आर्थिक असमानता : हल तो बहुत सरल है, लेकिन घंटी बांधे कौन ?

 दुनिया में आर्थिक असमानता से पैदा हुई समस्याओं के हल के लिए हाल ही में पेरिस स्थित वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब ने अपनी ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट में एक सरल उपाय सुझाया है. रिपोर्ट का कहना है कि एक प्रतिशत सुपर-रिच पर अतिरिक्त टैक्स लगा दिया जाए तो दुनिया की 99 प्रतिशत आबादी की समस्याओं को सुलझाया जा सकता है. यह टैक्स भी इतना अधिक नहीं होगा कि अति-अमीरों की कमर ही तोड़ दे. इसके अनुसार 20 लाख डाॅलर (लगभग 19 करोड़ रुपए) से अधिक संपत्ति वाले हर व्यक्ति को धन-कर देना होगा जो एक प्रतिशत प्रति वर्ष से शुरू होगा और धीरे-धीरे बढ़कर उन लोगों के लिए 20 प्रतिशत तक हो जाएगा जिनकी संपत्ति 50 करोड़ डाॅलर से अधिक है. 

योजना तो बहुत अच्छी है, दिक्कत सिर्फ यही है कि इसे क्रियान्वित कौन करेगा? निश्चित रूप से किसी भी देश के सत्ता संचालन के सूत्र गरीबों के हाथ में नहीं होते और अमीरों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारेंगे. कहानी है कि एक बार बिल्ली से त्रस्त चूहों की सभा हुई. इसमें उपाय सुझाया गया कि बिल्ली के गले में एक घंटी बांध दी जाए ताकि वह जहां भी जाए, घंटी की आवाज सुनकर चूहे पहले ही सतर्क हो जाएं. प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया लेकिन बात यहां आकर अटक गई कि घंटी बांधे कौन? इसी तरह अमीरों से टैक्स वसूलने की योजना तो बहुत अच्छी है, पर उनसे टैक्स वसूले कौन? 

समाज से आर्थिक असमानता दूर करने का दूसरा उपाय यह है कि दुनिया के एक प्रतिशत सुपर-रिच भले ही एक प्रतिशत भी टैक्स न दें लेकिन 99 प्रतिशत आबादी का शोषण करना भर बंद कर दें, तब भी आर्थिक असमानता की खाई को काफी हद तक पाटा जा सकता है. बेशक, दुनिया के अमीर सिर्फ आम आदमी का हक मार कर ही पैसा नहीं कमाते, बल्कि वे प्राकृतिक संसाधनों से मुनाफा कमाने के लिए सत्ताधीशों से पर्यावरण संबंधी नियमों को भी कमजोर करवाते हैं. लेकिन इसके परिणामस्वरूप जो पर्यावरण प्रदूषण होता है उसका खामियाजा आम नागरिकों को ही भुगतना पड़ता है, अमीर तो अत्याधुनिक तकनीक के बल पर दुष्प्रभाव से बच निकलते हैं. प्रदूषण से निपटने के लिए दुनिया में लंबी-चौड़ी योजनाएं बनाई जाती हैं, विशाल बजट का प्रावधान किया जाता है लेकिन कोरोना-काल ने दिखा दिया है कि हम मनुष्य सिर्फ प्रदूषण फैलाना बंद कर दें तो प्रकृति में अपने आप निखार आ जाएगा. इसी तरह अमीर सिर्फ शोषण करना बंद कर दें तो गरीबी अपने आप कम हो जाएगी.

बहरहाल, एक प्रतिशत सुपर-रिच की ‘रिचनेस’ थोड़ी कम करना क्या व्यावहारिक रूप से संभव है?

यह बात सोचना जितना सरल है, उसे क्रियान्वित करना उतना ही कठिन. परीक्षा में सौ प्रतिशत या उसके आसपास नंबर कुछ ही छात्र ला पाते हैं लेकिन लक्ष्य सभी छात्रों का यही होता है. अगर हम एक प्रतिशत सुपर-रिच के पर कतरने की कोशिश करेंगे तो 99 प्रतिशत आबादी क्या लक्ष्यविहीन नहीं हो जाएगी? आखिर आदर्श तो सब अपने सामने सुपर-रिच का ही रखते हैं! बेशक हर समाज में कुछ बुद्धिजीवी ऐसे होते हैं जो समानता का स्वप्न देखते हैं और जब उनकी संख्या ज्यादा हो जाती है तो रूस-चीन जैसी साम्यवादी व्यवस्थाओं का जन्म होता है. लेकिन उनका साथ देने वाले ‘सर्वहारा’ वर्ग की हालत जब थोड़ी सुधरने लगती है तो उसका क्रीमी लेयर पाला बदल कर सुपर-रिच के क्लब में शामिल होने के सपने देखने लगता है. इस तरह बाहर से थोपी गई व्यवस्था का एक न एक दिन ढहना पहले से ही तय होता है. हकीकत यह है कि विचारधारा के स्तर पर अमीरों-गरीबों के बीच कोई फर्क नहीं होता, बात सिर्फ मौके की होती है. जब तक हमारे पास दौलत नहीं आती तब तक हमें गरीबों के हित-साधन की चिंता रहती है लेकिन पैसा आते ही हम अमीरों के नजरिये से सोचने लगते हैं. ठीक वैसे ही जैसे ट्रेन के प्लेटफाॅर्म पहुंचने पर जब बोगी का दरवाजा बंद मिले तो हम भीतर बैठे यात्रियों पर चिल्लाते हैं कि ट्रेन क्या उनके बाप की है! लेकिन एक बार भीतर आ जाने के बाद, अगले स्टेशन पर हम भी दरवाजा बंद करने वालों की जमात में शामिल हो जाते हैं ताकि बोगी में भीड़ ज्यादा न बढ़ जाए! 

लेकिन धन कमाना या सुख-समृद्धि हासिल करना तो प्राचीन काल से ही मनुष्यों का लक्ष्य रहा है, फिर आज हम उसे गलत कैसे ठहरा सकते हैं? 

दरअसल दौड़ जब नियम-कायदों का पालन करते हुए जीती जाए तो वह खुशी और सुकून देती है लेकिन बेईमानी से जीतने पर भय और असंतोष पैदा करती है. इसीलिए हमारे पूर्वजों ने साधन की शुचिता पर बल दिया था, जिनका पालन करके धन कमाने वालों को ही प्रतिष्ठा हासिल होती थी. जुआ-सट्टा खेलने वालों को तो दूर, सूदखोरों तक को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था. दुर्भाग्य से आज हमने ‘पूंजी’ को आवारा बना दिया है, जिससे पूंजीपति उसके खो जाने के भय से डरा रहता है और निर्धन अपने जीवन की बुनियादी जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पाने से असंतुष्ट रहता है. लेकिन नैतिकता के बंधन से तो दोनों ने खुद को मुक्त कर रखा है (लाॅटरी लगने या बिना मेहनत के मिलने वाले धन को लपकने को दोनों तैयार रहते हैं)! ऐसे में एक प्रतिशत सुपर-रिच वाली बिल्ली के गले में घंटी बांधे भी तो कौन? 


(15 जुलाई 2026 को प्रकाशित)

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