायद वे उतने खलनायक नहीं नजर आएंगे और जीतने वाले का कद भी कदाचित उसी अनुपात में छोटा हो जाएगा. इस प्रकार दोनों में उन्नीस-बीस का फर्क भले रहे लेकिन वे एक ही धरातल पर खड़े नजर आएंगे. अब तो वैज्ञानिक प्रयोगों से साबित भी हो चुका है कि दुनिया के सभी मनुष्यों का 99.9 प्रतिशत डीएनए एक समान होता है, फिर मात्र 0.1 प्रतिशत के फर्क से यह कैसे सम्भव है कि किन्हीं भी दो मनुष्यों या समुदायों के बीच आकाश-पाताल का अंतर हो!

लेकिन हम डरना छोड़ क्यों नहीं पाते?

 हम जितना सांपों से डरते हैं, सांप भी उतना ही हम मनुष्यों से, क्योंकि दोनों को लगता है कि दूसरा उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है. इसी डर के चलते हम सांपों को देखते ही मार डालने की कोशिश करते हैं और सांप हमें काटने की. जबकि सांपों का अस्तित्व हम मनुष्यों की भलाई के लिए ही है, अगर वे न रहें तो चूहे पूरी फसल को बर्बाद कर सकते हैं और प्लेग जैसी घातक बीमारियां फैला सकते हैं. 

इसीलिए प्राचीनकाल से ही निर्भयता को एक बड़ा गुण माना गया है. लेकिन निर्भयता तभी आती है जब मन साफ हो. निहित स्वार्थों के चलते हम अपने मन में इतने चोर बिठा लेते हैं कि ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ कहावत सुनते ही हमारा हाथ अपनी दाढ़ी पर चला जाता है!

इसलिए अगर डर को दूर करना है तो सबसे पहले अपने मन में बैठे चोर को भगाना होगा और मन को साफ करने के लिए अपने संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठना होगा. समस्या यह है कि अपनी आंखों पर बंधी स्वार्थ की पट्टी के चलते हमने उचित-अनुचित के विवेक को ही खो दिया है, उसी को सही मानने लगे हैं जिससे हमारा स्वार्थ सधता हो. यह प्रवृत्ति दुनियाभर में देखी जा रही है और निर्भयता के अभाव में लोग कायर बनते जा रहे हैं. ऐसे में मन में गलतफहमियां पाल कर डरने और खुद को व दूसरों को नुकसान पहुंचाने से हमें रोके भी तो कौन? 

(16 सितंबर 2026 को प्रकाशित)

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