अमृत-मंथन


अमृत सागर के भीतर सिर्फ नहीं होता
हर मानव के भीतर अच्छाई होती है
बाहर लाने को खुद को मथना पड़ता है
यह सच है पहले विष ही निकला करता है
पर उसको जो सच मान, वहीं रुक जाते हैं
भीतर के अमृत को न कभी वे पाते हैं।

है नीलकण्ठ सी शक्ति नहीं मेरे भीतर
सारी दुनिया को ‘कालकूट’ से बचा सकूं
पर आसपास के लोग बुरे जो दिखते हैं
उनकी कमियों के प्रति सहृदयता रखता हूं
अपनी कमियों के किस्से उन्हें सुनाता हूं
मुझ जैसा बनने की कोशिश वे करते हैं।

सच तो यह है अपनी कमियों से लड़कर मैं
आगे बढ़ने की कोशिश हरदम करता हूं
सब लोग मुझे अपने जैसे ही दिखते हैं
उनकी कमियां अपनी कमियों सी लगती हैं
प्रोत्साहन पाकर कोई आगे बढ़ता है
तो मुझको लगता है मैं आगे बढ़ता हूं।

रचनाकाल : 18 जून 2026

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