हम सही काम भी बिना प्रलोभन मिले नहीं कर पाते हैं !
देखा जाए तो हजारों लीटर डीजल रोज खर्च करने वाले डिपो के लिए रोज पांच लीटर डीजल बचाना कोई बड़ी बात नहीं है, न ही इस बचत से कोई बहुत बड़ा फर्क पड़ने वाला है. लेकिन इनाम के लालच में ही सही, ड्राइवर इससे मितव्ययी बनने की जो कोशिश करेंगे, उससे परिवहन महामंडल को तो जो फायदा होगा वह होगा ही, किफायतशारी की आदत पड़ने से ड्राइवरों को अपनी निजी जिंदगी में कई गुना ज्यादा फायदा होगा.
दरअसल अपने घर में तो हम एक-एक पैसा बचाने की कोशिश करते हैं, लेकिन घर के बाहर निकलते ही अपने कार्यस्थल पर सरकारी या निजी कंपनियों द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाओं को मुफ्त का माल समझ कर उड़ाना (माले मुफ्त दिले बेरहम!) शुरू कर देते हैं. आखिर कितने ऐेसे लोग हैं जो कंपनी द्वारा ऑफिस आने-जाने के लिए कार की सुविधा देने पर, उसे स्वेच्छा से छोड़ते हुए (क्योंकि अकेले व्यक्ति का कार से आना फिजूलखर्ची ही है), दोपहिया वाहन से ऑफिस जाना पसंद करते हैं? कंपनी अगर भुगतान कर रही हो तो हम फाइव स्टार न सही, थ्री स्टार होटल में तो रुकने की कोशिश करते ही हैं, लेकिन अपनी जेब से पैसा भरना पड़े तो किसी साधारण से होटल में भी रात बिता लेते हैं! सरकारी खर्च के बल पर जो नेता अपनी सुरक्षा के नाम पर लाव-लश्कर लेकर चलते हैं, उसका खर्च अगर खुद उठाना पड़े तो इतना ताम-झाम करने का भूत क्या एक ही दिन में नहीं उतर जाएगा? कुछ लोग ऐसे भी हैं जो स्टेटस सिंबल गिरने के डर से सादगी अपनाने से बचते हैं. हमारे देश में यह एक बहुत बड़ी त्रासदी है कि फिजूलखर्ची को हमने सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ दिया है, जबकि नाॅर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, नीदरलैंड, डेनमार्क जैसे यूरोपीय देशों में तो मंत्री-प्रधानमंत्री तक साइकिल से दफ्तर आते-जाते हैं. हमारे यहां अपनी खाने की थाली में जो अन्न का एक दाना भी न छोड़े उसे लोग भुक्खड़ या दरिद्र समझने लगते हैं, जबकि चीन, जापान जैसे कई देशों में थाली में जूठन छोड़ना अपराध माना जाता है. हमारे देश में 80 करोड़ से ज्यादा लोगों का स्वाभिमान सरकार से हर महीने नि:शुल्क राशन लेने पर भी आहत नहीं होता, जबकि स्विट्जरलैंड में दस साल पहले अर्थात जून 2016 में ही लोगों ने सरकार द्वारा हर महीने 1.7 लाख रु. मुफ्त में देने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था.
अगर आप अभिजात्य वर्ग से संबंध रखते हैं तो कभी अपनी मित्र-मंडली को बातों-बातों में बताइए कि आप साइकिल से दफ्तर जाते हैं, ट्रेन में एसी की बजाय स्लीपर क्लास में यात्रा करते हैं या आपके घर में एसी नहीं, कूलर है; फिर आप देखिए कि कैसे उनके चेहरे पर व्यंग्य भरी मुस्कान और आंखों में आपके प्रति हिकारत का भाव झलकने लगता है. एक बार ऐसे ही एक संभ्रांत घर की महिला को मार्केट से लौटते समय जब लूना से चलने वाले एक अपेक्षाकृत गरीब रिश्तेदार मिल गए और घर तक छोड़ने के लिए उन्हें पिछली सीट पर बिठा लिया तो काॅलोनी का गेट आने के पहले ही वे लूना से उतरते हुए बोलीं कि यहां से टहलते हुए ही अपने घर चली जाएंगी. पहले तो लूना सवार रिश्तेदार को कुछ समझ में नहीं आया, बाद में उन्हें महसूस हुआ कि दरअसल अपनी हाई-फाई सोसाइटी के महंगी-महंगी कार वाले लोगों को लूना पर बैठे हुए दिख कर वे उनके उपहास का पात्र बनना नहीं चाहती थीं. कोई बड़ा आदमी साइकिल से चलने लगे (आज साइकिल दिवस पर बहुत से लोग इसका दिखावा करते मिल जाएंगे) तो उसे पर्यावरण के प्रति जागरूक मानकर हम उसकी तारीफ करते हैं, जबकि सड़क पर साइकिल से चलते आम आदमी को देखकर मानते हैं कि वह जरूर मजदूर या उसी वर्ग का कोई आदमी होगा. दिखावे की इसी राजनीति का ज्वलंत उदाहरण हमने हाल ही में देखा है, जब प्रधानमंत्री की डीजल-पेट्रोल बचाने की अपील पर बहुत से नेताओं ने साइकिल चलाते हुए अपने फोटो-वीडियो सोशल मीडिया पर डाले, लेकिन अपने पीछे चलते वाहनों के काफिले को बहुत ही चालाकी से कैमरे के फ्रेम से बाहर रखा.
ऐसे पाखंडी समाज को अगर हम ध्यान में रखें तो एसटी महामंडल के रोज पांच लीटर डीजल बचाने के छोटे से कदम का बड़ा महत्व समझ में आता है. हो सकता है एसटी महामंडल को भी तात्कालिक संकट के मद्देनजर उठाए गए अपने इस कदम के दूरगामी फायदों का अहसास न हो, लेकिन इसी बहाने अगर ड्राइवरों को बचत करने की आदत लग सकी तो वे जीवन भर के लिए महामंडल के शुक्रगुजार होंगे. आखिर बच्चे को भी, जब तक वह बड़ा न हो जाए, पढ़ने या किसी अन्य काम के लिए टाॅफी का लालच तो देना ही पड़ता है, इसी तरह हम भी जब समझदार हो जाएंगे तब शायद ‘लाॅलीपाॅप’ दिखाए जाने की जरूरत न पड़े और हम स्वेच्छा से सही काम करना शुरू कर दें!
(3 जून 2026 को प्रकाशित)

Comments
Post a Comment