चरैवेति-चरैवेति

मैं रोज सुबह से शाम
काम जब वही-वही करके हो जाता बोर
सोचता हूं कई बार चकित होकर
यह धरती रोज लगाती चक्कर सूरज के
धरती के चक्कर रोज लगाता चांद
सूर्य भी जाने किसके चक्कर काटा करता है
क्या नहीं बोर ये सब भी हो जाते होंगे,
मैं तो कुछ दिन में ही घबरा जाया करता
क्या ग्रह-नक्षत्र ये कभी न घबराते होंगे!
पर धरती जब हल्की भी करवट लेती है
भूकम्प हमें तब तहस-नहस कर जाते हैं
सूरज को हल्की-सी भी झपकी आती है
तो धरती हिमयुग में प्रवेश कर जाती है
जब चंदा मामा उद्वेलित हो जाते हैं
हम मानव भी तो ‘लूनाटिक’ हो जाते हैं!

पर परिवर्तन तो रोज कुछ न कुछ
सब में ही आता होगा
वरना धरती पर मानव इतना
विकसित कैसे हो पाता
वैज्ञानिक कैसे यह अनुमान लगा पाते
अरबों वर्षों ही बाद सही
दिन ऐसा भी वह आयेगा
जब सूरज भी बुझ जायेगा
धरती यह मृत हो जायेगी
चंदा मामा तो पहले ही खो जायेंगे!
जब सबकी उम्र नियत है तो
हर बार लगाते चक्कर जो
कुछ तो अंतर आता होगा
पिछले दिन जैसा ही कैैसे
अगला दिन रह जाता होगा!

मैं भी इसलिये नयापन लाने की खातिर
सब तहस-नहस कर जाने से अब बचता हूं
फिर भी हर रोज कदम कुछ आगे बढ़ता हूं
यह समझ गया हूं नियम सृष्टि का
मृत्यु एक झटके में ही हो जाती है
पर जीने में तो सदियां भी लग जाती हैं
करता है जैसे जहर असर तत्काल
नहीं अमृत वैसा कर सकता है
भूकम्प एक क्षण में तबाह कर सकता है
पर धरती मां को तो इंसान बनाने में
जाने कितने ही अरब वर्ष लग जाते हैं
कोयला करोड़ों वर्षों तक सह दाब
अंत में ही हीरा बन पाता है
फिर मैं कैसे इतना अधीर हो सकता हूं!

इसलिये रोज अब चंद कदम भी
पिछले दिन से आगे खुद को पाता हूं
तो उसमें ही खुश होता हूं
मंजिल तो कदम-कदम चलकर ही मिलती है।


रचनाकाल : 14 अगस्त 2026

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