हम लय बिगाड़ कर क्यों सुलझी चीजों को उलझा देते हैं ?
आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में सबसे ज्यादा बच्चे गणित में फेल होते हैं, क्योंकि उसे सबसे नीरस विषय माना जाता है. जबकि श्रीनिवास रामानुजन् जैसे महान गणितज्ञ को गणित में इतना मजा आता था कि दिन-रात उसी में डूबे रहते थे और इस चक्कर में अन्य विषयों में फेल तक हो जाते थे. इससे लगता है कि समस्या शायद गणित विषय के साथ नहीं है, बल्कि उसे पढ़ाने का तरीका नीरस होने पर छात्रों को उससे डर लगने लगता है. रवींद्रनाथ टैगोर के बाल-मन पर अपने शिक्षकों के पढ़ाने के तरीके की ऐसी बुरी छाप पड़ी कि बड़े होकर उन्होंने शांतिनिकेतन जैसी महान शिक्षण संस्था बनाई, जहां विद्यार्थी प्रकृति के सान्निध्य में पढ़ते थे.
कहा जाता है कि किसी काम में मजा आने लगे तो वह काम नहीं रह जाता, शौक या जुनून बन जाता है. लेकिन किसी काम को मजेदार आखिर कैसे बनाया जाए!
क्या आपने कभी सोचा है कि हमारी बोलचाल की भाषा भले ही गद्य हो लेकिन दुनिया के सारे प्राचीन ग्रंथ पद्य में क्यों लिखे गए हैं? क्योंकि वे मन को ज्यादा भाते हैं और जल्दी याद हो जाते हैं. पद्य में शब्द एक लय में बंधे होते हैं, जो सुनने में मधुर लगते हैं. संगीत हमें इसीलिए कर्णप्रिय लगता है क्योंकि वह लयबद्ध होता है और लय में इतनी ताकत होती है कि कहते हैं महान गायक तानसेन दीपक राग गाकर दीपक जला देते थे, राग मेघ मल्हार से पानी बरसा देते थे. उस बांसुरीवाले की कहानी तो जगतप्रसिद्ध है जिसकी बांसुरी की धुन से मंत्रमुग्ध होकर सारे बच्चे उसके पीछे-पीछे चल पड़े थे.
प्रकृति में हर चीज लयबद्ध होती है, जैसे दिन-रात का आना, ऋतुओं का बदलना और सारे जीवों की जैविक घड़ी, जिसे सर्केडियन क्लाॅक कहा जाता है. हर चीज अपने निश्चित समय पर होती है (हालांकि कई चीजें आकस्मिक भी होती हैं जैसे भूकम्प आना, ज्वालामुखी फटना या मौसम का उतार-चढ़ाव, लेकिन प्रकृति के ये विचलन हमेशा नुकसानदेह ही होते हैं). दुर्भाग्य से हम मनुष्य अपने जीवन को अधिकाधिक कृत्रिम बनाते जा रहे हैं और इस चक्कर में अपनी प्राकृतिक लय को खोते जा रहे हैं. चीजें जितनी कृत्रिम होती जाती हैं, उतनी ही बेसुरी लगने लगती हैं. इसीलिए शांतिनिकेतन में बंद कमरों में नहीं, बाहर पेड़ों के नीचे, प्रकृति के सान्निध्य में कक्षाएं लगती थीं. तो क्या छात्रों को खेल-खेल में पीरियॉडिक टेबल याद कराने वाले बेंगलुरु के वायरल शिक्षक की सफलता का राज यही है कि उन्होंने उसे लयबद्ध बना दिया?
मार्ग जितना सुगम होता है, हम उतनी ही लम्बी यात्रा तय कर पाते हैं. लय भी शायद उसी सुगम मार्ग की तरह है, जो रास्ते के कांटों, कंकड़-पत्थरों से बचाते हुए हमें लम्बी दूरी तय करने में मदद करती है. जबकि बेसुरापन हमारी गाड़ी को पटरी से उतार देता है, जिससे उसका आगे बढ़ना दुश्वार हो जाता है और हमारे मन में खीझ, गुस्सा, चिड़चिड़ापन भरने लगता है.
विडंबना यह है कि हम बचपन से ही बच्चों की लय को बिगाड़ने की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं. प्रकृति से जुड़ाव को आवारागर्दी मानते हुए हम उसे नर्सरी, केजी में डालकर किताबों के बोझ से लाद देते हैं जिससे उसमें सहज कौतूहल भाव विकसित ही नहीं होने पाता, वह तोतारटंत बनकर रह जाता है.
दुनिया के किसी भी प्राणी को अपने बच्चों को कृत्रिम तौर पर कुछ भी सिखाना नहीं पड़ता, अपने पूर्वजों के सारे गुण उसे विरासत में मिलते हैं. फिर हम मनुष्य ही अपने बच्चों को प्राकृतिक ढंग से विकसित न होने देते हुए उसे कृत्रिम ज्ञान के बोझ से लादने पर क्यों तुले रहते हैं? और ऐसा करते हुए भी, कुछ सिखाने के लिए लयबद्ध तरीके अपनाने की बजाय इतने भोथरे ढंग से सिखाते हैं कि बच्चे का दिमाग कुंद होकर रह जाता है. शिक्षा को हमने आज ऐसी अंधी दौड़ बना दिया है कि पांचवीं-छठवीं कक्षा से ही कोचिंग क्लास लगाकर, दिन-रात पढ़ाई करते हुए बच्चे आईआईटी/नीट तो क्रैक कर जाते हैं लेकिन कुछ रचनात्मक कर पाने की उनकी क्षमता ही खत्म हो जाती है, जिससे खुद आईआईटी/मेडिकल कॉलेजों की रैंक इतनी गिर जाती है कि दुनिया के सौ सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में भी वे शामिल नहीं हो पाते!
क्या अब समय नहीं आ गया है कि सबसे आगे होने की अंधी दौड़ छोड़कर, अधिकाधिक प्राकृतिक तरीका अपनाकर हम अपने जीवन को लयबद्ध बनाते हुए सुरीले ढंग से जीने की कोशिश करें?
(19 अगस्त 2026 को प्रकाशित)

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