मुनाफाखोरों के शोषण से आम जनता को बचाए कौन ?
कुछ माह पहले यह सनसनीखेज जानकारी सामने आई थी कि जब आपके मोबाइल फोन की बैटरी ‘लो’ हो तो एप्प आधारित कोई सर्विस लेने पर ज्यादा पैसे कटते हैं, क्योंकि सर्विस प्रोवाइडर अंदाजा लगा लेते हैं कि बैटरी कम होने से आपके पास ज्यादा ऑप्शन बचे नहीं होंगे, यानी आप झख मारकर ज्यादा पैसे चुकाएंगे! यही नहीं, आईफोन के जरिये कोई सर्विस लेने पर, एंड्राॅइड फोन की तुलना में ज्यादा चार्ज लगने की शिकायत लोगों को रही है. शायद सेवा प्रदाताओं को लगता है कि महंगा फोन इस्तेमाल करने वाले ज्यादा रईस होंगे, लिहाजा ज्यादा पैसा भी बिना किसी हील-हुज्जत के चुका देंगे!
अभी कुछ साल पहले तक स्मार्टफोन की बैटरी रिमूवेबल होती थी, अर्थात बैटरी खराब होने पर आपको अपना फोन कबाड़ में बेचने की बजाय सिर्फ बैटरी बदलने की जरूरत पड़ती थी. इलेक्ट्राॅनिक सामानों में खुलने वाले स्क्रू लगे होते थे, जिससे खराब होने पर सामानों को खुद भी सुधारने की कोशिश की जा सकती थी. कितने ही घरों में बच्चे ऐसे सामानों को खोलकर उसे सुधारने का प्रैक्टिकल करते थे और इस चक्कर में सामान बने या बिगड़े, उन्हें प्रायोगिक ज्ञान हर हाल में मिलता था. आज यूज एंड थ्रो सामानों की बाजार में बाढ़ आई हुई है क्योंकि आप किसी सामान को एक ही बार खरीद कर, खराब होने पर उसे रिपेयर कर-करके चलाते रहेंगे तो कंपनियों की बिक्री बढ़ेगी कैसे? कहते हैं एक बार एक टूथपेस्ट कंपनी ने अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए टूथपेस्ट के मुंह को चौड़ा कर दिया था ताकि थोड़ा सा दबाने पर भी ज्यादा पेस्ट निकले, और उसकी बिक्री हैरतअंगेज रूप से बढ़ गई थी. दुनिया में कपड़ों, खाद्य पदार्थों से लेकर हर सामान आज इतने बड़े पैमाने पर बनाया जा रहा है कि किसी भी आदमी को भूखा नहीं सोना पड़ सकता, तन ढकने के लिए कपड़े की कमी नहीं हो सकती. लेकिन क्या आप जानते हैं कि बड़ी-बड़ी नामी कंपनियां सेल में भी अपने जो उत्पाद नहीं बेच पातीं, आखिर में उनका क्या करती हैं? कपड़े वे रद्दी में बेच देती हैं लेकिन फाड़कर, ताकि कोई उन्हें पहन न सके! बड़े-बड़े होटलों-रेस्टाॅरेंट में रात में जो खाना बचता है, उसे मिक्स करके डस्टबिन में डाला जाता है ताकि किसी के खाने के काम न आए!
इसलिए सिर्फ शिखर पर पहुंचे हुए मेटा या मस्क ही दोषी नहीं हैं, ऊपर से लेकर नीचे तक पूरी काॅरपोरेट चेन का ही आज एकमात्र लक्ष्य यही रह गया है कि किस तरह से अपने फायदे के लिए ग्राहक उर्फ आम आदमी की जेब खाली कराई जाए. पुराने लोग मितव्ययिता को गुण मानते थे, आड़े दिनों के लिए कुछ बचत करके रखते थे. आज ‘खूब कमाओ, खूब खर्च करो’ को जीवन का मूलमंत्र बताया जाता है, ‘कर्ज लेकर घी पीने’ की सलाह दी जाती है. तर्क दिया जाता है कि अगर आप खर्च (अर्थात उपभोग) नहीं करेंगे तो अर्थव्यवस्था का चक्र धीमा पड़ जाएगा या रुक जाएगा. लेकिन इस चक्र में फंस कर निचुड़ने वाले आम आदमी का तेल कौन निकाल रहा है (अर्थात मुनाफा कौन हड़प रहा है), इस पर कोई चर्चा नहीं होती!
कहा जा रहा है कि अमेरिका के 29 राज्यों द्वारा दायर मुकदमे में मेटा अगर हार जाता है तो उसे 95 लाख करोड़ रुपए तक जुर्माना देना पड़ सकता है. लेकिन मेटा की इस कारगुजारी से सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के बच्चे प्रभावित हो रहे हैं (भारत में तो बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट - सीएसएएम से जुड़े विज्ञापनों - से भी मेटा के मालामाल होने का आरोप है)! अगर इन सबका मुआवजा देना पड़े तो आंकड़ा कहां तक जाएगा! और इसी तरह अगर आम इंसानों उर्फ उपभोक्ताओं का शोषण करने वाली दुनिया की सारी कंपनियों पर जुर्माना देने की नौबत आए तो मुआवजा राशि के आंकड़े की गिनती क्या सुपर कम्प्यूटर भी कर पाएगा?
(26 अगस्त 2026 को प्रकाशित)

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