देशभक्ति और नैतिकता के अभाव में पथभ्रष्ट करता पैसा

 नीट पेपर लीक  मामले में पिछले कई दिनों से रोज नए-नए खुलासे हो रहे हैं. अब एक डरावनी आशंका यह उभर कर सामने आई है कि नीट के तीनों विषयों के पेपर सेट करने वाले पुणे के ही कैसे थे? क्या देश के और किसी भी हिस्से में एनटीए को एक भी विषय का पेपर सेट करने लायक शिक्षक नहीं मिल पाए? या फिर यह सब सुनियोजित तरीके से किया गया था? आखिर एनटीए में किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति की भागीदारी के बिना ऐसा होना कैसे सम्भव था! 

तो क्या अभी तक जितने भी आरोपियों के नाम सामने आए हैं वे ‘छोटी-छोटी मछलियां’ हैं और ‘बड़ी मछली’ कोई और ही है? लेकिन उस ‘बड़ी मछली’ के ऊपर भी अगर कोई ‘बड़ी मछली’ हुई तो? ऐसे में क्या जांच एजेंसी के लिए उस पर हाथ डालना सम्भव हो पाएगा? 

बहुत पहले एक फिल्म आई थी, जिसमें एक जांच एजेंसी के मुखिया का अपहरण करके अपराधियों ने उसके हमशक्ल को उसके पद पर बिठा दिया था. इस प्रकार शिकायत करने वाले हर व्यक्ति की जानकारी अपराधियों को मिल जाती थी और उसे ठिकाने लगा दिया जाता था. यह तो खैर फिल्मी कहानी थी लेकिन असल जिंदगी में भी हमने अभी कुछ माह पहले ही देखा है कि ईरान की टाॅप लीडरशिप के खात्मे में किस तरह से घर के भेदियों की ही भूमिका थी. इजराइल ने वहां इतने ऊंचे-ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को खरीद रखा था कि ईरान में सुरक्षा एजेंसियों के प्रमुखों तक पर शक जताया जाने लगा था कि कहीं वे इजराइल के ‘आदमी’ तो नहीं हैं?

सवाल यह है कि इजराइल अगर ईरान के बड़े-बड़े लोगों को खरीद सकता था तो क्या ईरान ऐसा नहीं कर सकता था? कच्चे तेल के व्यापार ने उसे इतना समृद्ध तो बना ही दिया था कि पैसों की कमी न हो. फिर एक भी इजराइली नागरिक के अपने देश से गद्दारी करने के उदाहरण आज तक सामने क्यों नहीं आए हैं, जबकि इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद अपने समर्पित जासूसों के बल पर हर दुश्मन देश में अपनी पैठ बनाए हुए है?

इसका जवाब शायद यही हो सकता है कि इजराइलियों में देशभक्ति की भावना इतनी प्रबल है कि उन्हें पैसे देकर या अन्य किसी भी तरह के प्रलोभन से खरीदा ही नहीं जा सकता. देशभक्तों के ही दम पर इजराइल अपने दर्जनों दुश्मन देशों पर भी भारी पड़ता रहा है.  इजराइल ही नहीं, जापान की तरक्की में भी वहां के लोगों की देशभक्ति की भावना का प्रमुख स्थान रहा है. हमारे देश में भी आजादी के आंदोलन के दौरान अंग्रेजों की बड़ी-बड़ी सेनाओं पर अगर मुट्ठी भर क्रांतिकारी भारी पड़ते थे तो सिर्फ इसीलिए कि अंग्रेज सैनिक पैसों के लिए लड़ते थे, जबकि क्रांतिकारियों के भीतर अपने देश के लिए मर-मिटने की भावना थी. 

तो क्या सिर्फ देशभक्ति की भावना ही हमें भ्रष्टाचारी बनने से बचाए रख पाती है? फिर पुराने जमाने में, जब ‘देश’ की अवधारणा इतने मूर्त स्वरूप में नहीं होती थी, लोग कैसे खुद को ईमानदार रख पाते थे? 

हमारे पूर्वज शायद जानते थे कि हर व्यक्ति के भीतर इतनी क्षमता नहीं होती कि दूरगामी सोच रखकर सही-गलत का निर्णय कर सके. इसीलिए उन्होंने मनुष्यों को पथभ्रष्ट होने से बचाने के लिए कुछ नैतिक नियम बनाए थे, जिनमें से एक धन के परिश्रम से जुड़ाव के बारे में भी था. विवेकवान लोग तो अपने विवेक से ही समझ जाते थे कि बिना परिश्रम के हासिल किया गया धन कितना नुकसानदेह होता है, जिनके भीतर इतना विवेक नहीं होता था वे भी महापुरुषों द्वारा बनाए गए नैतिक नियमों का पालन करते हुए पतन के गर्त में गिरने से बच जाते थे. 

आज हमने धन और परिश्रम के बीच की कड़ी को तोड़ कर पैसे को एक स्वतंत्र वस्तु बना दिया है (हाड़तोड़ मेहनत से कमाई गई रोजी और लाॅटरी-सट्टे में जीते गए पैसों को एक जैसा समझते हैं). ऐसे में जिनके भीतर इतना विवेक नहीं है कि परिश्रमविहीन पैसे के दीर्घकालिक नुकसान को जान सकें, अगर वे नैतिक-अनैतिक हर तरीके से पैसे कमाने की कोशिश करते हैं तो उन्हें आईना दिखाए भी तो कौन? 

खतरा बस यही है कि आजादी के बाद देश में जिस भ्रष्टाचार को देखकर लोगों के बीच से धीरे-धीरे देशभक्ति की भावना तिरोहित होती चली गई, ऐसे नैतिकताविहीन समाज में, ठेके पर भर्ती होने वाले सैनिकों के बीच भी अगर देशभक्ति की भावना कमजोर पड़ने लगी और नौकरी के बदले में मिलने वाली तनख्वाह के लिए ही वे अपनी ड्यूटी निभाते रहे तो पैसों के लिए शिक्षा व्यवस्था को खोखला करने वालों की तरह, देश की सुरक्षा व्यवस्था में भी कहीं दीमक न लग जाए!  


(27 मई 2026 को प्रकाशित)

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