दानवीरों के साथ-साथ कैसे बढ़ती जा रही है दान-चोरों की संख्या ?
मंदिरों में दान देने की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है. भारत में नौ लाख से अधिक पंजीकृत मंदिर हैं. अधिकांश छोटे मंदिरों के पंजीकृत रिकाॅर्ड नहीं होने के कारण सभी मंदिरों की कुल संपत्ति का कोई सटीक आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है लेकिन देश के दस सबसे अमीर मंदिरों के पास कुल मिलाकर नौ लाख करोड़ रु. से अधिक की संपत्ति है. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि सभी मंदिरों के पास कुल मिलाकर कितनी अथाह दौलत होगी.
आखिर ऐसा क्यों होता है कि एक तरफ तो कोई मंदिरों में अपनी कमाई का एक हिस्सा स्वेच्छा से दान करता है और दूसरे को उसे लूटने या चुराने में भी कोई संकोच नहीं होता?
पुराने जमाने में दान लेने को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था और उसे लेने वाला याचक अथवा भिखारी माना जाता था. गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में अगर वशिष्ठजी के मुख से कहलवाया है कि ‘उपरोहित्य कर्म अति मंदा, बेद पुरान सुमृति कर निंदा’ तो उसका कारण शायद यही था कि पूजा-पाठ कराने से मिलनेवाली दक्षिणा को दान लेने के ही समान निकृष्ट माना जाता था. शायद इसीलिए देश के पुराने मंदिरों के पास अथाह दौलत अभी तक बची भी रह गई है, वरना जिस तेजी से आज दान चोरी की घटनाएं उजागर हो रही हैं, पुराने लोग भी अगर नैतिक रूप से दिवालिया हो चुके होते तो यह अकूत खजाना कब का साफ हो गया होता!
लेकिन दान देने वालों की संख्या भी तो आज कम नहीं है! तो क्या दान देने वालों और लेने वालों की समाज में दो अलग-अलग श्रेणियां हैं और उनके बीच कोई अंतर्संबंध नहीं है?
शायद हर मनुष्य के भीतर देवता का भी अंश होता है और दानव का भी; फर्क सिर्फ मात्रा का है. ज्यादातर लोग सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र, महर्षि दधीचि, राजा शिबि, बलि या कर्ण जैसे दानवीर भले ही न हों लेकिन धर्मभीरु अवश्य हैं. अपने दोष-पाप कटने की उम्मीद और सुख-समृद्धि की कामना के साथ वे दान-पुण्य करते हैं. दुर्भाग्य से, जिसे दान चोरी का मौका मिल जाता है वह उसे ही अपनी सुख-समृद्धि का मार्ग समझ लेता है और शुरुआती झिझक खुल जाने के बाद उस मार्ग पर अंधाधुंध दौड़ने लगता है.
बहुत से मंदिरों में मनोकामना पूर्ति के लिए धागा बांधने की परंपरा होती है और उन धागों की संख्या देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि लोग वहां किस भाव से आते हैं. विवेकानंद के बारे में कहानी है कि पिता के निधन के बाद जब उन्होंने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से परिवार के गंभीर आर्थिक संकट की शिकायत की तो उन्होंने कहा कि वे खुद जाकर मां काली से सुख-संपदा क्यों नहीं मांग लेते. लेकिन जब वे मां के सामने गए तो कुछ मांगना ही भूल गए. दुबारा भी यही हुआ. गुरुजी ने जब तिबारा भेजा तो उन्हें मांगने की बात तो याद रही लेकिन मां से तुच्छ भौतिक संपदा मांगते हुए बेहद शर्म आई और वे केवल मां की भक्ति मांग पाए.
हममें से कितने लोग आज भगवान के सामने जाने पर इतने प्रेममग्न हो पाते हैं कि अपनी मनोकामना ही भूल जाएं? और अगर याद भी रहे तो उसे मांगते हुए शरमाएं!
कई दशक पहले कुछ लोग आशंका जताते थे कि आधुनिकता बढ़ने के साथ ही समाज से धार्मिकता धीरे-धीरे गायब हो जाएगी. इसके उलट आज हम देख रहे हैं कि लोगों में धार्मिकता तो बढ़ती जा रही है लेकिन दुर्भाग्य से नैतिकता खत्म होती जा रही है. शायद इसी का असर है कि एक तरफ तो हम दान-पुण्य भी खूब कर रहे हैं और दूसरी तरफ मौका मिलते ही उस पर हाथ साफ करने से भी संकोच नहीं कर रहे! कभी रहा होगा वह समय जब लोग दौलत के लिए अपनी मेहनत पर भरोसा करते थे और मंदिर सिर्फ निष्काम भाव से प्रार्थना करने के लिए जाते थे. आज तो अपराधबोध से बचने के लिए हम अपनी दो नंबर की कमाई में से भगवान को रिश्वत देने की कोशिश भी करते हैं. ईश्वर को कमीशनखोर समझते हुए उससे सौदा करते हैं कि अगर वह हमें इतना देगा तो हम उसे इतने प्रतिशत चढ़ावा चढ़ाएंगे!
समाज में बढ़ते धार्मिक कर्मकांड दिखाते हैं कि आधुनिक होने के बाद भी हम मनुष्य भीतर से डरे हुए हैं. लेकिन अपनी धार्मिकता को अगर हम नैतिकता से जोड़ने की कोशिश नहीं करेंगे तो समाज का हश्र इसके अलावा और क्या हो सकता है कि एक तरफ तो दान देने वालों की संख्या भी बढ़ती रहे और दूसरी तरफ दान-चोरों की भी!
(22 जुलाई 2026 को प्रकाशित)

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