सब अपने बन जायें !
क्यों आखिर ऐसा होता है
जब सगा हमारा कोई, दुश्मन बन जाये
तो दुश्मन से भी अधिक भयानक होता है!
संघर्ष पराये लोगों में जब होता है
तब खून-खराबा बेशक भारी होता है
परिवार मगर जब आपस में ही लड़ता है
तब भी तो युद्ध महाभारत-सा होता है!
सुर-असुर सदा प्राचीन काल में लड़ते थे
था ‘देवासुर-संग्राम’ हजारों साल चला
पर यह भी तो सच है वे भाई-भाई थे!
हम अपना जिन्हें समझते हैं
‘धत्कर्म’ उन्हीं की खातिर सारे करते हैं
पर वे ही तो फिर जानी दुश्मन बनते हैं!
फिर सच्चाई के पथ पर ही क्यों हम न चलें
अपनों की खातिर पक्षपात कोई न करें
क्या पता कि बनकर रहने से ईमानदार
अपने तो अपने रहें, पराये भी अपने ही बन जायें!
(रचनाकाल : 10 मई 2026)
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