अंधी दौड़

हम जाग रहे या सपना कोई देख रहे
कुछ भी तो समझ नहीं आता
पर दौड़ अनवरत जारी है।
है नहीं किसी को पता कहां हम जायेंगे
पर पिछड़ न जायें, इस डर से
ज्यादा से ज्यादा तेज दौड़ते जाते हैं
रफ्तार मगर बढ़ती जितनी
डर उतना बढ़ता जाता है
उतना ही होकर बदहवास
हम और दौड़ते जाते हैं!
जो ब्रेक लगाकर कभी रखे थे पुरखों ने
हमने उनको बाधाएं समझ निकाल दिया
नैतिकताओं को दकियानूसी कहकर
स्पीड-ब्रेकरों को तो हमने तोड़ दिया
पर नये बैरियर स्वयं न कोई बना सके
जीवन को अपने अनुशासन में रख न सके
अब बेलगाम यह दौड़ डराती जाती है
दुर्घटना का अंदेशा बढ़ता जाता है।


(रचनाकाल : 8 जुलाई 2026)


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