भीतर का न्याय

जीवन में ऐसे अवसर आए कई
बहुत आसानी से सबकी आंखों में
धूल झोंक मैं सकता था
अपराध घोर करके भी लोगों की नजरों में
पाक-साफ रह सकता था
उस समय आत्म-अनुशासन ने ही मेरे, पर
हर बार मुझे नीचे गिरने से बचा लिया
जब कोई देख नहीं सकता था बाहर से
मेरे अंतर्मन ने ही मुझको सजग किया।
इसलिये कौन क्या सोचेगा, अब इसकी मैं
परवाह बहुत कम करता हूं
अपनी नजरों में कभी न गिरने पाऊं बस
कोशिश यह हरदम करता हूं
जो ईश्वर को अन्यायी कह कोसा करते
उनको भी यह समझाता हूं
बस अपने प्रति ईमानदार
रहने की कोशिश किया करो
सब स्वत: ठीक हो जायेगा
हम सिर्फ देख पाते बाहर
इसलिये हमेशा न्याय अधूरा करते हैं
पर ईश्वर हम लोगों के भीतर बैठा है
इसलिये कभी अन्याय नहीं वह करता है।


रचनाकाल : 3 अगस्त 2026


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