सुख फल में नहीं, परिश्रम में

मैं बिना भूख के खाता था जब
स्वाद नहीं छप्पन भोगों में आता था
इसलिये खूब मेहनत करके
पहले मैं अपनी भूख जगाया करता हूं
रूखा-सूखा खाना भी फिर
छप्पन भोगों सा लगता है।

वेतन जब लेता था अग्रिम
बदले में करना काम बाद में
बेहद बोझिल लगता था
अब काम महीने भर करना
उम्मीद बंधाये रखता है
तनख्वाह अंत में बेहद खुशियां देती है।

ईश्वर से भी मैं यही प्रार्थना करता हूं
मेहनत का फल देना या चाहे मत देना
पर बिना किये मेहनत कोई फल मत देना
फल नहीं मिलेगा मेहनत का
तो दाता का सुख पाऊंगा
खैरात मगर लेकर याचक बन जाऊंगा!


रचनाकाल : 29 जुलाई 2026



Comments

Popular posts from this blog

गूंगे का गुड़

सम्मान

उल्लास उधारी का