असली जीत

मैं जिद्दी इतना ज्यादा हूं
गुस्सा हो जाऊं अगर किसी से
सालों तक बिन बोले भी रह सकता हूं
पर कुछ ही क्षण में लगता है
जीवन तो चार दिनों का है
गुस्से की मेरे जीत भले ही हो जाये
पर समय बीत जो जायेगा
क्या फिर से वापस आयेगा?
इसलिये मान लेता हूं हार तुरंत
विरोधी के आगे झुक जाता हूं
जब जीत भरोसा लेता हूं
मनवाना अपनी बात सरल हो जाता है।
हम बनकर मित्र किसी का
जो भी चाहे करवा सकते हैं
फिर क्यों शत्रुता निभाकर
सबकुछ तहस-नहस कर देते हैं?


(रचनाकाल : 9-10 जुलाई 2026)


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