कविता

कभी-कभी
होता है ऐसा भी
कि अनथक श्रम के बावजूद
रह जाता है कविता का पृष्ठ
अनलिखा ही
समझ पायेंगे क्या लोग
उस पन्ने की भाषा!
सच है यह
कि जीते हैं जिस समाज के लोग
कविता को
नहीं रह जाती वहाँ
कविता लिखने की जरूरत
पर अभी तो कोसों दूर हैं हम
उस अवस्था से
कविता जीने तो क्या
पढ़ने तक से भागते हैं दूर.
अभी तो सजाने होंगे मुझे
कविता के अंग-प्रत्यंग
बनाना होगा उसे सर्वांग सुंदर
ताकि भाग न सको तुम उससे दूर.
हटा रहा हूँ झाड़-झंखाड़
बना रहा रास्ते को
स्वच्छ और मनोहारी
ताकि पकड़ कर उंगली
जब ले चलूँ तुम्हें
भागना न चाहो तुम, छुड़ाकर हाथ.
जानते हो इसमें क्या है मेरा स्वार्थ!
दरअसल मैं जानता हूँ
कि जीने लगोगे जब तुम कविता
नहीं कर सकोगे किसी पर
अनाचार-अत्याचार
बन सकोगे अपने प्रति
ईमानदार.
इसीलिए चाहता हूँ
कविता की राह आसान बनाना
तुम्हारे भीतर चौकीदार बिठाना
ताकि करो जब कोई अपराध
खुद ही मिल सके तुम्हें दण्ड
जरूरत न पड़े दूसरों को
बनने की न्यायाधीश.

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