तर्कहीन कुछ नहीं

फल अच्छे कर्मों का जब हाथोंहाथ मिले
अच्छाई करना बहुत सरल तब होता है
पर करने पर जब होम हमारा हाथ जले
मन को समझाना बेहद मुश्किल होता है।
जीवन का इतना सरल नहीं है गणित
हमेशा दो और दो मिल चार बनें
कुछ कर्मों के फल जल्दी ही मिल जाते हैं
कुछ मिलने में पर साल कई लग जाते हैं
कब ईश्वर करता जोड़, घटाना, गुणा, भाग
यह हमको पता नहीं होता
इसलिये मुताबिक मन के काम नहीं होता
तो भला-बुरा ईश्वर को कहने लगते हैं।
पर नियम सृष्टि का अगर सटीक नहीं होता
अन्याय किसी के साथ जरा सा भी होता
क्या दुनिया अब तक नहीं अराजक हो जाती?
सच तो यह है, हम नहीं जानते पूरा सच
सीमित सच के बल पर अनुमान लगाते हैं
इसलिये कभी संतुष्ट नहीं हो पाते हैं।
ईश्वर के नियमों में शायद
सच-झूठ नहीं कुछ भी होता
जो होता है बस होता है
हां, बिना तर्क के शायद कभी नहीं होता
हम तर्क समझना देते हैं जब छोड़
तभी गढ़ लेते हैं सच-झूठ, उसी में जीते हैं!

रचनाकाल : 21-22 मई 2026

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