प्रेम परिष्कृत करता है, फिर क्यों निकृष्ट बनकर ही रह जाते हैं हम !

 युवाओं के आक्रोश और असंतोष को भुनाने के लिए ‘काॅकरोच पार्टी’ का गठन होने के बाद, अब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने ‘इश्क करो पार्टी’ नामक एक नए प्लेटफाॅर्म का ऐलान किया है. उन्होंने युवाओं से इसे ज्वाइन करने की अपील करते हुए ‘मेक लव, नाॅट वार’ अर्थात ‘युद्ध नहीं, प्रेम करो’ का नारा दिया है.

हालांकि जस्टिस काटजू की इस पार्टी का कोई औपचारिक मेनिफेस्टो या संगठन ढांचा सामने नहीं आया है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि युद्धों की विभीषिका से जूझती दुनिया में प्रेम अब हमारे लिए शौक की चीज नहीं बल्कि अस्तित्व का सवाल बन गया है. दुनिया में कौन ऐसा इंसान होगा जो प्रेम नहीं बल्कि नफरत करना चाहता हो! लेकिन ‘इश्क’ शब्द से आज हमारे मन में जो तस्वीर बनती है, क्या वह सचमुच इतनी निर्मल है कि हर कोई बिना किसी झिझक के इस पार्टी में शामिल हो सके? हकीकत शायद यह है कि आज प्रेम को भी हमने इतना सस्ता और सड़कछाप बना दिया है कि उसी धारणा के चलते ‘इश्क करो पार्टी’ समाज में किसी गंभीर विमर्श का केंद्र बनने के बजाय मजाक का विषय बन कर रह गई है और सोशल मीडिया में उस पर मीम्स की बाढ़ आई हुई है.
यह सच है कि प्रेम के बिना जीवन सम्भव नहीं है. मां अगर बच्चे के जन्म लेते ही पूरे प्रेम से उसकी देखभाल न करे तो बच्चा शायद बच ही न पाए. भाई-बहनों के बीच अगर प्रेम न हो तो हर घर युद्ध का अखाड़ा बन जाए. हालांकि यह भी सच है कि प्रेम का दायरा संकुचित होते जाने के कारण हमारी ‘घर’ की परिभाषा में अब चाचा-चाची, दादा-दादी के लिए स्थान नहीं रह गया है (बीमा कंपनियां भी पत्नी-बच्चों को ही परिवार मानती हैं, माता-पिता को नहीं). शायद इसी संकीर्णता के चलते प्रेम की हमारी परिभाषा व्यक्ति केंद्रित होकर रह गई है और शुद्ध या नि:स्वार्थ होने की बजाय उस पर लेन-देन की भावना हावी होती जा रही है.
सवाल यह भी है कि प्रेम का किसी पार्टी से क्या संबंध हो सकता है? क्या पार्टी ज्वाइन करने से किसी के मन में प्रेम उत्पन्न हो जाएगा और नहीं करेगा तो नहीं होगा? जस्टिस काटजू का मानना है कि गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण और सामाजिक असमानता जैसी भारत की गंभीर समस्याओं को केवल आपसी एकता और सकारात्मक सोच से ही हल किया जा सकता है, राजनीतिक खींचतान से नहीं. लेकिन राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी क्या खुद को आसानी से दरकिनार होने देंगे? उनकी दुकान ही जिन मुद्दों पर राजनीति से चलती है, क्या वे उन्हें सरलता से सुलझने देंगे? और फिर क्या गारंटी है कि ‘इश्क...’ के नाम पर बनी पार्टी से जिनकी राजनीति चमकने लगेगी वे भी शातिर राजनेता नहीं बन जाएंगे!
समस्या दरअसल यह नहीं है कि राजनीति में गलत लोग घुसे हुए हैं और उनकी जगह दूृसरों को ले आएं तो सबकुछ सही हो जाएगा. समस्या यह है कि राजनीति वह काजल की कोठरी बन चुकी है जिसके भीतर जो भी जाता है, दाग लेकर ही लौटता है. इसलिए जरूरत काजल की कोठरी अर्थात राजनीति को स्वच्छ बनाने की है और इसके लिए प्रेम से बढ़कर प्रभावी और कोई डिटर्जेंट नहीं हो सकता. लेकिन प्रेम के नाम पर पार्टी बनाना जितना आसान है, प्रेम के बल पर राजनीति या समाज को बदलने की कोशिश करना उतना ही कठिन, क्योंकि इसके लिए पहले अपने आप को बदलना पड़ता है. कुछ भ्रष्टाचारी नेताओं को समाज की अधोगति करने के लिए हम कितना भी कोसें लेकिन हम में से कितने लोग अपने दिल पर हाथ रखकर यह दावा कर सकते हैं कि उन नेताओं की तरह मौका मिलने पर हम खुद भी वैसे ही भ्रष्टाचारी नहीं बन जाएंगे? गांधीजी जब अंग्रेजों से लड़ने का आह्वान करते थे तो पूरा देश उनके पीछे खड़ा हो जाता था लेकिन जब समाज सुधार के रचनात्मक कार्यक्रमों की बात करते तो मुट्ठी भर लोग ही उन्हें इस काम के लिए मिल पाते थे. इसी तरह प्रेम के नाम पर पार्टी बनाने पर उसमें शामिल होने के लिए तो शायद बहुत  से लोग मिल जाएंगे लेकिन जिन बुराइयों को हम समाज से इसके जरिये दूर करना चाहते हैं, बात जब उन बुराइयों को पहले अपने भीतर से दूर करने की आएगी, तब शायद बहुत कम लोग ऐसा करने का साहस जुटा पाएंगे. प्रेम एक ऐसी आग के समान होता है जिसमें पहले हमें खुद तप कर शुद्ध होना पड़ता है, इसके बाद ही हम उसके जरिये समाज के बदलने की उम्मीद रख सकते हैं. कविता ‘प्रेम परिष्कृत करता है’ इसी बात को ज्यादा बेहतर ढंग से व्यक्त करती है -
किस्मत से किसी को दुनिया में
कोई चाहने वाला मिलता है
तुमको भी अगर कोई मिल जाए
तो खुद को पावन कर लेना
गंगाजल जैसा मन को निर्मल कर लेना.

यह आग नहीं कोई साधारण
कर लेता है जो अग्निस्नान
कुंदन की तरह दमकता है
तुम भी सब कचरा जला
स्वयं को सोना खरा बना लेना.

तुमको शायद अहसास न हो
क्या वस्तु तुम्हें अनमोल मिली
तुम मोल चुका न सकोगे कभी
देकर समाज को अधिकाधिक
हो सके तो ब्याज चुका देना.

जस्टिस काटजू की ‘इश्क करो पार्टी’ की अवधारणा तो सुंदर है पर इसमें शामिल होने वाले क्या पहले अपनी अग्निपरीक्षा देने को तैयार हैं? ‘आग के दरिया’ में डुबकी लगा पाने की उनकी क्षमता पर ही ‘इश्क करो पार्टी’ का भविष्य निर्भर करता है.  


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