दु:ख जड़, सुख फल


बांटता हूं लोगों को सुख जब तो
लौटता है कई गुना होकर वह
दूसरों के चेहरे पर देख खुशी
मन मेरा और भी खुश होता है।
दु:ख के भी साथ ऐसा होता है
लगता है डर उसे बांटने में
देख कर लोगों को दुःखी
मेरा भी दुःख न बढ़े कई गुना
इसीलिए सहता हूं चुपचाप 
छिपाता हूं उसी तरह
वृक्ष जैसे छिपाते हैं अपनी जड़
देते हैं लोगों को फूल-फल
दुःख भी मुझे लगते अपनी जड़ों जैसे
चाहता हूं रखूं उन्हें भीतर ही
लोगों को बांट सकूं 
ताकि खूब फूल-फल।

रचनाकाल : 5 सितंबर 2026

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