उधार की सोच कहीं कुंद तो नहीं कर डालेगी हमारा दिमाग !
हाल ही में सामने आई यह खबर बेहद चौंकाने वाली है कि आज के डिजिटल युग में लोग खुद सोचना तक छोड़ रहे हैं और रील्स, टीवी डिबेट देखकर या एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से पूछकर अपने विचार या दृष्टिकोण बना रहे हैं. अभी तक डर यह जताया जाता था कि एआई आधारित रोबोट कहीं इतने शक्तिशाली न बन जाएं कि हम मनुष्यों को पीछे छोड़कर खुद ही फैसले लेने लगें, क्योंकि अगर ऐसा होने लगा तो मशीनें हमारे अधीन नहीं रहेंगी बल्कि हम मनुष्य उनके गुलाम बनकर रह जाएंगे. लेकिन अगर हम इसी तरह सोच-विचार तक करने में आलस करते रहे और एआई पर ही निर्भर होते गए तो एक दिन क्या खुद ही उसके गुलाम नहीं बन जाएंगे?
आज यह चलन सा बन गया है कि सोशल मीडिया पर हमें कुछ भी संवेदनशील सामग्री दिखी तो हम बिना कुछ सोचे-विचारे तत्काल उसे विभिन्न ग्रुपों में फारवर्ड कर देते हैं. अफवाहें पहले भी फैलती थीं लेकिन सोशल मीडिया ने इस काम को इतना आसान बना दिया है कि कभी-कभी तो यह तय करना ही मुश्किल हो जाता है कि हम अफवाहों के युग में जी रहे हैं या हकीकत के! चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ दिनों बाद जब उन अफवाहों का खंडन आता है या हमें हकीकत पता चलती है, तब भी हम अपनी धारणा को बदलने की जहमत नहीं उठाते और अफवाहों को ही सच मानना जारी रखते हैं!
जर्मन तानाशाह हिटलर के प्रचार मंत्री गोएबल्स का मानना था कि किसी झूठ को अगर बार-बार बोला जाए तो समय के साथ लोग उस पर सवाल उठाना बंद कर देते हैं और उसे ही सच मान लेते हैं. शायद इसी हकीकत को भांपते हुए आज कंपनियां एल्गोरिद्म के जरिये, अपने फायदे के लिए ब्रेनवाश करके हमारी विचारधारा गढ़ने के काम में लगी रहती हैं!
जब आप कोई किताब पढ़ते हैं तो दिमाग किताब में लिखे शब्दों के जरिये उस दृश्य की कल्पना करता है, लेकिन जब आप टीवी देखते हैं तो दिमाग काम करना बंद कर देता है और उसमें दिखने वाले दृश्य को ही सच मान लेता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि आज लोगों में जो पढ़ने-लिखने की प्रवृत्ति कम होती जा रही है, उसका भी लोगों को दिमागी रूप से आलसी बनने में योगदान हो! सोशल मीडिया में आज जो भी चीज वायरल होती है, हम में से कितने लोग तह तक जाकर उसकी सच्चाई जानने की कोशिश करते हैं? ऐसा भी नहीं कि हम उससे निरपेक्ष या उदासीन रहते हैं, बल्कि लोगों को भागते देखकर हम भी उस दौड़ में शामिल हो जाते हैं, बिना यह सोचे कि आखिर वे लोग जा कहां रहे हैं! इतना ही नहीं बल्कि उस अंधी दौड़ में अव्वल आने को ही हम अपना लक्ष्य बना लेते हैं!
कहानी है कि एक बंदर रात में बिजली कड़कने की आवाज सुनकर चीखते-चिल्लाते हुए जंगल की तरफ भागा कि ‘भागो, भागो! दुनिया खत्म होने वाली है! आसमान गिर रहा है!’ बंदर की बात सुनकर रास्ते में मिला खरगोश भी बिना कुछ सोचे-समझे उसके साथ भागने लगा. हिरण मिला तो खरगोश ने उससे कहा कि ‘भागो, दुनिया खत्म होने वाली है! आसमान गिर रहा है!’ और वह भी भागने लगा. आगे भालू, हाथी- जो भी मिला, सब उनके साथ भागने लगे. जंगल के राजा शेर ने जब सब जानवरों को भागते देखा तो दहाड़कर उन्हें रोका और इस तरह भागने का कारण पूछा. हाथी ने हांफते हुए कहा, ‘महाराज! दुनिया खत्म होने वाली है, आसमान गिर रहा है.’ शेर ने पूछा, ‘तुम्हें यह किसने बताया?’ हाथी ने कहा, ‘मुझे भालू ने बताया.’ भालू ने हिरण का नाम लिया, हिरण ने खरगोश का और खरगोश ने बंदर का. बंदर ने कहा कि मैंने खुद अपनी आंखों से तेज रोशनी देखी है और आसमान के गिरने की जोरदार आवाज अपने कानों से सुनी है, वहां चल कर आप भी देख लीजिए. जब सब मिलकर वहां पहुंचे तो कुछ झुलसे हुए पेड़ों को देखकर समझ गए कि आसमान नहीं गिरा था बल्कि आसमान से बिजली गिरी थी.
हम मनुष्य भी जब सोच-विचार करना छोड़ देते हैं तो भेड़चाल (कहते हैं भेड़ें इतनी नकलची होती हैं कि जब सामने चलने वाली भेड़ किसी कुएं में गिरती है तो पीछे वाली सारी भेड़ें भी उसी कुएं में गिरती चली जाती हैं) में फंसकर रह जाते हैं. खतरनाक बात यह है कि इसी भेड़चाल का फायदा उठाने की कोशिश निहित स्वार्थी तत्व करते हैं. यह बात अब किसी से छिपी नहीं रह गई है कि आतंकवादी संगठन आम लोगों, विशेषकर युवाओं के ब्रेनवाश के लिए बेहद सोची-समझी और मनोवैज्ञानिक रणनीतियों का उपयोग करते हैं, लेकिन एक-दूसरे के ‘इस्तेमाल’ की प्रवृत्ति आज हर जगह हावी हो चुकी है और कोई नहीं जानता कि कौन, कहां, कब और कैसे उसका ब्रेनवाश करने में लगा हुआ है!
आपके दिमाग ने भी अगर वर्तमान परिस्थितियों से बेचैन होना बंद कर दिया हो (सुविधाभोगी बन गया हो) तो एक बार सोचिएगा जरूर कि कहीं आपका ब्रेनवाश करने की कोशिश तो कोई नहीं कर रहा है! साथ ही इसकी तस्दीक भी कर लीजिएगा कि कहीं आप भी जाने-अनजाने किसी के ब्रेनवाश में तो संलग्न नहीं हैं?
(29 जुलाई 2026 को प्रकाशित)

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