पत्थर भी पिघलते हैं

मुझको सब लोग डराते थे
यदि दरियादिली दिखाओगे
तो दुनिया तुमको ठग लेगी
चमड़ी मोटी यदि नहीं करोगे
मार-मार कर पत्थर घायल कर देगी।
फिर भी मैंने अनसुना किया
सबके ऊपर विश्वास किया
पहने न कवच-कुण्डल
सबसे दिल खोल मिला।
बेशक वैसे भी लोग मिले
डर जैसा लोग दिखाते थे
पर कुछ ऐसे भी लोग मिले
जिनसे मिल बेहद खुशी मिली
खुश उतने वे भी लोग हुए
सब बुरे नहीं हैं, उनसे मिलकर मुझे लगा
उनको भी मुझसे मिलकर बिल्कुल यही लगा।
ऐसे लोगों की खातिर मैंने ठान लिया
जो लूटा करते हैं
उनकी खातिर मैं लुट भी सकता हूं
अनहित का बदला हित करके दे सकता हूं
बस इसी तरह से दुनिया को
थोड़ा बेहतर कर सकता हूं।
जैसे ही मैंने ऐसा करना ठान लिया
अद्‌भुत है, जिनको बुरा समझता था पहले
मन परिवर्तित उनका भी होना शुरू हुआ
शायद उनको था ठगा किसी ने
इसीलिए ठगहार बने
पत्थर सहकर ही कभी जमाने के अपने
वे पत्थरदिल बन, लगे मारने थे पत्थर!

रचनाकाल : 5 जून 2026


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