अपराधी से नहीं जनाब, अब प्रतिष्ठित लोगों से डर लगता है !
ये दोनों हाईप्रोफाइल मामले बहुचर्चित हुए, लेकिन अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि इस तरह की ढेरों घटनाएं इन दिनों सामने आ रही हैं, जिनमें अपराध ऐसे लोग कर रहे हैं जो पेशेवर अपराधी नहीं हैं. बाहर से शांत दिखने वाले लोग भीतर से कितना उबल रहे हैं, इसका कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता. मुंबई लोकल के एक फर्स्ट क्लास डिब्बे में भारी बारिश के दौरान सिर्फ दरवाजा बंद करने को लेकर हुई बहस में एक व्यक्ति ने दूसरे की चाकू मारकर हत्या कर दी. नवी मुंबई के एक सरकारी आंगनवाड़ी केंद्र में एक बच्ची की बुरी तरह से हुई पिटाई के वायरल वीडियो के बारे में पता चला कि दो साल की बच्ची को लातों-घूसों से पीटने वाली उसकी मां ही थी. मेरठ में मुस्कान रस्तोगी नाम की महिला ने अपने प्रेमी साहिल शुक्ला के साथ मिलकर अपने ही पति सौरभ राजपूत की बेरहमी से हत्या कर दी. पूर्व माॅडल और एक्ट्रेस त्विषा शर्मा की मौत की मिस्ट्री ने भी खूब सुर्खियां बटोरीं. नई दिल्ली में एक ऐसे व्यक्ति को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसने कतार तोड़कर जलेबी देने से मना करने पर दुकानदार की गोली मार कर हत्या कर दी थी. अदालत ने मृत्युदंड नहीं देने का कारण यह बताया कि वह व्यक्ति आदतन अपराधी नहीं था. अयोध्या में रामलला के मंदिर से करोड़ों रुपयों की चंदा चोरी के आरोपी भी समाज के प्रतिष्ठित लोग हैं. कुछ माह पहले ढोंगी बाबा अशोक खरात के मामले ने समाज के बहुत से प्रतिष्ठित चेहरों को बेनकाब किया था. अमेरिका की कुख्यात एपस्टीन फाइल्स में तो दुनिया की इतनी बड़ी-बड़ी हस्तियों के नाम सामने आए हैं कि अब नैतिकता की बात तक करना बेमानी लगने लगा है.
तो क्या पुलिस और खुफिया एजेंसियों को अब आदतन अपराधियों को ही नहीं, समाज के प्रतिष्ठित लोगों को भी शक की निगाह से देखना चाहिए?
गिरावट जीवन के हर क्षेत्र में जारी है. राजनीति में इन दिनों पाला बदलने का खेल इतने जोर-शोर से चल रहा है कि लग रहा है ‘आयाराम...’ के नाम से बदनाम हो चुके ‘गयाराम’ की छवि भविष्य में खलनायक की बजाय कहीं नायक की न बन जाए! इतने करीबी लोग दगा दे रहे हैं कि वफादारी शब्द से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है. मजे की बात यह है कि इसके बाद भी बाकी लोग खुद को पाक-साफ मानकर नव-अपराधियों की लानत-मलामत में जुटे हुए हैं. लेकिन उनमें से कितने लोग अपने दिल पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि अपने उन गिर चुके भाई-बंदों की तरह मौका मिलने पर या वैसी परिस्थिति सामने आने पर वे अपने आप को गिरने से बचा पाएंगे?
यह कहना शायद अतिशयोक्तिपूर्ण लगे कि आज समाज में अधिकांश लोग सिर्फ इसलिए निरपराधी बने हुए हैं क्योंकि उन्हें अभी तक अपराध करने का मौका नहीं मिला है, लेकिन हकीकत यही है. अपराधी होने की परिभाषा आज यह नहीं रह गई है कि आपने कोई गलत काम किया है. अपराध का मतलब आज यह है कि गलत काम करते हुए आपने इतनी चालाकी नहीं बरती कि उसे उजागर होने से रोक पाएं. सरल शब्दों में कहें तो अपने अपराध को छिपा पाने लायक होशियारी अगर आपके भीतर नहीं है तो आप अपराधी हैं.
कहानी है कि एक बार एक व्यक्ति की जब दुर्योगवश नाक कट गई तो जगहंसाई से बचने के लिए वह दावा करने लगा कि नाक कटने के बाद से उसे भगवान नजर आने लगे हैं. जब कोई व्यक्ति उसके झांसे में आकर अपनी नाक कटवा लेता तो वह उसके कान में मंत्र फूंकता कि नकटे तो अब तुम हो ही चुके हो, इसलिए तुम भी कहना शुरू कर दो कि तुम्हें भगवान दिखाई देते हैं, वरना लोग तुम पर हंसेंगे. इस तरह नकटों का एक बहुत बड़ा समुदाय तैयार हो गया.
राजनीति में भी निहित स्वार्थों के लिए अपनी रीढ़ की हड्डी गंवा चुके दिग्गज नेता नौसिखिये नेताओं को यह गुरुमंत्र देते हैं कि तुम्हारे विकास में यह हड्डी बहुत बड़ी रुकावट है, इसलिए अगर इसे निकलवा दो तो खूब तरक्की करोगे...और इस तरह राजनीति में रीढ़विहीन नेताओं की भरमार होती जा रही है.
बहरहाल, समाज में सफेदपोश अपराधियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह आशंका निराधार नहीं कही जा सकती कि निकट भविष्य में आपको आदतन अपराधियों से कहीं ज्यादा डर पास-पड़ोस के अपने जैसे ही भाई-बंदों से लगने लगे!
...और तब कुछ पल के लिए ठहरकर यह जरूर सोचिएगा कि कहीं आपसे भी तो किसी को डर नहीं लग रहा है?
(8 जुलाई 2026 को प्रकाशित)

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