पुरुषों के परजीवी होने का खामियाजा उठाती महिलाएं
हम मनुष्यों में कामचोरी की प्रवृत्ति कदाचित प्राचीन काल से ही रही है. मनुष्येतर जीवों से अधिक चालाक होने का फायदा हमने हमेशा अपनी सुख-सुविधाओं को बढ़ाने में ही उठाया है. आखिर जब दुनिया के सारे जीव-जंतु लगभग आत्मनिर्भर होकर अपना जीवन गुजारते हैं तो क्या हम मनुष्य भी दूसरों का शोषण किए बिना अपना काम नहीं चला सकते थे! लेकिन अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता का दुरुपयोग हमने दूसरों का शोषण करने के लिए किया. जब तक हम ‘जंगली’ थे, तब तक तो कंदमूल-फल और शिकार के जरिये अपना उदर-पोषण किया, जब ‘सभ्य’ बनना शुरू किया तो अपने फायदे के लिए गाय-बैलों को पालतू बनाने लगे. बछड़ों का हक छीनकर हम खुद गायों का दूध पीने लगे और बैलों से खेतों में काम लेने लगे.
दूसरे कबीलों या समुदायों की संपत्ति हड़पने के लिए होने वाले युद्धों में हारने वाले पक्ष को अपना दास या गुलाम बनाकर उनसे काम लेने लगे. ऐसा नहीं है कि 'सही-गलत' का हमें बोध नहीं था, लेकिन अपनी स्वार्थपरता के चलते हम अपने ही द्वारा किए जाने वाले अन्याय से आंखें चुराने लगे. नतीजतन हमारा दिमाग हमारे स्वार्थ के ही हिसाब से सोचने और जिस चीज में हमारा फायदा हो उसे सही ठहराने का आदी होने लगा. धीरे-धीरे हमारी संकुचित होती मनोवृत्तियों का असर यह हुआ कि अपने ही कोमल अर्धांग अर्थात नारी जाति को भी हम अपना गुलाम समझने लगे. हजारों वर्षों के इस दमन का ही परिणाम है कि हमेशा लड़ाई-झगड़ों में उलझे रहने वाले पुरुष हिंस्र बल में भले ही आगे हों लेकिन सहनशीलता और सेवाभाव में वे महिलाओं के आगे कहीं नहीं ठहरते.
यह सही है कि पिछले कुछ सौ वर्षों में हम मनुष्य पहले के मुकाबले कुछ अधिक न्यायप्रिय नजर आने लगे हैं, दासप्रथा का दुनिया से लगभग खात्मा हो गया है, खेतों में काम लेने के लिए बैलों को अब ज्यादा प्रताड़ित नहीं किया जाता और महिलाओं को दोयम दर्जे का नहीं समझा जाता. लेकिन यह सब इसलिए नहीं है कि हम पहले से कहीं अधिक संवेदनशील हो गए हैं, बल्कि इसलिए कि औद्योगिक विकास और तकनीकी क्रांति ने हमें धरती के खनिज संसाधनों के दोहन के रूप में शक्ति या ऊर्जा का एक प्रचुर स्रोत दे दिया है. अब हमें अपनी सेवा के लिए दासों की जरूरत नहीं है क्योंकि अत्याधुनिक विकास ने लग्जरी के सारे सामान उपलब्ध करा दिए हैं. खेत जोतने के लिए अब हमें बैलों की जरूरत नहीं है क्योंकि ट्रैक्टर हमारे सारे कृषि कार्य निपटा देता है. महिलाओं के लिए दिनभर चूल्हे-चौके में भिड़े रहना आवश्यक नहीं है, क्योंकि मशीनें अब किचन के अधिकांश कार्य संपन्न कर लेती हैं.
लेकिन मानसिकता या मनोवृत्ति तो हमारी अभी भी वही पहले वाली ही है! दास प्रथा भले ही खत्म हो गई हो लेकिन तकनीकी क्रांति का फायदा राजा-महाराजाओं की मनोवृत्ति वाले कुछ चुनिंदा लोग ही हड़प लेना चाहते हैं, इसीलिए युवाओं में बेरोजगारी फैली है, निरुपयोगी होने से गाय-बैल गांवों में मारे-मारे फिर रहे हैं और महिलाओं के व्यक्तित्व का विकास होने से दाम्पत्य जीवन खतरे में पड़ता जा रहा है. यह सच है कि अमेरिका जैसे देश, जिसके पास ‘सभ्यता’ की गहरी जड़ें नहीं हैं, की तुलना में एशियाई या लैटिन अमेरिकी देशों की महिलाएं अभी भी ज्यादा सेवाभावी और पारम्परिक हैं लेकिन उनमें भी स्वतंत्र व्यक्तित्व का विकास होने लगा है, जिससे पुरुषवादी मानसिकता को चोट पहुंचने लगी है. चूंकि अधिकतर पुरुषों को पत्नी के नाम पर एक ‘सेवादार’ की ही तलाश रहती है इसलिए विवाह संस्था खतरे में पड़ने लगी है.
सुख-सुविधाओं के लिए अपनी मनोवृत्ति को संकुचित करने की जो शुरुआत हमने हजारों वर्ष पहले की थी, वह शायद अपने उच्चतम शिखर पर पहुंच चुकी है क्योंकि धरती के संसाधनों का अतिशय दोहन अब जलवायु परिवर्तन के रूप में पलटवार करने पर आमादा है. हालात को शायद अभी भी विस्फोटक होने से बचाया जा सकता है, लेकिन विकास के वर्तमान चक्र को उल्टा घुमाकर क्या हम अपनी मनोवृत्ति को उदार बनाने की शुरुआत करने को तैयार हैं?
(1 जुलाई 2026 को प्रकाशित)

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