खजाना भरने के लिए नैतिकता को ताक पर रखना कितना उचित ?

 कैंसर से जूझते एक पिता की अपने मासूम बेटे से अंतिम बातचीत का मार्मिक वीडियो हाल ही में वायरल हुआ. वीडियो में पिता कह रहे थे, ‘अगर मैं कहीं चला जाऊं तो मम्मी जो कहे वो मान लेना. मत पूछना कि पापा कहां हैं, अपनी दोनों बहनों का ख्याल रखना...जब भी तुम्हें मेरी याद आए, मैं तुम्हारे आसपास ही रहूंगा...’ उस आदमी को कौन सा कैंसर था, यह तो पता नहीं लेकिन एक यूजर की प्रतिक्रिया थी, ‘कम से कम तंबाकू और शराब का इस्तेमाल तो ज्यादा मत करो. हम जितना हो सके इनसे बचने की कोशिश कर सकते हैं, बाकी तो किस्मत और भगवान की मर्जी है.’ एक दूसरे यूजर का कहना था, ‘किसी भी बेटे या पिता को ऐसी स्थिति नहीं देखनी चाहिए. यह बहुत दुखद है.’ दो माह पहले एक मासूम बच्ची का भी वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह बेहद उदास मुद्रा में खड़ी, अपने पापा की तस्वीर को देखते हुए कहती है, ‘मम्मी आपको मना करती थी ना कि दारू मत पिया करो, फिर आपने क्यों पी? देखो, आज सबके पापा हैं, लेकिन आप दारू पीकर मर गए...’ उस वीडियो ने भी देखने वालों को भावुक कर दिया था. 

उधर बिहार में शराबबंदी खत्म करने की सिफारिश से संबंधित समाचार हाल ही में अखबारों में छपा. खबर शराबबंदी पर नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनाॅमिक रिसर्च (एनसीएईआर) की रिपोर्ट के हवाले से थी, जिसके अनुसार ‘बिहार में शराब पर प्रतिबंध के बाद भी अवैध शराब और अन्य नशीले पदार्थों के सेवन में बढ़ोत्तरी देखी गई है.’ रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि ‘प्रतिबंध के बावजूद भूमिगत वितरण नेटवर्क और तस्करी के कारण अवैध शराब की खपत जारी है. इसलिए बिहार को शराबबंदी खत्म कर देनी चाहिए.’ शराबबंदी खत्म करने के पक्ष में जो दो आर्थिक तर्क दिए गए हैं, उसमें एक यह है कि शराबबंदी हटने पर राज्य के आंतरिक राजस्व स्रोत में 14 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है और दूसरा तर्क शराबबंदी को लागू रखने पर होने वाले सरकारी खर्च से जुड़ा है, जो कि शराबबंदी खत्म कर देने पर बच जाएगा. 

इसमें कोई शक नहीं कि एनसीएईआर की रिपोर्ट में शराबबंदी खत्म करने के पक्ष में जो दो आर्थिक तर्क दिए गए हैं, उनमें काफी दम है. शराब की बिक्री और आबकारी शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) से देश में सभी राज्य सरकारों को मिलाकर सालाना लगभग दो लाख करोड़ रुपए तक का कुल राजस्व प्राप्त होता है, जो राज्यों के अपने कुल कर राजस्व का 10 से 25 प्रतिशत हिस्सा होता है. जहां तक बिहार को होने वाले नुकसान का सवाल है तो एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का कहना है कि आर्थिक व प्रशासनिक मोर्चे पर राज्य को सालाना कुल बीस हजार करोड़ रुपए तक का नुकसान हो रहा है. शराब से आने वाले भारी-भरकम राजस्व का एक बड़ा कारण यह है कि राज्य सरकारें इस पर 45 से 80 प्रतिशत तक टैक्स लगाती हैं, ताकि पीने वाले हतोत्साहित हों. लेकिन शराब का मूल्य बढ़ने के बाद भी राज्य सरकारों के राजस्व में कोई कमी नहीं आती, उल्टे वृद्धि ही होती है, जिससे पता चलता है कि जो शराब के आदी हो जाते हैं वे इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं, सरकार द्वारा टैक्स बढ़ाने के बावजूद पियक्कड़ों की संख्या में कोई गिरावट नहीं आती. 

लेकिन फिर उन वायरल वीडियो का क्या, जिनमें मासूम बच्चों को देखकर लोगों की आंखें भर आ रही हैं! डाॅक्टरों का कहना है कि शराब पीने से सात तरह का कैंसर होता है. इसके अलावा फैटी लिवर और लिवर सिरोसिस जैसी बीमारियां लगातार शराब पीने वाले को बहुत दिन जीने नहीं देतीं. 

शराब की वजह से सिर्फ कुछ बच्चों ने ही अपने पापा को नहीं खोया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल शराब पीने और इसके दुष्प्रभावों के कारण लगभग 26 लाख लोगों की मौत हो जाती है, जो कुल वैश्विक मौतों का लगभग 4.7 प्रतिशत है. अपने पापा को खोने वाले अगर एक-दो मासूम बच्चों का दुख हमें इतना व्यथित करता है तो 26 लाख परिवारों पर क्या बीतती होगी? 

त्रासदी यह है कि एक-दो मौतों के भी वायरल वीडियो हमें जितना व्यथित करते हैं, लाखों मौतों के आंकड़ों से उस पीड़ा का एक अंश मात्र भी महसूस नहीं होता. शायद यही कारण है कि शराबबंदी के कारण होने वाला राजस्व का नुकसान (संभावित लाभ न होने को भी अब नुकसान ही माना जाता है) हमें इतना परेशान करता है कि लोगों को शराब न पीने के लिए जागरूक करने के बजाय हम शराबबंदी को ही खत्म कर देने की वकालत करने लगते हैं! 

वैसे कम तो समाज से हत्या, बलात्कार, चोरी, डकैती जैसे अपराध भी नहीं हो रहे हैं और अन्य ड्रग्स की खपत भी. तो क्या शराबबंदी खत्म करने की वकालत की तरह उन पर भी भारी जुर्माना लगाकर उन्हें वैधता दे दिए जाने की मांग करनी चाहिए? खजाना तो आखिर इस तरीके से भी भरा ही जा सकता है! और शराबबंदी खत्म कर देने के बाद इस तरह के अपराधों में कमी आएगी नहीं, इसलिए खजाना तो लबालब होगा ही. रही बात नैतिकता की, तो उसकी आज चिंता किसे है? उल्टे अगर आप नहीं पीते हों तो क्या पता कल को आप पर कोई यह आरोप मढ़ दे कि आप सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा रहे हैं!

(12 अगस्त 2026 को प्रकाशित)

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