कल्पना और हकीकत
जब नहीं चांद पर पहुंचे थे हम
चंदा मामा बहुत सुहाने लगते थे
सच लेकिन उनका जान
कहीं कुछ मूल्यवान अत्यंत चीज तो
हमने नहीं गंवा डाली!
पशु-पक्षी, पौधे-पेड़ और इंसान सभी
आपस में बातें करते हैं
जब पढ़ते थे ये कहानियां
वे मंत्रमुग्ध कर देती थीं
जब से लेकिन यह पता चला
वे सिर्फ कल्पनाएं ही थीं
क्या नहीं उन दिनों की तुलना में
जीवन थोड़ा नीरस, बोझिल लगता है!
हर एक आदमी के भीतर
दस-बीस आदमी होते हैं
यह निदा फ़ाज़ली कहते हैं
फिर सच के क्यों हो सकते रूप अनेक नहीं
जिस तरह देखते-सुनते हैं हम दुनिया को
सब जीव-जंतु भी क्या वैसे ही
सुनते और देखते हैं?
सपने यदि नहीं जरूरी होते जीवन में
तो क्यों रातों को सोते समय देखते हम
अब कौन फैसला करे
कि दिन की दुनिया ही सच है, रातों की झूठी है
क्या पता कि दोनों ही सच हों
क्यों नहीं संतुलन दोनों में हम रखते हैं!
रचनाकाल : 14 जून 2026
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