सहानुभूति की शक्ति

मुझसे लोगों के कष्ट न देखे जाते थे
हरसम्भव कोशिश करता सुखी बनाने की
इस चक्कर में पर भीतर से
कमजोर लोग हो जाते थे
सहृदयता मेरी उनकी खातिर
निर्दयता बन जाती थी
प्रतिकूल परिस्थितियों को झेल न पाते थे।

इसलिये नहीं अब दु:ख उनके
कम करने की कोशिश करता
उनसे भी ज्यादा कष्ट स्वयं
स्वेच्छा से भोगा करता हूं
मेरे आगे उनके दु:ख की
छोटी लकीर जब दिखती है
तो सम्बल उनको मिलता है
दु:ख-कष्टों को आसानी से सह पाते हैं
भीतर से बनते जाते हैं मजबूत
मुझे भी अपने संग
मजबूत बनाते जाते हैं।


रचनाकाल : 16 जुलाई 2026


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